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अद्भुत संजोग प्यार का | Adbhut Sanjog Pyaar Ka


Raj Sharma
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"उस दिन जब वो ड्रॉयिंग रूम में आई तो बरबस मेरा ध्यान उसकी टाँगो की ओर गया. मैं चाहता नही था मगर फिर भी खुद को रोक नही पाया. सिर्फ़ इतना ही नही, मेरी नज़र उसकी टाँगो से सीधे उस स्थान पर पहुँच गयी जहाँ उसकी टाँगे आपस में मिल रही थीं, उस स्थान पर जहाँ उसने ना जाने कितने समय से लंड महसूस नही किया था. उपर से वो टाइट जीन्स पहने हुए थी और उसने अपनी टीशर्ट जीन्स के अंदर दबा रखी थी जिस से उसकी टाँगो का वो मध्य भाग मुझे बहुत अच्छे से दिखाई दे रहा था बल्कि थोड़ा उभरा हुआ नज़र आ रहा था. उसके वो लफाज़ मेरे कानो में गूँज रहे थे जब मैं उसकी जाँघो को घूर रहा था.

वो अपनी फॅवुरेट जीन्स पहने हुए थी और वो स्थान जहाँ उसकी जांघे आपस में मिल रही थी वहाँ थोड़ा गॅप था जो उसकी चूत को हाइलाइट कर रहा था........खूब उभर कर. मैने माँ को पहले भी उस जीन्स में देखा था मगर टाँगो के बीच का वो गॅप मुझे कभी नज़र नही आया था ना ही वो तिकोने आकर का भाग. असलियत में, शायद मैने वो उभरा हुआ हिस्सा देखा ही नही था, शायद वो मेरी कल्पना मात्र थी. उसकी जीन्स काफ़ी मोटे कपड़े की बनी हुई थी इसलिए उस हिस्से को देखना बहुत मुश्किल था मगर आज मैं उसे एक अलग ही रूप में देख रहा था.."

अद्भुत संजोग प्यार का | Adbhut Sanjog Pyaar Ka

Adbhut Sanjog Pyaar Ka

अद्भुत संजोग प्यार का | Adbhut Sanjog Pyaar Ka: दोस्तो मैं यानी आपका दोस्त राज शर्मा एक और मस्त कहानी लेकर हाजिर हूँ और उम्मीद करता हूँ कि मेरी बाकी कहानियों की तरह ये कहानी भी आपको पसंद आएगी

दोस्तो ये एक ऐसा संयोग था अपनी माँ के साथ जिसके बारे में मैं आपको बताने जा रहा हूँ . दोस्तो ये तभी होता है जब सितारे किसी बहुत खास मौके पर किसी खास दिशा में लाइन बद्ध हों. मेरे ख़याल से इसे और किसी तरीके से परभाषित नही किया जा सकता. मैं घर के पिछवाड़े में क्यारियों में खोई अपनी बॉल ढूढ़ रहा था जब मैने माँ की आवाज़ अपने माता पिता के कमरे के साथ अटॅच्ड बाथरूम की छोटी सी खिड़की से आती सुनी. खिड़की थोड़ी सी खुली थी और मैं उसमे से अपनी माँ की फुसफुसाती आवाज़ को सुन सकता था जब वो फोन पर किसी से बात कर रही थी.

वो वास्तव में एक अदुभूत संयोग था. वो शायद बाथरूम में टाय्लेट इस्तेमाल करने आई थी और संजोग वश उसके पास मोबाइल था, जो अपने आप में एक दुर्लभ बात थी क्योंकि माँ बाथरूम में कभी मोबाइल लेकर नही जाती थी और संयोगवश मैं भी खिड़की के इतने नज़दीक था कि वो क्या बातें कर रही है सॉफ सॉफ सुन सकता था.

मैं कोई जानबूझकर उसकी बातें नही सुन रहा था मैं तो अपनी बॉल ढूँढ रहा था मगर कुछ अल्फ़ाज़ ऐसे होते हैं कि आदमी चाह कर भी उन्हे नज़रअंदाज़ नही कर सकता, खास कर अगर वो अल्फ़ाज़ अपनी सग़ी माँ के मुँह से सुन रहा हो तो. जब मैने माँ को वो बात कहते सुना तो मेरे कान खड़े हो गये: "अब मैं तुम्हे क्या बताऊ. मुझे तो अब यह भी याद नही है कि लंड का स्पर्श कैसा होता है. इतना समय हो गया है मुझे बिना सेक्स के"

पहले पहल तो मुझे अपने कानों पर यकीन ही नही हुआ कि शायद मैने सही से सुना ही नही है, मैं अपनी साँसे रोक कर बिना कोई आवाज़ किए पूरे ध्यान से सुनने लगा.

