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[Completed] कामदेव का उपासक | Kaamdev Ka Upasak

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bisapio
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कामदेव का उपासक | Kaamdev Ka Upasak

आइए आप को बताता हूँ कैसे मैं एक ठर्की सोच के साथ बड़ा हुआ और कैसे सभी मिथकों को तोड़ कर जीवन को सहज और पसंद से जीता हूँ|

इसका प्रारम्भ एक विचित्र घटना से हुआ जो मेरे सुक्षुप्त मन मे आज भी एक सुरक्षित वीडियो क्लिप की तरह है, तब मैं घुटनो पर चलता था और मेरे सामने मेरी बुआ किसी पराये पुरुष के साथ पूर्ण नग्न होकर कामदेव की पूजा कर रही थी मुझे उनके क्रिया क्लाप समझ नही आ रहे थे किंतु मैं वातावर्ण मे मंत्रमुग्ध सा था. गाँव के कच्चे मकान मे यहाँ वहाँ से धूप झन झन के आ रही थी सौंधी गोबर के लेप से दीवारो पर गेरू मिट्टी के वो चित्र और इन सब के बीच कामक्रीड़ा मे लिप्त दो शरीर नाग-नागिन की भाँति सब भयों से हटकर कामदेव की आराधना मे मस्त थे|

Kaamdev Ka Upasak

मैं नन्हा बालक अपनी नन्ही शिशु जिज्ञासा मे एक महत्वपूर्ण भूमिका रखता था हालाँकि मैं सीधे तो सम्मिलित नही था पर एक नये चत्रित्र की भूमिका बँध रही थी. यहाँ पर सब पूर्ण रूप से प्राकृतिक था प्रकाश से लेकर स्थान, वातावरण व मनुष्य| उन दोनो के मदमस्त करने वाले कामुक स्वर उनके शरीर से निकलते यौन द्रव व पसीना| मैं बैठा सब देख रहा था वो दोनो जैसे मेरे वहाँ ना होने का अनुभव कर रहे थे या वह समझ रहे थे की जो बोल नही सकता वह अनुभव या साक्ष्य भी नही हो सकता|

ना जाने कब उनका प्रेम मिलन समाप्त हुआ और कब वो दोनो वस्त्र पहनने लगे, तब पता चला जब मेरी बुआ ने जाँघियां पहने के लिए मेरे से छिनी जो की तब तक मेरे मुँह की लार से एकदम गीली हो चुकी थी| तद्पश्चात वो दोनो अपनी बातो मे लग गये, मुझे फिर डाँट पड़ी क्योंकि मैं उनकी कामक्रीड़ा मंथन से निकले अमृत को चाट रहा था जो उन दोनों ने किसी लावारिस वस्तु की भाँति कच्ची मिट्टी के धरातल पर बहा दिया था और जिसे मैं बाल जिज्ञासावश  माखन की भाँति चाट रहा था|

यहीं से मेरे अधमन मे एक जिज्ञासा व् कामपिपाशा जन्म ले चुकी थी जोकि समयानुसार जागृत व अर्धसुप्त अवस्था मे विचरती रहती है| मैं वैसे बहुत सहज, सरल व् आदर्श जीवन व्यतीत करता हूँ पर मेरे क्षुप्त मन ने मुझे जीवन बहुत आनंददायी क्षण दिए हैं जिन्हे मैं आपके साथ फिर अनुभव / सांझा करूँगा |

To be Continued

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bisapio
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यहीं से मेरे अधमन मे एक जिज्ञासा व् कामपिपाशा जन्म ले चुकी थी जोकि समयानुसार जागृत व अर्धसुप्त अवस्था मे विचरती रहती है| मैं वैसे बहुत सहज, सरल व् आदर्श जीवन व्यतीत करता हूँ पर मेरे क्षुप्त मन ने मुझे जीवन बहुत आनंददायी क्षण दिए हैं जिन्हे मैं आपके साथ फिर अनुभव / सांझा करूँगा |

कामदेव का उपासक | Kaamdev Ka Upasak | Update 2

विपिन भईया ने सिखाये यौन संबंधों में समझौते के लाभ | Vipin Bhaiya Ne Sikhaye Yaun Sambandhon me Samjhoute ke labh

 का उपासक

ना जाने किन क्षणों मैं घुटनो से हटकर अपने लड़खड़ते पैरों से संतुलित कदमो से इधर उधर चलने लगा, इस पुरे प्रकरण में एक बात जो सामान्य थी वो थी मैं लगभग ५ वर्ष की आयु तक नग्न अवस्था में ही अधिक रहता था. कितना सहज व सामान्य जीवन था ना कोई संकोच मुझे ना ही मेरे परिवार या गाँव में किसी को, जहाँ चाहे वहां मूत्र त्याग दो अगर कहीं मल त्याग देता तो घर भागता धुलवाने के लिए.

अब कभी कभी ऐसा प्रतीत होता है की सम्भवत ग्रामीण लोगो के लिंग के बलिष्ट होने का यह कारण भी हो सकता है की वो नगर के बच्चो के विपरीत मुक्त रूप से सहज ही बढ़ते हैं. उन्हें नन्ही से आयु से सेनेटरी पेड की जकड़न से  मुक्ति और बिना किसी संकोच के नग्न विचरण का लाभ मिलता होगा. एक बार मैंने उत्सुकता में अपनी दादी से इस विषय में चर्चा की थी उन्होंने समझाया था की जब तक बालक बिछोने/जांघिया  को भिगोना नहीं छोड़ता तब तक उसे नग्न अवस्था में ही अधिक रखा जाता है हालाँकि बालिकाओ के सन्दर्भ ये स्वतंत्रता थोड़ी संकुचित होकर घर तक ही सिमित रहती है परन्तु बालक पुरे ग्राम में विचरते रहते हैं!

मैं एक साधारण बालक की भांति अपने जीवन चक्र में धीमे धीमे बढ़ रहा था. मैं बहुत आकर्षक या सुडोल नहीं था (हूँ) मेरी तव्चा का रंग भी किसी आकर्षण का केंद्र नहीं था (है),| यदि में निचे दिए मापदंड से व्याखित करूँ तो समयानुसार सदैव ४-५ सूचकांक ही रहा था (है)| मेरी छोटी डील डौल व चेहरे की कोमलता से मैं लगभग हर तरह के आयु वर्ग व समूह का अंग बन जाता था|

बाकि सभी बच्चो की तरह मुझे भी चित्रित पुस्तके (कॉमिक्स) पढ़ने में रूचि होने लगी, समस्या थी उनकी उपलब्धि कि जो अधिकतर नगर से लाई जाती थी| हमारे एक विपिन भईया थे जो नगर से २ रूपये प्रतिदिन की दर से लेकर आते और इच्छुकों को ५० पैसे की दर से अपने घर में ही पढ़ने के लिए देते थे, प्रतीत होता है इसी भांति विपिन भईया अपनी नगर में शिक्षा की लागत का वहन करते थे|

किन्तु सभी पुस्तकों का दाम दे कर पढ़ना संभव नहीं था ऐसे ही एक दिवस ऐसा भी आया जब वेताल की एक नई पुस्तक आयी थी जिसे पढ़ने का मेरा मन था किन्तु दाम देना संभव नहीं था, बाकी बालक जब वो पुस्तक पढ़ते में उन्हें ललचाई आँखों से देखता| जिन्होंने पुस्तक पढ़ी वो ना पढ़ने वालो के सम्मुख बढ़ाचढ़ा कर व्याख्यान करते| कोई और पुस्तक होती तो संभवत कथा सुन कर भी मन का शांति मिलती किन्तु यह चित्रों वाली वेताल की पुस्तक (Phantom Comics) थी |  इसलिए बालमन इसे पढ़ने को लालायित था| बालमन कोई जोड़तोड़ कर के कैसे यह पुस्तक पढ़ी जाए इस उधेड़बुन में था| मुझे ज्ञात था की मेरा परिवार संध्या के बाद घर पहुंचने पर क्रोधित नहीं होगा क्योंकि वो पुस्तकों को पढ़ने पर प्रशसंतीत होते थे| मेरे पिताजी एक बड़े नगर में वाहन चालाक का कार्य करते थे और जब भी कभी हमें वह नगर विचरण के लिए अपने वाहन में ले जाते सदा मुझे नगर में पटे विज्ञापन, कार्यालयों व दुकानों पर लगे प्रचार / सुचना पट्ट पढ़ने के लिए उत्साहित करते थे सम्भवत इसी कारण मैं अंग्रेजी व हिंदी को बाकी सब बाल बालिकाओं से अधिक अच्छे से पढ़ पाता था|

