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चुदासी घोड़ीयों की टोली | Chudasi Ghodiyon Ki Toli

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Rakesh Bhai
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लल्ली↞‟बहुत अच्छा मौका है बुरचोदी, रोज-रोज पहुंच कर पेल दीया कर उंगली! इतनी गरमी बढ़ा दे उसकी बुर-रानी की, की, लंड के लीये तड़प उठे! कब से मेरी मसां है उसे चुदवाते हुए देखने की। उसकी मस्त गठीली तो कहीं लचीली जैसी नंगी बदन को देखने की।”

सन्नो↞‟चींता मत कर तू! अब उसकी नदी सुखने नही दूंगी, उसकी मछली में अब तो कटीया फसां कर ही दम लूंगी...हां!!”

वाक्य खतम कर चूकी, सन्नो, लल्ली के साथ खील-खीला कर हसंने लगती है। और कुछ ही देर मे...घास का गट्ठर बांधते हुए गाँव की तरफ़ रवाना हो जाती है...

चुदासी घोड़ीयों की टोली | Chudasi Ghodiyon Ki Toli | Update 10

शाम हो चूकी थी। कम्मो घर के पीछवाड़े वाले छोटे से खेत पर पहुंची तो देखी...बबलू उसका बेटा, खेत की क्यारीयां सीचने में ब्यस्त था। धीरे-धीरे कदमो के साथ, पायल की मधुर गीत छनकाती वो अपने बेटे बल्लू के करीब पहुंची! बल्लू इस समय सीर्फ एक अंगीया पहने हुए, नीचे छुका क्यारीयों की नाली साफ कर रहा था।

उसका बलीष्ट और गठीला शरीर देखकर, कम्मो के खुबसूरत चेहरे पर एक मुस्कान की लहर बीखर पड़ी। ऐसा लगा मानो डूबती शाम का एक अनोख़ा अहेसास हो उसकी मुस्कान। वाकई खुबसूरती की मूरत थी वो।

बबलू का ध्यान अभी भी काम में ब्यस्त था, कम्मो बीना कुछ बोले, वहीं नीचे खेत की पकडंडी पर बैठ जाती है, और आँखों में प्यार का समंदर लीये, अपनी ठुड्डी को पैर के घुटनो पर रखते हुए, अपने बेटे को नीहारने लगती है।

ढल रही सुहानी शाम के एक हवा के झोंके ने; उसके रेशमी बालों को लहरा दीया...ऐसा लगा! मानो प्रेम की हवा चली हो। कारी-कजरारी, हीरनी जैसी चंचल आँखों से, अपने बेटे को इस तरह नीहार रही थी कम्मो, जैसे प्रेमीका अपनी प्रेमी की दीवानी होकर नीहारती हो...

बबलू का ध्यान काम पर से भटका तो, उसकी नज़र उसकी माँ पर पड़ गयी! खुद की माँ को, इतने प्यार से नीहारते देख, बबलू के चेहरे पर भी प्यार के फूल खील गये। मुस्कुराता हुआ मगर नीरतंर काम में लगा...बोला-

बबलू↞‟क्या बात है माँ? बड़ा प्यार आ रहा है मुझ पर?”

मगर शायद, कम्मो को बबलू की बातों का असर ना हुआ! वो अपलक ही एक-टक दीवानी की तरह बबलू को नीहारे जा रही थी। जवाब में उत्तर ना पा-कर, बबलू ने एक नज़र अपनी माँ की तरफ़ दौड़ायी और फीर एक मुस्कान बीखेरते हुए, पानी के छींटे को अपने हाथो सें मारते हुए, अपनी माँ के उपर बौछार कर देता है।

जैसे कोई प्रेमी, प्रेम का खेल खेलते हुए पानी की छींटे अपनी प्रेमीका पर उड़ाता है। पानी की बूंदे, कम्मो के फूल से खीले कोमल चेहरे पर पड़ते ही उसकी तंद्रा भंग हुई तो खुद को संभालते हुए मुस्कुरा कर बोली...

कम्मो↞‟ये...क्या कर रहा है?”

मगर इस बार, शायद बबलू के उपर कम्मो की बातो का कुछ असर नही हुआ और वो लगातार नाली में बह रहे स्वच्छ पानी को, अपने हाथों से मारते हुए ,छींटे कम्मो पर बरसाने लगा! कम्मो अपना चेहरा बचाते हुए, अपने दोनो हाथों को आगे कीये, पानी के मोटे छल्लो को रोकने का प्रयास करने लगती है...

कम्मो↞‟मत कर...!भीग जाउगीं पगले!!”

इसी तरह कुछ लम्हे तक खेल चलता रहा, कम्मो मुस्कुराते हुए ख़ुद को पानी के छींटो से बचाने का प्रयास करती रही, और वही मस्ती में बबलू लगातार छींटे उसके उपर उड़ाता रहा!

खेल जब शांत हुआ तो...

कम्मो↞‟हाय राम...!मुंए ने पूरा भीगा कर रख दीया! काहे कीया रे?”

ये बोलकर, कम्मो अपनी साड़ी के आँचल को कंधे पर से हटाती हुई, भीगे हुए चेहरे, गले और वीशाल-काय मांसल वक्ष स्थल के गुदाज गोरे उभार पर पानी को पोछने में लग जाती है। बला की कयामत लग रही थी, इस अवस्था मे कम्मो! पहाड़ी के समान सर उठाये; उसके हल्के लाल रंग की ब्लाउज़ में कसे उरोज़ और गज़ब का उभार लीये ब्लाउज़ से झांकते उसके उरोजो का उपरी भाग, गदराया दूधीया गोरा पेट और पेट के मध्य में गहरी नाभी, हांथ में पकड़ी साड़ी का अँचल लीये जैसे ही कुछ कहते हुए...अपने बेटे की तरफ देखी...