तब वो काफ़ी समय तक चुप रही जैसे वो फोन पर दूसरी और से बोलने वाले को सुन रही थी और बीच बीच 'हाँ', 'हुंग', 'मैं जानती हूँ' कर रही थी. आख़िरकार अंत में वो बोली "मैं वो सब करके देख चुकी हूँ मगर कोई फ़ायदा नही. अब हमारी ज़िंदगी उस पड़ाव पर पहुँच गयी है जिसमे सेक्स हमारी रोजमर्रा की जिंदगी की ज़रूरत नही रहा"

उफफफ्फ़ मैं अब जाकर समझा था. मेरी माँ अपनी सेक्स लाइफ से संतुष्ट नही थी और फोन पर किसी से शिकायत कर रही थी या अपना दुखड़ा रो रही थी. फोन के दूसरे सिरे पर कॉन था मुझे मालूम नही था मगर जो कोई भी था जाहिर था माँ के बहुत नज़दीक था. इसीलिए वो उस शख्स से इतने खुलेपन और भरोसे से बात कर रही थी.

फिर से एक लंबी चुप्पी छा जाती है और वो सिर्फ़ सुनती रहती है. तब वो बोलती है "मुझे नही मालूम मैं क्या करूँ, मेरी समझ में कुछ नही आता. कभी कभी मुझे इतनी इच्छा होती है चुदवाने की, मेरी चूत जैसे जल रही होती है, कामोउत्तेजना जैसे सर चढ़ कर बोलती है, और मैं रात भर सो नही पाती और वो दूसरी और करवट लेकर ऐसे सोता है जैसे सब कुछ सही है, कुछ भी ग़लत नही है"

मैने कभी भी माँ को कामोउत्तेजना शब्द के साथ जोड़ कर नही देखा था. वो मेरे लिए इतनी पूर्ण, इतनी निष्कलंक थी कि मैं जानता भी नही था कि उसकी भी शारीरिक ज़रूरतें थीं मेरी...मेरी ही तरह. वो मेरे लिए सिर्फ़ माँ थी सिर्फ़ माँ, एक औरत कभी नही.

मैं जानता था माँ और पिताजी एक साथ सोते हैं और मेरे मन के किसी कोने मे यह बात भी अंकित थी कि उनके बीच आत्मीय संबंध थे मगर अब जब मैने अपने मन को दौड़ाया और इस बात की ओर ध्यान दिया कि आत्मीयता का असली मतलब यहाँ चुदाई से था. मैने कभी यह बात नही सोची थी कि मेरे पिताजी ने मेरी माँ को चोदा है और अपना लंड माँ की चूत में घुसेड़ा है, वो लंड जिसका एहसास माँ के अनुसार वो कब की भूल चुकी थी.

माँ और चूत यह दो ऐसे लफ़्ज थे जो मेरे लिए एक लाइन में नही हो सकते थे. मेरी माँ तो बस माँ थी, पूरी शुद्ध और पवित्र. जब उसकी बातचीत ने इस ओर इशारा किया कि उसके पास भी एक चूत है जो लंड के लिए तड़प रही है. बस, मैं और कुछ नही सुनना चाहता था. मैं यह भी भूल गया कि मैं वहाँ क्या कर रहा था जा क्या करने गया था. मैं वहाँ से दूर हट जाना चाहता था इतना दूर के माँ की आवाज़ ना सुन सकूँ

उस दिन के बाद में जब मैने उसे रसोई में देखा तो मुझे उसकी उपस्थिती में बेचैनी सी महसूस होने लगी. मुझे थोड़ा अपराध बोध भी महसूस हो रहा था के मैं उसकी अंतरंग दूबिधा को जान गया था और उसे इस बात की कोई जानकारी नही थी. उस अपराधबोध ने माँ के लिए मेरी सोच को थोड़ा बदल दिया था. उसकी समस्या की जानकारी ने उसके प्रति मेरे नज़रिए में भी तब्दीली ला दी थी. मैं शायद इसे सही ढंग से बता तो नही सकता मगर मेरे अंदर कुछ अहसास जनम लेने लग थे.