मुझे वहां बैठे बैठे अधिक देर हो गयी और मेरे मन की लालसा मेरे चेहरे से झलकने लगी. विपिन भईया ने कहा अगर धन नहीं है तो फिर यहाँ बैठ कर क्यों समय व्यर्थ कर रहे हो, अपने घर लौट जाओ| अब सब जा चुके थे मैं भी अधमने मन से बाहर आकर बैठ गया| पीछे से विपिन भईयाने मुझे पुकारा व् आग्रह किया की यदि मैं उनका कथन मानूंगा तो वह मुझे यह पुस्तक घर के लिए दे देंगे| मुझे जैसे की कोई न मिलने वाली ख़ुशी मिल गई हो ३ घंटे का श्रम व्यर्थ नहीं गया| मैंने उनके पीछे पीछे उनके कक्ष की ओर प्रस्थान किया| वहां भईया की विद्यालय की पुस्तके के साथ साथ कुछ खिलाडियों, अभिनेत्रियों के चित्रों के साथ कर प्रकार की वस्तुऐं थी| उन्ही में कुछ पुस्तकें मस्तराम की कहानियां भी थी |

मैं विपिन भईया के आने की बाट देख रहा था की वो आएंगे व मुझे पुस्तकें देंगे| वह वापिस आये ओर किवाड़ बंद कर के बोले जो पुस्तकें चाहिए वह में छांट लूँ ताकि वो उन्हें मुझे ले जाने दें, मैंने अपने श्रम का उचित दाम लेना सही समझा ओर ३ चित्रित पुस्तकों के साथ क्रिकेट सम्राट पत्रिका दिखा कर उन्हें ले जाने की अनुमति मांगी| भईया बोले ४ पुस्तके तो अधिक हैं ओर मैं दाम भी नहीं चूका रहा हूँ इसलिए मुझे भी भईया को प्रसन्न करना होगा| मैं सहर्ष तैयार हो गया ओर कहा बताइये क्या करूँ वो बोले कुछ नहीं बस किसी को बताना नहीं यह हम दोनों के मध्य का रहस्य है अगर मुझे पीड़ा हो या आपत्ति हो तो मैं इस समझौते से निकल सकता हूँ, जब तक यह समझौता रहेगा मैं प्रतिदिवस एक पुस्तक अपने घर ले जा के पढ़ सकता हूँ बिना किसी शुल्क के| मुझे समझौते के नियम सही लगे व घर ले जाने के लिए पुस्तकें पुरस्कार ही थीं| मैंने कहा भईया आप बड़े हैं जैसा आप उचित समझें, भईया न मेरी हथेलियों को अपनी हथेलियों में थाम कर कहा नहीं समझौता है तो दोनों की सहमति होनी चाहिए, इस स्पर्श से मेरे शरीर में एक अजब से कम्पन हुई, मैं भईया की आँखों में ऑंखें डाल कर पहली बार वार्तालाप नहीं कर पा रहा था| खड़े खड़े धरातल को घूर रहा था| भईया ने फिर पूछा तुझे स्वीकार है ओर मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था मेरे मन में पुस्तक को पढ़ने की शीघ्रता थीं, शुल्क की जानकारी नहीं थीं, मन में संदेह था किन्तु झुके सर को हिला कर सहमित दे दी|

अब लगभग अन्धकार हो चूका था भईया ने मेरे गाल में एक चुम्बन दिया ओर कहा की मैं धरताल में पेट के बल लेट जाऊं| मैंने अधिक समय सोच विचार में व्यर्थ करने से अच्छा जल्दी से पुस्तकें घर ले जाना उचित समझा ओर बिना एक क्षण व्यर्थ किये लेट गया (अब प्रतीत होता है उस समय शायद विपिन ने इसे मेरी व्याकुलता या कामुकता समझा होगा तभी आगे जो हुआ वो संभवत न होता) | विपिन भईया मेरे ऊपर लेट गए ओर मेरे गालों  को चूसते हुए गिला करने लगे| मैं किसी भी क्षण को व्यर्थ नहीं करना चाहता था मुझे पुस्तक पढ़ने की उत्सुकता सहयोग करने के लिए प्रेरित कर रही थीं| कुछ देर बाद उन्होंने ने मेरी निकर उतार दी ओर स्वयं भी नग्न हो कर अपने लिंग को मेरी गुदा की दरारों में रगड़ते हुए मेरी ऊपर लेट गए|

अब मुझे उनके लिंग के तनाव का अनुभव अपने गुदा में हुआ मुझे अपने ऊपर मेरे भार से अधिक भार एक अजब सुखद अनुभूति दे रहा था ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे कोई मेरी मालिश कर रहा है| मैंने अपने दोनों हथेलियों का सरहाना बनाया ओर आँखे बंद कर के अपनी फेंटम वाली यादों में खो गया| कुछ देर बाट विपिन ने मेरी गुदा में थूकना शुरू कर दिया उसने इतना थूका की उनका थूक मेरी झांघो से बह कर मेर पेट को भी गिला करने लगा ओर फिर उसने अपने थूक से अपने लिंग को भी भिगोया ओर मेरे ऊपर पुन: लेट गया| अब वो मेरे गुदा   की दरारों में ऊपर निचे करते हुए अपने लिंग को रगड़ने लगा| जब उनका लिंग लगभग दुगने आकार का हो गया वो उतर कर मेरी बगल में लेट गया और अपनी हथेली में थूक लगाकर मेरी मांसल गुदा को सहलाने लगा| मुझे अपने बचपन में घर के बड़ो द्वारा की गयी मालिश की अनुभति होने लगी अंतर केवल तेल और थूक का था| मैं वैसे ही निश्चिन्त होकर लेटा रहा और घर लोट जाने के विपिन के आदेश की बाट देखने लगा|

विपिन ने अपनी ऊँगली गुदा द्वार को धीरे धीरे रगड़ना शुरू किया किन्तु भरसक प्रयास के बाद भी वो गुदा में अपनी ऊँगली नहीं डाल पाया ( आज जब मैं इस घटना का स्मरण करता हूँ तो इस निष्कर्ष पर पहुंचता हूँ कि मस्तराम की पुस्तके उत्तेजित तो कर देती हैं किन्तु न ही वो घटनाओ का उचित ब्यौरा देती हैं, न ही विधि का ज्ञान और न ही उनसे होने वाली समस्याओं की चेतावनी या सुझाव)|

विपिन की साँसे तेज चल रहीं थी और मेरी मांसल गुदाओं पर उसकी हथेलियाँ अब ज्यादा दवाब दे रहीं थी| प्रतीत होता है कामुकता वश व पकडे जाने की भय से विपिन ने अधिक विलम्ब करना उचित नहीं समझा और मेरे ३५ किलो की शरीर के ऊपर अपना ६५ किलो का शरीर डालकर मेरे ४'८" के आकर को अपने ५'५" के आकर में लगभग निगल कर लेट गया| मैं इस पुरे घटनक्रम में आंखे मूंदे औंधे मुँह लेटा रहा| इस बार विपिन ने अपने शरीर के भार से फिर मेरी मालिश करनी शुरू कर दी| पुन: मेरे गालो को चूसते हुए मेरे नितम्बो के मध्य अपने लिंग से कमर उठा उठा कर धकलने लगा, हर धक्के से उसका लिंग मेरी गुदा द्वार से होकर मेरे नितम्बो के मध्य खाई से नितम्बो को जबरन पाटते हुए मेरी कमर से बाहर आकर अपने लिंग मुख को जब दिखाता उस समय उसके अंडकोष मेरे गुदाद्वार को हलके हलके थपेड़े मारते|

हर धक्के के साथ मेरे शरीर पर विपिन और अधिक दवाब डालता, उसकी साँसे और अधिक त्रीवता से चलती और कभी आह आह का स्वर निकलता कभी झुक कर मेरे गाल चूसता और कभी थोड़ा रुकता और फिर लेट जाता फिर लेटे लेटे ही केवल कमर उचका उचका कर अपना लिंग मेरे नितम्बो की मध्य गहराई पर रगड़ता. कुछ समय पश्चात विपिन का शरीर कम्पन करने लगा और वो निढाल हो कर मेरे ऊपर लेट गया| अब उसका ६५ किलो का वजन मुझे १०० किलो का प्रतीत हो रहा था| मैंने सोचा सम्भवत विपिन अधिक व्यायाम से थक गया है इसीलिए विश्राम कर रहा है मुझे तनिक भी आभास नहीं था की यह भी यौन सम्बन्ध अथवा एक यौन क्रिया है|  अचानक ही फिर विपिन के शरीर पर एक विधुत तरंग की भांति हलचल हुई और उसका लिंग फड़फड़ाने लगा| मुझे अपने नितम्बो की गहराई में किसी गुनगुने रिसते हुए द्रव्य का अनुभव हुआ| जब भी विपिन के लिंग में फड़फड़ाहट होती तभी रिसते द्रव्य के त्रीवता तेज हो जाती| रिसते हुए द्रव्य  मेरी नितम्बो के पाट से रिस्ता हुआ एक कूप में एकत्रित होते हुए वर्षा जल के धाराओं सामान मेरे गुदा द्वार की गहराई में समिट जाता और फिर बूंद बूंद टपकता| इधर विपिन की धड़कने सामान्य हो रही थी और वजन भी १०० से काम होते होते प्रतीत हो रहा था की लगभग ५० हो गया है| इस सब धक्का मुक्की में मेरे क्षितिल लिंग को धरातल की रगड़ से जलन होने लगी. किन्तु तभी मेरी गुदा से बूँद बूँद टपकता हुआ विपिन का वीर्य मेरी कमर और जांघो को भोगता हुआ मेरे पेट के पास ऐसे सिमट रहा था जैसे कोई वर्षाधारा चारो और से बहती हुई किसी तालाब में सिमटती चली जाती हैं|

इस एकत्रित हुए वीर्य और थूक के मिश्रण ने आहित हुए मेरे शिशु लिंग पर किसी मरहम का काम किया और जलन में राहत अनुभव हुई| विपिन उठा और मुझे हाथ दे कर उठाया में निचे से नग्न था किन्तु विपिन पूरा नग्न था, मैं चोरी चोरी निगाहों से विपिन के सिकुड़ते लिंग को देख रहा था, वो अभी भी रुक रुक कर झटक रहा था और अभी भी किसी शिशु के मुहँ से टपकी लार की तरह से टपक रहा था| इस घटनाक्रम को अब लगभग १५-२० मिनिट हो चुके थे, मैंने पहली बार विपिन से आँखें मिलाई व निवेदन किया, "विपिन, मैं पुस्तके ले जाऊं",  वो बोला, "रुक"| विपिन ने अपने जाँघियां से मेरे पेट और मेरे नितम्बो को पोछा और गुदा को हथेली से रगड़ता हुआ मेरे गुदा द्वार में दवाब से रिस्ता हुआ वीर्य ठूस दिया| कहा की अब तू जा और समझौता याद रखना.