बबलू अपना सूद-बूद खो कर, बेसूद अपनी माँ की खूबसूरत और कामुक बदन में खो गया था। ये देख कर, कम्मो शर्म से पानी-पानी हो गयी। ख़ुद के बेटे को अपनी मस्तानी बदन का दीदार करता देख...उसके शरीर के कामुक अंगो में चींटीया रेंग पड़ी। शरमा कर नज़रे झुकाते हुए, कम्मो नें अपने बेपर्दा हुश्न पर, साड़ी के आँचल का पर्दा धीरे से ओढ़ा दीया।

गज़ब के हुश्न पर पर्द पड़ते ही, बबलू की आँखो में पड़ा मस्ती का पर्दा, बेपर्दा हुआ तो...मानो नींद से जागा हो, अपनी माँ को नज़रें झुकायी खड़ी देख, छटपटा कर इधर-उधर देखते हुए, बीना कुछ बोले काम में फीर से जुट जाता है...

कम्मो ने धीरे से अपनी नज़रों को उपर उठाते हुए बबलू को देखा तो, अब वो काम मे जूटा था। राहत की साँस तो मीली...मगर शर्म की चादर ना हट सकी! बबलू से बात करने की हीम्मत ना रही उसमे...और घुमते हुए अपनी दाँतों तले एक उँगली दबाते हुए, शर्म की हसीन मुस्कान लीए घर की तरफ़ चल पड़ती है...

बबलू ने काम करते हुए, चुपके से एक नज़र अपनी माँ की तरफ़ घुमाई तो, टुमक रहे चौड़े कुल्हे देख कर होश खो बैठा...

थोड़ी दूर चलने के बाद, कम्मो ने अचानक ही नज़र एक दफ़ा पीछे की ओर मोड़ दी, और जवाब मे उसे बबलू का अपनी तरफ़ देखना पाकर। एक बार फीर से शर्म की लालीमा चेहरे को रौशन कर गयी...

To be Continued

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Rakesh Bhai
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कम्मो ने धीरे से अपनी नज़रों को उपर उठाते हुए बबलू को देखा तो, अब वो काम मे जूटा था। राहत की साँस तो मीली...मगर शर्म की चादर ना हट सकी! बबलू से बात करने की हीम्मत ना रही उसमे...और घुमते हुए अपनी दाँतों तले एक उँगली दबाते हुए, शर्म की हसीन मुस्कान लीए घर की तरफ़ चल पड़ती है...

बबलू ने काम करते हुए, चुपके से एक नज़र अपनी माँ की तरफ़ घुमाई तो, टुमक रहे चौड़े कुल्हे देख कर होश खो बैठा...

थोड़ी दूर चलने के बाद, कम्मो ने अचानक ही नज़र एक दफ़ा पीछे की ओर मोड़ दी, और जवाब मे उसे बबलू का अपनी तरफ़ देखना पाकर। एक बार फीर से शर्म की लालीमा चेहरे को रौशन कर गयी...

चुदासी घोड़ीयों की टोली | Chudasi Ghodiyon Ki Toli | Update 11

घर के आँगन में, बेसुद खाट पर लेट गयी। हाथ की दोनो बाँहें दोनो दीशाओं में बेसुध पड़े थे। आँखें बंद थी...ख़यालों में उसका बेटा ही छाया था। खुद के मन से बाते करने लगी...

क्या हो गया है मुझे? क्यूँ सोंच रही हूँ उसके बारे में? ये पहली बार थोड़ी है, जब कोई मुझे इस नज़र से देख रहा था? पहले तो कभी कीसी के बारे में नही सोंचा? तो उसकी नज़रों में ऐसा क्या था? जो मैं उसके ख़यालो में डुबी जा रही हूँ। ये जानते हुए भी की वो...वो मेरा बेटा है और मैं उसकी माँ, फीर भी...?

खुद से बाते करते हुए, हज़ारो सवाल खड़ी कर चूकी थी कम्मो!

‟अरे...माँ, तू भीग कैसे गयी? और भीगे हुए इस तरह काहे पसरी है?”

खुद के ख़यालो से बाहर भी नीकली थी की, इस एक आवाज़ ने उसे ख़यालों की दुनीयां से ज़मीन पर ला पटका!

कम्मो के हाव-भाव कुछ नही बदले...सीर्फ आँखे खोली और शीतलता से बोली-

कम्मो↞‟बबलू ने भीगो दीया!!”

जवाब देने का अंदाज़ ऐसा था, मानो उसे नशा चढ़ा हो, आँखे भी अधखुली थी। ये सुनकर अंगूरी बोली-

अंगूरी↞‟बबलू ने भीगो दीया! मगर क्यू?”

कम्मो↞‟वो तो मुझे भी नही पता! खुद पूछ ले ना!”

जवाब और जवाब देने का अंदाज, दोनो ही अंगूरी को अज़ीब लगें, मगर इस चीज पर ज्यादा जोर ना देते हुए, अंगूरी बोली-

अंगूरी↞‟अच्छा ठीक है! अब उठ जा। और साड़ी बदल ले...भीगी साड़ी पहन कर लेटी है तू भी!”

ऐसा बोलकर...अगूरी वहां से चली जाती है। कम्मो ने एक बार फीर से अपनी आँखें बंद कर ली और ख़यालों की उसी दुनीयाँ में फीर से खो गयी....

To be Continued

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