उस दिन जब वो ड्रॉयिंग रूम में आई तो बरबस मेरा ध्यान उसकी टाँगो की ओर गया. मैं चाहता नही था मगर फिर भी खुद को रोक नही पाया. सिर्फ़ इतना ही नही, मेरी नज़र उसकी टाँगो से सीधे उस स्थान पर पहुँच गयी जहाँ उसकी टाँगे आपस में मिल रही थीं, उस स्थान पर जहाँ उसने ना जाने कितने समय से लंड महसूस नही किया था. उपर से वो टाइट जीन्स पहने हुए थी और उसने अपनी टीशर्ट जीन्स के अंदर दबा रखी थी जिस से उसकी टाँगो का वो मध्य भाग मुझे बहुत अच्छे से दिखाई दे रहा था बल्कि थोड़ा उभरा हुआ नज़र आ रहा था. उसके वो लफाज़ मेरे कानो में गूँज रहे थे जब मैं उसकी जाँघो को घूर रहा था.

वो अपनी फॅवुरेट जीन्स पहने हुए थी और वो स्थान जहाँ उसकी जांघे आपस में मिल रही थी वहाँ थोड़ा गॅप था जो उसकी चूत को हाइलाइट कर रहा था........खूब उभर कर. मैने माँ को पहले भी उस जीन्स में देखा था मगर टाँगो के बीच का वो गॅप मुझे कभी नज़र नही आया था ना ही वो तिकोने आकर का भाग. असलियत में, शायद मैने वो उभरा हुआ हिस्सा देखा ही नही था, शायद वो मेरी कल्पना मात्र थी. उसकी जीन्स काफ़ी मोटे कपड़े की बनी हुई थी इसलिए उस हिस्से को देखना बहुत मुश्किल था मगर आज मैं उसे एक अलग ही रूप में देख रहा था..

उसकी चूत की ओर बार बार ध्यान जाने से मुझे कुछ बेचिनी महसूस होने लगी थी. उस रात मैं सो ना सका.

संदर्भ : ये कैसा संजोग माँ बेटे का (sexbaba.co), ये कैसा संजोग माँ बेटे का (rajsharmastories.com)

To be Continued

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वो अपनी फॅवुरेट जीन्स पहने हुए थी और वो स्थान जहाँ उसकी जांघे आपस में मिल रही थी वहाँ थोड़ा गॅप था जो उसकी चूत को हाइलाइट कर रहा था........खूब उभर कर. मैने माँ को पहले भी उस जीन्स में देखा था मगर टाँगो के बीच का वो गॅप मुझे कभी नज़र नही आया था ना ही वो तिकोने आकर का भाग. असलियत में, शायद मैने वो उभरा हुआ हिस्सा देखा ही नही था, शायद वो मेरी कल्पना मात्र थी. उसकी जीन्स काफ़ी मोटे कपड़े की बनी हुई थी इसलिए उस हिस्से को देखना बहुत मुश्किल था मगर आज मैं उसे एक अलग ही रूप में देख रहा था..

उसकी चूत की ओर बार बार ध्यान जाने से मुझे कुछ बेचिनी महसूस होने लगी थी. उस रात मैं सो ना सका.

अद्भुत संजोग प्यार का | Adbhut Sanjog Pyaar Ka | Update 2

उस रात जब मेरे माता पिता अपने कमरे में सोने के लिए चले गये तो मैं कल्पना करने लगा कैसे मेरी माँ मेरे पिताजी के नीचे होगी और उस लंड को अपनी चूत में ले रही होगी जो उसने ना जाने कितने समय से महसूस भी नही किया था. मैने यह सब फितूर अपने दिमाग़ से निकालने की बहुत कोशिश की मगर घूम फिर कर वो बातें फिर से मेरे दिमाग़ में आ जाती. मेरा ध्यान उसकी पॅंट के उस गॅप वाले हिस्से की ओर चला जाता और मैं कल्पना में अपने पिताजी के लंड को उस गॅप को भरते देखता.