हालाँकि मेरा शरीर बुरी तरह से थूक, वीर्य और पसीने से दुर्गन्धित था किन्तु मैं दुगनी गति से घर की और भाग रहा था, मन में अपने निश्चय और संयम की विजय का संतोष था, पुरस्कार में पुस्तकें थी और आज ही पढ़कर लौटने की एक विवशता भी थी| मैं जितनी तेज कदम बढ़ाता ऐसा प्रतीत होता जैसे की मेरा गुदा ने एक कूप की भांति विपिन का वीर्य अपने अंदर समाहित कर लिया है हर चार कदम पर कोई द्रव्य गुदा से रिस्ता हुआ प्रतीत होता|

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हालाँकि मेरा शरीर बुरी तरह से थूक, वीर्य और पसीने से दुर्गन्धित था किन्तु मैं दुगनी गति से घर की और भाग रहा था, मन में अपने निश्चय और संयम की विजय का संतोष था, पुरस्कार में पुस्तकें थी और आज ही पढ़कर लौटने की एक विवशता भी थी| मैं जितनी तेज कदम बढ़ाता ऐसा प्रतीत होता जैसे की मेरा गुदा ने एक कूप की भांति विपिन का वीर्य अपने अंदर समाहित कर लिया है हर चार कदम पर कोई द्रव्य गुदा से रिस्ता हुआ प्रतीत होता|

कामदेव का उपासक | Kaamdev Ka Upasak | Update 3

गणित के शिक्षक बने मेरे यौन शिक्षक | Ganit Ke Shikshak Bane Mere Yaun Shikshak

SOME NAUGHTY SISSY FEMDOM INCEST STUFF

विपिन के साथ उस अनुभव की पुर्नावृति तो नहीं हुई, मेरी पहल का प्रश्न ही नहीं था क्योंकि विपिन ने समझौते के तहत मुझे पुस्तकें घर ले जाकर पढ़ने का अपना वचन जारी रखा और मेने उस अनुभव को समझौते का एक भाग बूझकर उसे पूरा किया. जैसा मैंने पहले वर्णित किया था वो अनुभव मुझे यौन सम्बन्ध से अधिक दो बालकों के मध्य कोई खेल लगा | विपिन संभवत मेरे असहयोगी व्यवहार से या लिंग को प्रविष्ट न कर पाने की विफलता से निराश था, किन्तु फिर भी हमारे बीच का समझौता जारी था या यह भी हो सकता है की उसे कोई और बेहतर विकल्प मिल गया था|

समय चक्र अपनी गति से गतिमान था, मेरी ऊंचाई बढ़कर ४'११" हो गई थी, परिवार चिंतित था मेरी लम्बाई पिछले २ वर्षो में केवल ३" ही बढ़ी है जोकि उचित दर से नहीं बढ़ रही है| अब में अगली कक्षा में प्रवेश कर चूका था| मैं पढ़ने में सामान्य से अधिक था किन्तु सर्वश्रेष्ठ छात्रों से १९ ही था| मेरे पिता इस बात से चिंतित थे की प्रतिभावान होते हुए भी मैं परीक्षा में सर्वश्रेष्ता की दौड़ में भाग नहीं लेता था| मैं अंगेज़ी में कहावत है "Jack of all, master of none"| को चरितार्थ करता था| मैं खेल-कूद, नाट्य, सामान्य ज्ञान, कुश्ती, साइकल से भ्रमण करने को भी उसी संजीदगी से लेता था जैसे अपनी शिक्षा को| गणित को छोड़ मैं सभी विषयों में आत्मनिर्भर था|

एक दिवस मेरे पिताजी नगर से घर आये हुए थे और उन्हें हमारे विद्यालय के अंग्रेजी के अध्यापक मिले और पिताजी से मेरी प्रशंसा करते हुए मुझे गणित पर और अधिक परिश्रम करने का सुझाव दिया| पिताजी ने मेरे गणित के शिक्षक से मिलने का मन बनाया ताकि वो कोई उचित निर्णय ले सकें| मुझे पिताजी का इतना मेरे प्रति रूचि लेना तनिक भी नहीं भाया, ऐसा प्रतीत हो रहा था की मेरे बालपन पर अब उम्मीदों का भार रखा जा रहा है व मेरे स्वछंद स्वभाव को नियंत्रित किया जा रहा है| घर आने पर पिताजी ने मुझे कहा के वह मेरे अध्यापक से मिले थे और मेरे लिए एक प्रस्ताव है|

यद्यपि किसी भी अध्यापक को मेरी शिक्षा या मेरे ज्ञान को लेकर कोई संदेह नहीं है किन्तु बलविंदर जी का मानना है की अगर मैं गणित के लिए विशेष प्रयत्न करूँ तो आगे जाकर मेरे लिए वो लाभप्रद होगा| इसलिए पिताजी ने निर्णय लिया है क्यूंकि अभी दशहरे के अवकाश में विद्यालय बंद रहेगा व बलविंदर जी की पत्नी मायके जा रहीं है मैं उनके घर इन ७ दिवस के लिए उनके पास रहकर गणित का उचित मार्गदर्शन पाते हुए अभ्यास कर सकता हूँ| मेरे मन में अलग उलझन थी की अवकाश के समय जो खेल प्रतियोगिताएं व आवारागर्दी के मेरे प्रायोजित कार्यक्रम थे वो सब बेकार हो जाएंगे, मैं पढाई में ठीक ही हूँ व शीघ्र ही सरलता से अपनी परीक्षाओं में उत्रिण हो जाता हूँ तो क्या आवश्यकता है अलग से कोई प्रयास करने की, किन्तु पिताजी की इच्छा थी तो मैंने अपनी सहमति दे दी|

अंततः वह दिवस भी आ गया जब पिताजी मुझे अपने वाहन में बैठा कर गुरूजी के निवास पर ले कर गए, उनका निवास हमारे गांव से लगभग १५ किलोमीटर दूर एक छोटे से नगर में था| पूरी यात्रा के मध्य में मैं गांव के खेतो को हटते हुए छोटी छोटी सी झुगी झोपड़ियों में बदलते हुए देख रहा था| अब मिट्टी की सड़के टूटी फूटी सड़कों में बदल रही थी, वृक्षों के जगह ईंट के भट्टे व् कूड़ा घरों में बदल रही थी, पालतू पशुओं सी अधिक आवारा पशु दिख रहें थे| पिताजी ने एक पुराने  दिखने वाले पक्के घर के आगे अपने वाहन को रोका और मुझे अपना सामन ले कर उतर जाने को कहा| मैंने अपनी कपडे के थैले में ही अपने कुछ कपडे व पुस्तके रखीं हुई थी| मैंने अपना थैला व अचार की मिट्टी की हांडी उठाई व पिताजी के पीछे पीछे चलने लगा| एक तंग गली सी गुजरते हुए हम एक घर के सामने रुके, पिताजी ने सांकल को खटखटाया तो अंदर सी किसी महिला ने द्वार खोला| मुझे द्वार खुलते ही आँगन में अपने गुरूजी का दो पहिया वाहन दिख गया, मन ही मन संतुष्टि हुई चलो पहुँच तो गए| अंदर सी मैं प्रसन्न भी था यह सोचकर की अगर मन नहीं लगा तो वापिस गांव चला जाऊँगा अधिक दूर नहीं है पैदल भी जाऊँगा तो ३-४ घंटे में पहुँच जाऊँगा, वैसे कुछ समय रहने के लिया यह स्थान बुरा भी नहीं है, यहाँ लगभग विध्युत आपूर्ति भी ठीक है| इसी उधेड़बुन में पता ही नहीं चला कब हम लोग अंदर प्रविष्ट कर गए और कब मेरे आगे एक गिलास जल का रखा गया| मेरे पिताजी व गुरूजी आपस में वार्तालाप करने लगे और मुझे ऊपर वाले कक्ष में बैठाकर टीवी चला दिया गया|

कुछ समय पश्चात पिताजी ने मेरा नाम ले कर पुकारा, मैं नीचे गया तो देखा पिताजी जाने की तैयारी कर रहे थे और उनके साथ गुरूजी की पत्नी व पुत्री भी कुछ सामान ले कर कहीं जाने को तैयार थे| पिताजी ने कहा वो एक सप्ताह उपरान्त आएंगे व मुझे वापिस गांव छोड़ देंगें अभी वो जा रहें है व रास्ते में गुरूजी की पत्नी व बालिका को बस अड्डे पर छोड़ देंगे| इतना कहकर पिताजी ने मुझसे और गुरु जी सी यह कहते हुए विदा ली, " चलता हूँ बलविंदर भाई, इसे अच्छे सी रगडिये गए ताकि यह एक अच्छा जीवन जी सके|"  सब लोग चले गए तो गुरु जी कहा यहाँ पर मैं तुम्हारा शिक्षक नहीं अपितु बलविंदर हूँ मुझे अपना मित्र समझो तभी तुम जो भी करोगे उसे अच्छे सी करोगे व उसका आनंद भी ले पाओगे| मैंने उतर में कहा जी गुरु जी और तभी मेरे नितम्बो पर एक जोरदार चटाक के साथ गुरु का थप्पड़ पड़ा व एक चेतावनी भी - नंदन, गुरूजी नहीं बलविंदर, समझे| गुरूजी ने किवाड़ पर सांकल लगाई और मुझे लेकर अंदर आ गए| अंदर आकर उन्होंने कहा, रूप खाना बना कर गयी है और रात्रि का भोजन हम दोनों मिल कर बनाएंगे तब तक हम दोनों सहज हो जाते है व एक मित्र की भांति एक दूसरे सी घुलने मिलने का प्रयास करते हैं| हम दोनों वहीँ बैठ गए और हमारे मध्य वार्तालाप आरम्भ हो गया| गुरूजी बोले,  नंदन, अपना घर समझो और आराम से रहो किसी वस्तु की आवश्यकता हो तो कहना (कहते कहते उन्होंने अपना कुर्ता उतार दिया व अपनी श्वेत श्याम रंगो वाली केशों से भरी छाती का प्रदर्शन करने लगे), तुम चाहो तो तुम भी उतार सकते हो| चलो अपना सामान दिखाओ क्या क्या लाये हो| ... इसी तरह इधर उधर की बाते करते हुए गुरूजी ने बीच बीच में धमकाते हुए मुझे उन्हें बलविंदर कह कर पुकारने में परांगत कर दिया| बातो बातो मैं मैं भूल ही गया की मैं गुरूजी के आवास में हूँ व यहाँ गणित का अभ्यास करने आया हूँ| कुछ समय पश्चात गुरूजी मुझे अपने दुपहिया वाहन में बैठाकर किसी दूकान पर ले कर गए व कुछ सामान खरीदकर झोले में डालकर मुझे दिया| हम लोग आम का रस पीते हुए वापिस घर आ गए|

घर पहुँच कर मैंने पूछा, बलविंदर मूत्र कहाँ करुँ तो उन्होंने हँसते हुए कहा मेरे मुँह में कर दे मैं झेप गया और बिना कुछ बोले आँगन में नाली में मूत्र करने लगा| वापिस कक्ष में पहुँचने पर बलविंदर ने कहा शौचालय पीछे की तरफ है और ऊपर भी है जहाँ चाहो जा कर मूत्र त्याग सकते हो , मैंने उतर दिया नहीं बलविंदर अब कया कार्य है यह बताओ अन्यथा समय व्यर्थ करने से बेहतर है हम कुछ गणित का अभ्यास कर लें| किन्तु हाँ दोनों के मध्य तय हुआ की आज का दिवस विश्राम व मनोरजन में व्यतीत करते हैं व कल से गणित का अभ्यास आरम्भ करेंगें| मेने कहा बलविंदर मेरे पास अधिक वस्त्र नहीं हैं अतः मैं प्रतिदिन अपने वस्त्र धोता हूँ और मुझे शौचालय में स्नान करने में व वस्त्र धोने में असुविधा होती है| बलविंदर ने मुझे कहा की अपने गंदे वस्त्र मैं उस टोकरी में रख दूँ व पहनने के लिए घर पर तो झंघिया ही प्रयाप्त है| यह कह कर बलविंदर ने अलमारी से एक श्वेत रंग की मुलायम सी झंघिया दी जो की मुझे किसी कन्या की प्रतीत हो रही थी, पता चल उसने अपनी पुत्री की चड्डी दी है जो की लगभग नाप की थी किन्तु वो मेरे कुलहो को ढकने की जगह मध्य धंसी हुई थी व अग्रभाग ने मेरे लिंग को समेट कर ऊपर की दिशा में मोड़ दिया था, कुछ समय थोड़ा सा असामान्य लगा किन्तु जल्द ही मैं अभ्यस्त हो गया व पूरी तरह से उसके अनुकूल हो गया| हम बात करते रहे तो बलविंदर ने कहा चलो अब तुम्हे हल्का सा मादक द्रव्य पिलाते हैं मेने कहा "बलविंदर, यदि यह मदिरा है तो क्षमा करना और यदि बियर है तो अवश्य पियूँगा सुना है इससे हानि नहीं होती व विदेशी लोग तो इसे खाने के साथ भी पीते हैं क्योंकि यह द्रव्य स्वास्थ्यप्रदक है|"  हम दोनों बियर पीने लगे मेरे लिए तो केवल एक पात्र ही उचित था| मैंने उसे ख़त्म किया और शौचालय चला गया, इस चड्डी का एक लाभ तो था बिना झंघिया उत्तारे बस लिंग को टेढ़ा कर बहार निकल लो| एक अलग से अनुभव था यहाँ गांव के विपरीत सब कुछ बंद बंद सा रहस्य्मय लग रहा था किन्तु एक पूर्ण स्वतंत्रता भी थी कहीं भी बाहर जाने की आवश्यक नहीं सब कुछ बंद कमरों में ही मिल जाता है, मेरे मन में यह विचार आ रहे थे पीछे से बलविंदर आया उसने अपने झंघिया घुटनो तक निकाल दिया और मूतने लगा| मैंने उसके लिंग के तरफ देखा तो कुछ अलग सा लगा व मेरे विपरीत उसका लिंग श्वेत श्याम बालो के गुच्छे में था व् उसका लिंग मुख  गंजा था व चमक रहा था| हम ने एक दुसरे को कुछ नहीं कहा किन्तु बलविंदर ने अपने मूत्र की धार से मेरे लिंग को भिगोना शुरू कर दिया और बोला नंदन, "पेचे लगाएगा, जिसकी धार का पहले अंत होगा समझो उसकी पतंग कट गई", मुझे अपने बाल मित्रो वाले खेल स्मरण हो गए और मैंने भी अपने लिंग से मूत्र धार को उसकी धार से काटना प्रारंभ कर दिया अंतत विजय मेरी हुई| मैंने कहा, "बलविंदर तुम्हारे लिंग को साफ़ करने की आवश्यकता है व यह दुर्बल भी है हमसे न जीत पाओगे" कहकर मैं कक्ष में लौट गया | अपने कक्ष में आने के बाद बलविंदर ने मुझे एक पात्र बियर और दी और खुद एक पात्र मदिरा का लेकर पीने लगा| पीते- पीते बलविंदर ने कहा, " यार नंदन, कुछ करतें है ऐसे तो बोर हो जाएंगे और कल से तेरी शिक्षा भी प्रारम्भ करनी है, चल शीघ्रः समाप्त कर हम दोनों मिल के वस्त्र धो लेते हैं|" हमने तुरंत ही अपने पात्र को खाली किया और कार्य समापन की और अग्रसर हो गए|

वाशिंग मशीन के समीप पहुंचने पर बलविंदर ने सारे वस्त्र निकाल कर बहार फेंक दिए और अंदर जाकर कुछ और वस्त्र ले कर आया| हम दोनों को मध्यम मध्यम सा नशा सा होंगे लगा, बलविंदर एक वस्त्र को उठता और सूंघता व उनका विभाजन करता, उसने मुझे भी सहायता के लिए पुकारा व निर्देश दिया की जिस वस्त्र में से शरीर की गंध आ रही हो वो उसे अलग रख दे उन्हें धोना है बाकि सब को वापिस तय कर कर अलमारी में रखना है! वो अलमारी के वस्त्रों को तय करने लगा और में चिन्हित करने लगा| मेरे शरीर में एक मादकता सी छाने लगी क्योंकि मुझे न केवल बलविंदर अपितु उसकी पत्नी रुपिंदर व पुत्री डॉली के भी वस्त्र व उनके अंतर्वस्त्र भी सूंघ कर चिन्हित करने थे| मैं जानबूझ कर अंतर्वस्त्रों को अधिक सूंघने लगा व स्वयं ही उत्तेजित होता रहा, रूप की कच्छी न केवल डॉली से अधिक आकर्षक थी वरन अधिक मादक भी थी, डॉली की कच्छी में न ही उस मात्रा में गंध थी और न ही मादकता हालंकि गंधित वो भी थी, रूप के निचले अंतर्वस्त्र न केवल मादक गंधित थे अपितु उसके मध्य में जो पेडिंग थी वो मूत्र व किसी अन्य चिपचिपे पदार्थ से गीली भी थी. मुझे उसकी मादकता और अधिक विचलित कर रही थी। बलविंदर मेरी तरफ देखते हुए बोला, "चाट कर देख और बता क्या है", मैंने उत्तर दिया - छिः। बलविंदर आया और मेरे से दोनों कच्छी छीनकर चाटने लता और बोला, "इसमें छी क्या है?, अगर सामर्थ्य है तो क्या तू बता सकता है ये गीली क्यों है और किस चीज से है और इसमें से रूप की कौन से है और डोली की कौन सी।"