Hard Fuck From Behind

मेरे ख़याल मुझे बैचैन कर रहे थे और मैं ठीक से कह नही सकता कि मुझे किस बात से ज़यादा परेशानी हो रही थी, इस बात से कि माँ की चूत बार बार मेरी आँखो के सामने घूम रही थी या फिर इस ख़याल से कि मेरे पिताजी उसे चोद रहे होंगे.

अगले दिन मेरा मूड बहुत उखड़ा हुया था. मेरे हाव भाव मेरी हालत बता रहे थे, खुद माँ ने भी पूछा कि मैं ठीक तो हूँ. वो उस दिन भी वोही जीन्स पहने हुए थी मगर उसके साथ एक फॉर्म फिटिंग टी-शर्ट डाली हुई थी. उस दिन जिंदगी में पहली बार मेरा ध्यान माँ के मम्मों की ओर गया. एक बारगी तो मुझे यकीन ही नही हुआ कि उसके मम्मे इतने बड़े और इतने सुंदर थे. उसके भारी मम्मो के एहसास ने मेरी हालत और भी पतली कर दी थी.

बाकी का पूरा दिन मेरा मन उसकी टाँगो के जोड़ से उसके मम्मो, उसके उन गोल-मटोल भारी मम्मों के बीच उछलता रहा. मेरे कानो में बार बार उसकी वो बात गूँज उठती कि उसे अब लंड का एहसास भी भूल गया था कि कभी कभी उसको चुदवाने का कितना मन होता था.

मैं मानता हू उसे मात्र एक माँ की तरह देखने की वजाय एक सुंदर, कामनीय नारी के रूप में देखने का बदलाव मेरे लिए अप्रत्याशित था . ऐसा लगता था जैसे एक परदा उठ गया था और जहाँ पहले एक धुन्धलका था वहाँ अब मैं एक औरत की तस्वीर सॉफ सॉफ देख सकता था. लगता था जैसे मेरी कुछ इच्छाएँ मन की गहराइयों में कहीं दबी हुई थीं जो यह सुनने के बाद उभर कर सामने आ गयी थी कि उसको कभी कभी चुदवाने का कितना मन होता था. वो जैसे बदल कर कोई और हो गयी थी और मेरे लिए सर्वथा नयी थी. जहाँ पहले मुझे उसके मम्मो और उसकी जाँघो के जोड़ पर देखने से अपराधबोध, झिजक महसूस होती थी, अब हर बितते दिन के साथ मैं उन्हे आसानी से बिना किसी झिजक के देखने लगा था बल्कि जो भी मैं देखता उसकी अपने मन में खूब जम कर उसकी तारीफ भी करता. मुझे नही मालूम उसने इस बदलाव पर कोई ध्यान दिया था या नही मगर कयि मौकों पर मैं बड़ी आसानी से पकड़ा जा सकता था.

एक दिन आधी रात को मैं टीवी देख रहा था, मुझे किचन में माँ के कदमो की आहट सुनाई दी. उस समय उसे सोते होना चाहिए था मगर वो जाग रही थी. वो ड्रॉयिंग रूम में मेरे पास आई. उसके हाथ में जूस का ग्लास था.

"मैं भी तुम्हारे साथ टीवी देखूँगी?" वो छोटे सोफे पर बैठ गयी जो बड़े सोफे से नब्बे डिग्री के कोने पर था जिस पे मैं बैठा हुआ था. उसने नाइटी पहनी हुई थी जिसका मतलब था वो सोई थी मगर फिर उठ गई थी.

"नींद नही आ रही" मैने पूछा. मेरे दिमाग़ में उसकी टेलिफोन वाली बातचीत गूँज उठी जिसमे उसने कहा था कि कभी कभी उसे चुदवाने की इतनी जबरदस्त इच्छा होती थी कि उसे नींद नही आती. मैं सोचने लगा क्या उस समय भी उसकी वोही हालत है, कि शायद वो काम की आग यानी कामाग्नी में जल रही है और उसे नींद नही आ रही है, इसीलिए वो टीवी देखने आई है. इस बात का एहसास होने पर कि मैं अती कामोत्तेजित नारी के साथ हूँ मेरा बदन सिहर उठा.