मैं उत्साहपूर्वक दोनों कच्छीयों को चाट गया और बोला ले इसमें क्या है इतने में बलविंदर हँसते हुए कहने लगा पागल तूने रूप का और डॉली का मूत्र चाटा है, ये मूत्र के ही चिन्ह हैं और तो और तूने तो रूप की कच्छी से जो चिपचपा पदार्थ चाटा है वो मेरा वीर्य था। मैं कूच देर शून्य हो गया - मादक अवस्था, अंतर्वस्त्र सूंघना व मूत्र चाटना और वीर्य चाटना सब एक साथ मस्तिष्क में घूमने लगे और वो धुंधली से स्मृति जब मैंने शिशु अवस्था में अपनी बुआ के सामने धरातल पर गिरा हुआ वो सफ़ेद द्रव्य चाटा था. मेरे अवस्था अब किसी ऐसी वैश्या जैसे हो गई थी जो थी तो नंगी पर आभास कपडे पहने हुए का था

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मैं उत्साहपूर्वक दोनों कच्छीयों को चाट गया और बोला ले इसमें क्या है इतने में बलविंदर हँसते हुए कहने लगा पागल तूने रूप का और डॉली का मूत्र चाटा है, ये मूत्र के ही चिन्ह हैं और तो और तूने तो रूप की कच्छी से जो चिपचपा पदार्थ चाटा है वो मेरा वीर्य था। मैं कूच देर शून्य हो गया - मादक अवस्था, अंतर्वस्त्र सूंघना व मूत्र चाटना और वीर्य चाटना सब एक साथ मस्तिष्क में घूमने लगे और वो धुंधली से स्मृति जब मैंने शिशु अवस्था में अपनी बुआ के सामने धरातल पर गिरा हुआ वो सफ़ेद द्रव्य चाटा था. मेरे अवस्था अब किसी ऐसी वैश्या जैसे हो गई थी जो थी तो नंगी पर आभास कपडे पहने हुए का था

कामदेव का उपासक | Kaamdev Ka Upasak | Update 4

मैं बना बलविंदर की पत्नी | Main Bana Balvindar Ki Patni

मेरे अवस्था अब किसी ऐसी वैश्या जैसे हो गई थी जो थी तो नंगी पर आभास कपडे पहने हुए का था| मेरी इस विचित्र परिस्थति को बलविंदर न भाँप लिया व मुझे सहज करने के लिए उसने कहा, "इसमे कुछ भी बुरा नही है, तूने कुछ ग़लत नही किया जो किया वो करने के लिए मैने ही तुझे कहा था"| उसने मेरा हाथ पकड़ा और भीतर वाले कक्ष मे ले गया| मुझे वाकाई समझ नही आ रहा था की ये सब हो क्या रहा है बस मैं बहाव मे एक पत्ते की तरह बहा जा रहा था| भीतर कक्ष मे उसने मुझे अपनी छाती से चिपका लिया और मेरी पीठ पर हाथ फिरा कर मुझे सहज करने लगा| बलविंदर की श्वेत-श्याम (grey) बालों से भरी छाती के बाल मेरे मुँह को जैसे कुदेर रहे थे व उसके पसीने की गंध विचलित कर रही थी, पीठ पर हाथ सहलाते सहालते कब वो हाथ मेरे नितंबो तक पहुँचे ज्ञात ही नही हुआ| जैसा की पहले कहा था बलविंदर ने अलमारी से एक श्वेत रंग की मुलायम सी झंघिया (panty) थी जो उसकी पुत्री की थी  किन्तु वो मेरे कुलहो को ढकने की जगह मध्य धंसी हुई थी व अग्रभाग ने मेरे लिंग को समेट कर ऊपर की दिशा में मोड़ दिया था, बलविंदर के स्पर्श व मेरा उसकी बालो भरी छाती मे धंसा हुआ मुँह आश्वासित तो करा रहा था किंतु उसमे वो मार्मिकता नहीं थी अपितु एक मादकता (lust) थी. बलविंदर के लिंग का तनाव मुझे उसके कच्छे के भीतर से अपने पेट पर आभासित हो रहा था, जैसे के वो बार बार मेरे पेट पर कोई थपकी मार रहा हो| मुझे आनंद हो रहा था और इसी आनंद मे मैने कब आँखे बंद की और कितने समय तक की उसका आभास ही नही था, किंतु जैसे ही मुझे अपने नाथूनों पर बलविंदर की मूछों के बाल चुभे पर आँखे खुली तो पाया बलविंदर मेरे होठों को चाट रहा था और कहा रहा था ले बस मैने तेरा मुँह साफ कर दिया| मैं हतप्रभ था, आनंदित व विचलित था कारण कई थे, कुछ भी हो थे तो वो मेरे गणित के शिक्षक, पिताजी के मित्र व आदरणीय सबसे बलपूर्वक तथ्य था पिताजी का वो निर्देश की मैं पूर्ण सहयोग करूँ बलविंदर के साथ| मुझे उसकी दाढ़ी व मूँछ के बाल चुभ रहे थे आर वो मेरे होठों को चाट रहा था, चाटते चाटते उसने मेरे होंठो को चूसना आरंभ कर दिया इसी प्रक्रिया मे उसने अपनी जिव्हा मेरे मुँह के भीतर डालकर मेरी जिव्हा को भी चूसना आरंभ कर दिया, मैं इस पूरे प्राकरण मे कहीं भी सहयोग नही कर रहा था किंतु सम्मिलित था| इस प्रक्रिया मे मेरे भीतर से स्वत ही जैसे कोई रासायनिक प्रतिरोघ हुआ व मेरे शिथिल शिशु लिंग (sissy dick) मे कसाव होने लगा मेरे जिव्हा (tongue) स्वत ही बलविंदर की जिव्हा को छूने लगी व शरीर मे भय से जो रोए खड़े हुए थे वो स्थिर हो गये| बलविंदर मेरे कुल्हों से चड्डी को सरका चुका था व मेरे नग्न नितंबो को अपनी बड़ी हथेलियों से सहला रहा था मेरा शरीर ढीला पड रहा था ओर बलविंदर का कसाव व मुख चुंबन बलशाली होता जा रहा था|

मैं मानसिक या शारारिक रूप से तैयार नहीं था अपितु ये भी सत्य है कि अपनी इच्छा के विपरीत अपनी शारारिक उत्तेजना से वशीभूत होकर इस कामक्रीड़ा मे सहयोग करने लगा| बलविंदर के चुंबन अब इतने मादक हो गये थे की हम दोनो की मुँह से दोनो की लार चीनी की चासनी की भाँति घुल कर हमारे मुँह से टपक रहा था| मेरे हाथ स्वत ही बलविंदर के कुल्हों को टटोलने लगे उसका लिंग बलिष्ठ होकर मेरे पेट मे मानो छेद करने का प्रयास कर रहा था| मैं काम मादकता मे सहयोग की और बढ़ रहा था व एक आनंद की अनुभूति कर रहा था| चुंबन करते करते बलविंदर ने मेरी कच्छी उतार दी तो मेरे नग्न चुतडो को सहलाने लगा इसी प्रक्रम मे मैने भी उसकी कच्छे को खींच कर नीचे कर दिया| अब हम दोनो पूर्ण रूप से नग्न थे, बलविंदर ने मेरे लिंग को हाथ मे लेकर उसे खींच रहा था मैं भी इस क्रम को दोहराया और जीवन मे पहली बार अपने लिंग के अलावा किसी ओर लिंग का आभास किया| इस पूरे घटनाक्रम मे हम दोनो मौन थे| अब बलविंदर मेरे लिंग को खींच कर पता नही क्या करने का प्रयास कर रहा था जिससे मुझे पीड़ा हो रही थी मैने भी बदले की भावना से उसकी लिंग को खींचा तो सहजता से उसके लिंग की मांसपेशिया खींच कर पीछे हो गई और उसके लिंग मुख जो की गुलाबी रंग का था चमकने लगा|मैने अपने जीवन मे पहली बार लिंग का यह रूप देखा था अन्यथा मुझ सहित मेरे सभी बाल मित्रोंका लिंग एक समान ही था, (विपिन भईया का तो मैं कभी देख ही नही पाया था क्योंकि वह सदैव मुझे औंधे मुँह लेटाकार मेरे उपर लेट जाते थे ओर तभी उठते थे जब वो स्खलित हो जाते थे|)|

मैने जिज्ञासावश अपने लिंग को देखा जो किसी नन्हे बालक सा प्रतीत हो रहा था बलविंदर के बलिष्ठ लिंग के तुलना मे, मुझे अपने आप पर संकोच हुआ|  बलविंदर झूककर बैठ गया ओर मेरे लिंग को मुँह मे लेकर चूसने लगा, मेरे लिंग ने प्रतिक्रिया स्वरूप तन गया था| जब भी बलविंदर मेरे लिंग की त्वचा को पीछे की ओर खींचता मुझे पीड़ा होती| अंतंत बलविंदर ने पहली बार मेरी और देखा ओर कहा, मैं सब ठीक कर दूँगा, देख मेरे लन (penis)  नू एक मर्द दा लन एन्वा होना चाहिए लन दा टोपा ऐसा बड़ा ओर चमकदार होना चाहिए, तेरे जैसे छुईमुई नहीं, तू तो रुपल से भी ज़्यादा मुलायम है (रुपल उसकी पुत्री थी)| हम दोनो की आँख मिली ओर उसने कहा, 'ले मेरे लन को मुँह मे ले कर देख, एदा स्वाद चख होर दस"| 

 

मैं संकोच वश वहाँ से भागकर उपर अपने कक्ष मे जाकर अपने वस्त्र पहन कर सोने चला गया| भूख के कारण नींद भी नहीं आ रही थी फिर भी दुविधा व थकान के कारण कब पेट के बल अपना चेहरा तकिये मे छुपाकर सो गया कुछ ज्ञात नही कब मध्य रात्रि मे मेरी नींद भंग हुई तो प्रतीत हुआ जैसे की कोई मेरे शरीर से खेल रहा है, मैं नीचे से पूर्ण नग्न था, मेरे लिंग मे कसावट थी व मेरी गुदा गीली थी, मैने आँखे बंद ही रखी ओर सोने के अभिनय करता रहा| बलविन्दर मेरे नितम्बों को चाट रहा था संभवत: उसकी लार से ही मेरी गुदा गीली हुई थी| उसने धीरे से मेरी टांगे फैला दी और उनके मध्य मे लेटकर मेरी गुदा को चाटना (ass licking) प्रारम्भ कर दिया| मेरी साँसे तेज होने लगी व स्वत: ही टांगे फैलने लगी| अचानक से बलविन्दर ने मेरे गुदा द्वार मे थूका व तब तक थूकता रहा जब तक की वह बह-बह कर मेरी जाँघो से रिसने नहीं लगा| उसने मेरे नितंबो को अपनी हाथों से फैलाया तो अपने जिव्हा से मेरे गुदाद्वार को चाटने (rimming) लगा| मेरी साँसे और तेज हो गई लिंग से तरल वीर्यद्रव्य रिसने लगा हालाँकि लिंग मे पर्याप्त तनाव नही था|

अचानक ही मेरे मुँह से 'आह' का स्वर निकला किंतु ना ही मैने और ना ही बलविंदर ने कोई प्रतिक्रिया दी व इस तरह का व्यवहार किया जैसे कुछ हुआ ही ना हो| वो किसी मदमस्त जानवर की भाँति मेरे गुदा छिद्र मे थूकता व अपनी जिव्हा से उस थूक को मेरे गुदा के भीतर धकेल देता कभी कभी जिव्हा से गुदा के अंदर जिव्हा डालकर उसे खोदता और छिद्र को और फैलाता| मेरे शिथिर लिंग से तरल वीर्यद्रव्य (precum) रिसने लगा मैं स्वत ही अपनी गुदा को ऊँचा उठा कर उसके चहरे पर धकलने लगा| संभवत: बलविंदर को आभास हो गया था की मैं भी उसकी भाँति मदमय हो गया हूँ व अपने मौन से उसकी इस कामक्रीड़ा मे मूक भाग ले रहा हूँ| उसने मुझे पलट दिया व मेरी टांगे उठा कर हवा मे लहरा दी व खुद घूमकर मेरे मुँह के उपर आ गया| मैने आँखे बंद ही रखी ताकि ये भ्रम उत्पन्न बना सकूँ की मैं निंद्रा मे हूँ और जो हो रहा है मुझे उसका ज्ञान नहीं| किंतु बलविंदर के लिंग की पुरजोर गंध आ रही थी जो अपनी सभी लिंग की नसो की प्रबलता के साथ यौवन की चरम सीमा पर पहुँच चुका था| उसके लिंग से तरल द्रव्य एक लार की तरह टपक रहा था| जैसे ही वो लार वाला द्रव्य मेरे होंठों पर गिरा मेरी आँख खुल गई, उसकी द्रव्य-धारा ने मेरे मुख और उसके लिंग के मध्य एक सेतु भाँति सम्बन्ध कायम कर लिया था| मैने उसके लिंग से निकली द्रव्य धारा को मुँह खोलकर टपकने दिया, स्वाद बुरा नही था| इतने मे ही बलविंदर और मेरी आँखे मिली और उसने धपाक से अपने लिंग को मेरे मुँह मे धकेल दिया| इस क्षण को व्याखित करना कठीन है अत: इस चित्र के माध्यम से मै इसे पूर्णजीवित कर रहा हूँ - कदापि ये चित्र उस क्षण को शत प्रतिशत व्याखित करता है|

Super sixty nine

कुछ सूझ नही रहा था आँखे मिल चुकी थी और अभिनय कदापि संभव नही था उपर से बलविंदर का बलपूर्वक मेरे गुदाछिद्र (asshole) को चाटना व फैलाना मुझे मादित कर रहा था, उसकी आँखों मे मानो किसी मदमस्त जानवर के भाँति यौन चर्म पर था| उसने मेरे मुख मे अपने लिंग को उपर नीचे धकेलना जारी रखा व बीच बीच मे अपने शरीर का पूरा भार मेरे मुँह पर रखकर लिंग को पूरी तरह से मेरे मुख मे प्रविष्ट कर थम जाता| थूक बह बह कर मेरे पेट से होते हुए मेरी छाती पर एकत्रित होने लगा किंतु उसके जिव्हा मेरे गुदा छिद्र को किसी साँप की भाँति अंदर तक सिहारने लगी| जैसे ही बलविंदर अपने लिंग को मेरे मुख के भीतर पूरी तरह से प्रविष्ट करा कर रुक जाता मैं भी अपनी गुदा (arse) को और ऊठा कर उसके होंठों पर चिपका देता| मेरी मादुकता भी चर्म पर आ गई थी और मैने बिना कोई देर किए उसके लिंग को चूसना आरम्भ कर दिया| कुछ समय पश्चात जब उसने लिंग को खींच कर मुख से निकाला तो अब उसका लिंग मेरी लार व उसके लिंग द्रव्य (precum) से पूरी तरह से गीला हो गया था| बलविंदर के लिंग से अब लार मेरे मुँह पर टपकने लगी और अब उसके लिंग से निकलता द्रव्य गाढ़ा होता गया, उसने फिर से एकबार बलपूर्वक अपना लिंग पूरा मेरे मुख मे समाहित कर दिया और मेरे नितंबो को चूसने लगा| उसका लिंग मेरे मुख के भीतर मत्स्य की तरह फड़फड़ाया और वीर्य उडेलेने लगा| कुछ समय पश्चात पुरा कमरा मादक गंध से भर गया| हम दोनो पसीने से तर-बतर हो गये थे| अब बलविंदर का लिंग मेरे मुख के अंदर शांत होने लगा और उसका मेरे नितंबो को चूसते चूसते, काटना आरंभ हो गया उसने आख़िरी बार मेरे नितंबो की इतनी ज़ोर से काटा की मैं कराह उठा, स्वर इसलिए नही निकाल सका क्योंकि उसने अपने लिंग से मेरे मुख को बंद कर रखा था| जब तक उसके वीर्य की आखरी बूँद मेरे मुख मे नही समाहित हो गई उसने अपने बल से मेरे मुख को बंद ही रखा| मेरी आँखो से आँसू बह रहे थे मुख से वीर्य बह रहा था, गुदा थूक से भरी हुई थी| जब बलविंदर का लिंग थोड़ा शांत हुआ तो उसने आराम से उसे बाहर खींचा उसका लिंग किसी उस सर्प की भाँति चमक रहा था जिसने अभी अभी अपनी केंचुली बदली हो| उसका लिंग जैसे किसी घी के पात्र से डूबा कर निकाला हो उस भाँति चमक रहा था उसमे जगह जगह वीर्य किसी माखन की तरह पिघल कर टपक रहा था|

अब मेरी सब लाज जा चुकी थी बचाने या छुपाने के लिए कुछ नही था, बलविंदर ने अपने सारे कपड़े उतार दिए और मेरे भी उतार दिए और मुझे अपनी गोद मे बैठा कर मुझे किसी शिशु की भाँति निहारने और सहलाने (caressing) लगा| मैं भी मदमय होकर उसकी पीठ पर हाथ फैराने लगा| उसके और मेरे लिंग से अभी भी द्रव्य बह रहा था हम दोनो के लिंग हम दोनो के मध्य हमारी भाँति ही एक दूसरे के आलिंगन मे थे| अब बलविंदर ने मेरे होठों को चूसना आरंभ किया व अपनी हथेलियों से मेरे नितंबो के मालिश करने लगा| उसका लिंग दोबारा पुन: अपने आकार को बढ़ाने लगा, उसके लिंग की त्वचा स्वत: ही खींच कर नीचे चली गई और उसका लिंग मुंडन (सुपाड़ा/ dickhead) फिर से जैसे मेरी और देखने लगा| हम दोनो अभी भी यौन चर्म पर थे और बलविंदर ने उत्साहपूर्वक मुझे खींच कर अपनी छाती से भींच लिया व जबरन पानी जिव्हा से मेरे मुख का रसापान करने लगा| मैने भी सहयोग करते हुए उसके साथ दिया और अपनी जिव्हा से उसके मुख का रसापन किया, हालाँकि उसकी दाढ़ी-मुँझे चुभ रही थी किंतु मादकता के चर्म पर वो भी कपास (cotton) लग रही थी| जैसे ही मैने सहयोग पूर्वक उचकर उसके होंठो को चूसा बलविंदर के बढ़ते हुए लिंग ने रूठ कर मेरे लिंग के आलिंगन को छोड़कर मेरे नितंबो (asses) के मध्य से होते हुए हल्के हल्के थपेड़े मेरी गुदा पर मारने आरंभ कर दिए| उसके मुख से मेरी लार टपकने लगी व मेरे मुख से उसकी लार टपकने लगी|

बलविंदर ने मुझे धकेल कर लेटा दिया व मेरे मुँह के सामने अपने लिंग को लाकर कहने लगा, "इस पर थूक"| मैने उसके लिंग पर थूक कर उसे पूरा गीला कर दिया, बलविंदर ने मेरे नितंबो को सहलाते हुए मेरी गुदाछिद्र को फैलाया और फिर उसमे थूक भरने लगा| जब मेरे गुदाछिद्र से उसका थूक बहने लगा तो उसने तपाक से मेरे पीछे आकर अपने लिंग मुख को मेरे गुदाछिद्र पर रगड़ना प्रारम्भ कर दिया| धीरे-धीरे से वो अपने लिंग को मेरे गुदाछिद्र से गुदा के अंदर प्रविष्ट करने का प्रयास करने लगा व मेरे कानो को चूसने (earlobes sucking) लगा व पेट को सहलाने लगा| जैसे जैसे उसका लिंग भीतर होता गया मेरी पीड़ा बढ़ती गई, उसके आधे लिंग ने अभी प्रवेश किया होगा की पीड़ा असहनीय हो गई मैने बलविंदर को हटने के लिया कहा व धकेला भी किंतु सब व्यर्थ गया| वो किसी ड्रेगन की भाँति मुझ पर पूरी तरह से हावी था उसने मुझे खींच कर अपने और समीप कर लिया व एक ज़ोर के धक्के के साथ पूरा लिंग मेरी गुदा मे प्रविष्ट कर दिया| उसके एक हाथ ने मेरे मुँह को भीच रखा था व दूसरे हाथ ने मेरी कमर को कस कर उसके लिंग के साथ चिपका रखा था|  सब कुछ शांत हो गया था उसके साँसे थम गई थी, मेरे शरीर अकड़ गया था व पीड़ा असहनीय (unbearable pain) थी| मेरी आँखो से अश्रु बह रहे थे साँसे तेज थी व शरीर अकड़ा हुआ था...

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जैसे जैसे उसका लिंग भीतर होता गया मेरी पीड़ा बढ़ती गई, उसके आधे लिंग ने अभी प्रवेश किया होगा की पीड़ा असहनीय हो गई मैने बलविंदर को हटने के लिया कहा व धकेला भी किंतु सब व्यर्थ गया| वो किसी ड्रेगन की भाँति मुझ पर पूरी तरह से हावी था उसने मुझे खींच कर अपने और समीप कर लिया व एक ज़ोर के धक्के के साथ पूरा लिंग मेरी गुदा मे प्रविष्ट कर दिया| उसके एक हाथ ने मेरे मुँह को भीच रखा था व दूसरे हाथ ने मेरी कमर को कस कर उसके लिंग के साथ चिपका रखा था|  सब कुछ शांत हो गया था उसके साँसे थम गई थी, मेरे शरीर अकड़ गया था व पीड़ा असहनीय (unbearable pain) थी| मेरी आँखो से अश्रु बह रहे थे साँसे तेज थी व शरीर अकड़ा हुआ था...

कामदेव का उपासक | Kaamdev Ka Upasak | Update 5

बिन ब्याहे ही पत्नी धर्म निभाया | Bin Byahe hi Patni Dharm Nibhaya

Super sex

हम दोनो लगभग २ मिनिट तक ऐसे ही शांत लेटे रहे, मेरे अश्रु पीड़ा से बह रहे थे और बलविंदर मेरे उपर अपना पूरा भार डाल कर आराम कर रहा था, उसका आधा लिंग मेरी गुदा मे धंसा हुआ था ओर मेरा मुहँ उसकी छाती के बालो पर| वो हल्के हाथों से मेरे सिर के बालो के सहलाने लगा व अल्पमात्र नीचे की और खिसका, जब वो नीचे सरका तब जाकर मैं खुल कर साँस ले पाया|  बलविंदर ने मेरे बहते अश्रुओं को देखा और उन्हें चाटने लगा, मैने अपने भीतर की ग्लानि से आँखे बंद रखी, वो मुझे चूमता व चाटता रहा| मेरी इस हालत से बलविंदर कुछ सकपका गया उसे प्रतीत हुआ की मैं सहभाग नहीं कर रहा हूँ व उदास हो गया हूँ तो उसके कहा, "नंदन, I am sorry Yaar" बलविंदर मेरे उपर से हटने लगा व अभी अपना लिंग खीच के बाहर निकालने लगा| मेरी स्थिति असमंजस की थी अभी कुछ क्षण पहले मैं कामुक्त भाव से सहयोग व सहभागी था यथाशीघ्र ही मैं अपरधाबोध व ग्लानि मनोस्थिति मे परवर्तित हो गया, इसी उधेड़बुन मे मैने अपने दायें पैर को बलविंदर की चेहरे के आगे से घुमाकर यौनलिंगन से छूटने का प्रयास किया तो मेरा गुदाछिद्र तनिक सा सहज हुआ और धपाक से उसका लिंग फिसल का बाहर आ गया| इसी क्रमवश मे निश्चित ही बलविंदर भी कदापि हीन भाव मे आ गया था| वो बिछोने से उठकर नग्न ही सामने रखे आसान पर बैठ गया व बची हुई मदिरा पीने लगा, मैं भी अपनी वही कछ्छी (panty, जो की सत्य मे उसकी पुत्री रूपॅल की थी) उठा कर पहने लगा तो ज्ञात हुआ वो भी गीली हो चुकी है, क्योंकि मेरी इसी कछ्छी (panty) से बलविंदर ने कई बार अपने लिंग व मेरी गुदा से टपकते हुए द्रव्य को साफ किया था अत: लाचारवश मुझे भी नग्न अवस्था मे बिछोना छोड़ना पड़ा| 

मैं जैसे ही बलविंदर के समीप से निकला उसने बिना मेरी और देखे बुद्बुदाया "भेंचो सारा मूड ही खराब कर दिता" ओर फिर से मदिरा पात्र से घूँट लेने लगा| मैं भीतर वाले कक्ष मे नग्न ही बैठ गया और विचार करने लगा की विपिन भैया ने जब मेरे से यौन संबंध बनाए थे तब तो मुझे लेश मात्र भी पीड़ा नही हुई थी, फिर अब क्यों? फिर विपिन भैया की वो सीख भी स्मरण हो गई जब उन्होने मुझे यौन संबंधो मे समझोते का महत्व, उनके अनुसार पत्नी भी पति से यौन संबंध इसी समझौते के कारण ही निभाती है जो नही निभाती उन्हें उसका मूल्य भी चुकाना होता है| तभी बाहर से बलविंदर का स्वर सुनाई पड़ा "नंदन तू भेन्चौ कल अपने घार चला ज़ाइं, मैं तेनू एन्वी पास कर देवेंगा , कोई लोड नही तेनू  टुशण दी". हम सभी छात्र उनकी पंजाबी व हिन्दी मिश्रित भाषा को समझते थे इसी कारण मुझे उनकी बातों कर अर्थ समझने मे किंच मात्र भी समस्या नही आई, मैं बिना कोई उत्तर दिए बैठा रहा| अब मुझे काटो तो लहू नहीं मैं निस्तबध हो गया, समझ नही आ रहा था की प्रसन्न हूँ या दुखी| प्रसन्नता भीतरी कामुकता को रही थी और दुखी बुद्धि कर रही थी, पिताजी को क्या कहूँगा, क्योंकि सत्य हम दोनो से कोई बताएगा नही और अगर गुरुजी ने मुझे घर वापिस भेज दिया तो निश्चित दोष मेरा ही माना जाएगा| मैं भीतर चुप्पी साधे बैठने के अतिरिक्त कुछ कर भी नही सकता था, वस्त्र धो दिए थे, अपराध बोध से नींद भी नही आ रही थी और बाहर बलविंदर रुष्ट होकर मदिरपान कर रहा था उसके सामने जा भी नही सकता था वार्तालाप के तो कोई अर्थ ही नही था| 

लगभग १० मिनिट पश्चात बलविंदर ने प्रवेश किया, वो अभी भी निर्वस्त्र था व उसका लिंग सिकुड चुका था हालाँकि अभी भी उसमे से चाशनी की धार जैसे द्रव्य ( ) टपक रहा था, अभी भी उसकी आँखों मे कामुकता भरी हुई थी| वो मेरे समीप आकर खड़ा हो गया व मेरे बालों को सहलाते हुए मेरे चेहरे को अपने पेट से सटा कर कहने लगा, "यार, ग़लती मेरी सी मई तेनू अपनी लुगाई बना रया सी, बुरा ना मनि होर किसी नू कुछ ना कहिन, सब भूल जा होर काल अपने घार चला ज़ाइन" यह सब कहते कहते वो मेरे गालों पर प्रेम से हल्के हल्के थप्पड़ मार रहा था| किंतु बलविंदर अभी भी यौनासीन मद मे था मुझे इस तरह से चिपटा के खड़ा था जैसे वो मुझे छोड़ना ही ना चाहता हो, मैं चुप्पी साधे केवल सुन रहा था वो उसके हल्के स्पर्शों व थपेड़ों से ना केवल सहज हो रहा था अपितु आनन्दित भी था| अब हम दोनो शांत थे व सहज हो रहे थे कि मुझे उसके लिंग की गंध आने लगी जो स्वत: ही किसी रास्यानिक प्रतिकिया हेतु मुझे मादित करने लगी| उसका लिंग अभी भी अपने मुख से हल्की तार की तरह से रिस रहा थे जो निश्चित उसका वीर्यद्रव्य (precum ) था, बीच-बीच मे उसका लिंग हल्के-हल्के झटके भी मार रहा था| बलविंदर ने मुझे सहलाते हुए अपने शरीर को तनिक सा सीधा किया तो मेरा चेहरा खिसक कर लगभग उसकी झान्टो पर आ गया| एक तो उसके मुख से आती मदिरा की गंध उपर से रिसते हुआ लिंग व थूक, वीर्य व मुख लार से लिप्त उसकी झान्टो की गंध ने स्वत: ही अपने रासायनिक व्यवहारानुसार (chemical reaction) मुझे फिर से मादित करना प्रारम्भ कर दिया| मेरी सांसो से निकलती गर्म वायु उसके लिंग से टकराते ही उसका लिंग अपनी यौवन रूप मे प्रकट होने लगा| अचानक तीव्रता के साथ उसके लिंग ने झटके लेने आरंभ किए व लिंग के नसे उभरने लगी, लिंग कसाव के साथ साथ अधिका मात्रा मे द्रव्य मेरे पैरों पर एक धार की भाँति रिसने लगा| अभी उसका लिंग पूर्ण रूप से आकार नही ले पाया था की उसने मेरे होठों व नाक के छिद्र मे घुसने के प्रयास आरंभ कर दिए| निश्चित ही बलविंदर की पश्चाताप वाली भावना सुप्त रूप मे चली गई और कामुकता फिर से जाग गई अब उसके सहलाना सिर से सरककर मेरी पीठ पर आ गया व मुझे अपनी बलिष्ठ हथेलियों से अपनी जंघाओं के भीतर मेरे मुँह को धकेलने लगा|  उसने एक हाथ से मेरा मुँह पकड़कर अपनी झान्टो पर दबा दिया मुझे श्वास लेने मे असुविधा होने लगी तो मैने बॅल्प्र्वॅक अपने सिर को उसके चुंगल से मुक्त किया वा लंबी साँस ली, बलविंदर ने क्षणभर अपने दूसरे हाथ से अपने लिंग को पकड़कर मेरे होंठों पर रगड़ना आरंभ कर दिया| मैं कुछ समझता इस से पूर्व ही उसने अपना लिंग मेरे मुँह के भीतर प्रविष्ट करा दिया|  

बलविंदर धीरे-धीरे फिर मदमस्त होने लगा व मुझे भी मादित करने लगा| वो मेरे चेहरे को सहलाते हुए इंच इंच कर घुसता जा रहा था अब उसने लगभग तीन चौथाई लिंग को मेरे मुँह के भीतर प्रविष्ट करा दिया था| मेरे मुँह से स्वत: ही धीं-धीं का स्वर निकलने लगी व जैसे जैसे लिंग भीतर घुसता गया मेरी नाक व आँख से पानी टपकने लगा व मुँह से धीं-धीं की आवाज़ आने लगी| बलविंदर ने बलपूर्वक मेरे सिर को धकेल कर अपना पूरा लिंग मेरे मुँह से गले तक प्रविष्ट करा दिया व हल्के-हल्के धक्को से आगे-पीछे करने लगा| मेरी अवस्था बुरी हो रही थी और बलविंदर आँखे मुंदे छत के और देख रहा था| कुछ देर पश्चात उसने एक ज़ोर के झटके के साथ पूरा लिंग मूँह मे भर दिया व मेरा मूँह उसकी झाआँटों से चिपक गया| मुझे उसके लिंग के फड़फड़ाने की त्रीवता अपने कंठ मे स्पष्ट रूप से आभासित हो रही थी, उसने अपने लिंग को फिर से एक बार खींचकर बाहर किया और मेरे मूँह से निकलती लार व नाक व आँख से टपकते पानी से उसका लिंग भीग गया, उसके लिंग की नसें मानो फटने को व्याकुल हों उनका रंग व सुर्ख नीला हो गया था और मोटाई तो मानो किसी पाइप मे पानी भर गया हो ऐसी हो गई थी| मैने तुरंत ही लंबी लंबी साँस ही थी की बलविंदर ने फिर से अपना लिंग मेरे मुख मे ५-१० बार आगे-पीछे किया और अंत मे जड़ तक मेरे अंदर समा दिया| हम दोनो को पसीने आ गये थे उसने मेरे सिर को मजबूती से थामे रखा व फिर उसके लिंग ने छटपटाते हुए मेरे मुख के भीतर वीर्य उडेलना आरंभ कर दिया| ज्ञात नही कितना और कितनी देर तक वो मेरे मुँह को अपने वीर्य से भरता रहा, कुछ क्षणों के बाद उसके लिंग ने सिकुड़ना प्रारम्भ किया तब जा कर उसने अपनी पकड़ ढीली की| जैसे ही बलविंदर ने अपनी पकड़ ढीली की मैने तुरंत अपने को पीछे धकेला व साँस लेने का प्रयत्न किया, उसका लिंग मेरे मूख से धड़ाम से किसी माँस के लोथडे की तरह फिसलकर बाहर आ गया, वो किसी शहद के पात्र मे से भिगो कर निकाली गई उंगली की तरह चमक व पूर्ण रूप से मेरी लार व अपने वीर्य के मिश्रण से टपक रहा था| बलविंदर के शरीर से पसीने व लिंग से वीर्य टपक रहा था व मेरे शरीर से पसीने के अतिरिक्त मेरी आँखो व नाक से पानी बह रहा था और मुख तो मानो कोई माखन का पात्र था इतना वीर्य से भर गया था की मेरे होठों से टपक रहा था|  टांगे काँप रही थी व शरीर थर्रा रहा था| मेरी अवस्था बेहद दयनीय हो गई थी|

मैं उठाकर शौचालय मे गया व अपने मूँह को धोया, हाथ डालकर जिव्हा को साफ करने लगा तो मानो उल्टी आ गई हो कुछ नही तो कम से कम ५० ग्राम घी की तरह गाढ़ा द्रव्य निकालने लगा जो की संभवत: मेरा थूक, लार व बलविंदर के वीर्य का मिश्रण था, ऐसा प्रतीत हो रहा था की शरीर से सब कुछ निकल गया है पेट तक की आंते हिल गई थी, गला मानो अंदर से किसी ने घीस दिया हो| यह समझ आ गया था की संभवत: ये मेरे जीवन के प्रथम वास्तविक मुख मैथुन था| अपने को साफ करके जब मैने भीतर कमरे मे प्रवेश किया तो पाया बलविंदर भी आसन मे यूँही नग्न बैठा हुआ हाँफ रहा था| मैने शौचालय मे ही निश्चित कर लिया था की मैं यथा संभव समझोता व सहयोग करूँगा व परीक्षा मे उत्रीण हो जाउँगा और कल घर लौट कर माताजी को मना लूँगा तो वो पिताजी को समझा कर शांत कर देंगी| मैने मन ही मन मे निश्चय कर लिया था की मैं घर लौट जाउँगा, जैसा बलविंदर चाहता है किंतु उस से पहले विपिन भैया के दिए मंत्र समझोता व सहयोग देकर अपने उत्रीण होने की संम्भावना को पक्का कर लूँगा| मुझे ऐसा लगा की संभवत: बलविंदर का कार्य पूरा हो गया है मुझे और कुछ नही करना है, सहयोग व समझोता तो मैं पहले ही कर चुका हूँ|

To be Continued

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