वो वहाँ बैठकर आराम से जूस पीने लगी , उसे देखकर लगता था जैसे उसे कोई जल्दबाज़ी नही थी, जूस ख़तम करके वापस अपने बेडरूम में जाने की. जब उसका ध्यान टीवी की ओर था तो मेरी नज़रें चोरी चोरी उसके बदन का मुआइना कर रही थी. उसके मोटे और ठोस मम्मों की ओर मेरा ध्यान पहले ही जा चुका था मगर इस बार मैने गौर किया उसकी टाँगे भी बेहद खूबसूरत थी. सोफे पे बैठने से उसकी नाइटी थोड़ी उपर उठ गयी थी और उसके घुटनो से थोड़ा उपर तक उसकी जाँघो को ढांप रही थी.

शायद रात बहुत गुज़र चुकी थी, या टीवी पर आधी रात को परवीन बाबी के दिलकश जलवे देखने का असर था, मगर मुझे माँ की जांघे बहुत प्यारी लग रहीं थी. बल्कि सही लफ़्ज़ों में बहुत सेक्सी लग रही थी. सेक्सी, यही वो लफ़्ज था जो मेरे दिमाग़ में गूंजा था जब हम दोनो टीवी देख रहे थे या मेरे केस में मैं, टीवी देखने का नाटक कर रहा था. असलियत में अगर मुझे कुछ दिखाई दे रहा था तो वो उसकी सेक्सी जांघे थी और यह ख़याल मेरे दिमाग़ में घूम रहा था कि वो इस समय शायद वो बहुत कामोत्तेजित है.

वो काफ़ी समय वहाँ बैठी रही, अंत में बोलते हुए उठ खड़ी हुई "ओफफ्फ़! रात बहुत गुज़र गयी है. मैं अब सोने जा रही हूँ"

मैं कुछ नही बोला. वो उठ कर मेरे पास गुडनाइट बोलने को आई. नॉर्मली रात को माँ विदा लेते हुए मेरे होंठो पर एक हल्का सा चुंबन लेती थी जैसा मेरे बचपन से चला आ रहा था. वो सिर्फ़ सूखे होंठो से सूखे होंठो का क्षणिक स्पर्श मात्र होता था और उस रात भी कुछ ऐसा ही था, एक सूखा, हल्का सा लगभग ना मालूम होने वाला चुंबन. मगर उस रात उस चुंबन के अर्थ बदल गये थे, क्योंकि मेरे दिमाग़ में उसके कामुक अंगो की धुंधली सी तस्वीरें उभर रही थीं. वो एक हल्का सा अच्छी महक वाला पर्फ्यूम डाले हुए थी जिसने मेरी दशा और भी खराब कर दी. मैं उत्तेजित होने लगा था.

मैं उसे मूड कर रूम की ओर जाते देखता रहा. उसका सिल्की, सॉफ्ट नाइट्गाउन उसके बदन के हर कटाव हर मोड़ हर गोलाई का अनुसरण कर रहा था. वो उसकी गान्ड के उभार और ढलान से चिपका हुआ उसके चुतड़ों के बीच की खाई में हल्का सा धंसा हुआ था. उस दृश्य से माँ को एक सुंदर, कामनीय नारी के रूप में देखने के मेरे बदलाव को पूर्ण कर दिया था.

"माँ कितनी सुंदर है, कितनी सेक्सी है" मैं खुद से दोहराता जा रहा था. मगर उसकी सुंदरता किस काम की! वो आकर्षक और कामनीय नारी हर रात मेरे पिताजी के पास उनके बेड पर होती थी मगर फिर भी उनके अंदर वो इच्छा नही होती थी कि उस कामोत्तेजित नारी से कुछ करें. मुझे पिताजी के इस रवैये पर वाकाई में बहुत हैरत हो रही थी.

मुझे इस बात पर भी ताज्जुब हो रहा था कि मेरी माँ अचानक से मुझे इतनी सुंदर और आकर्षक क्यों लगने लगी थी. वैसे ये इतना भी अचानक से नही था मगर यकायक माँ मेरे लिए इतनी खूबसूरत, इतनी कामनीय हो गयी थी इस बात का कुछ मतलब तो निकलता था. क्यों मुझे वो इतनी आकर्षक और सेक्सी लगने लगी थी? मुझे एहसास था कि इस सबकी शुरुआत मुझे माँ की अपूर्ण जिस्मानी ख्वाहिशों की जानकारी होने के बाद हुई थी, लेकिन फिर भी वो मेरी माँ थी और मैं उसका बेटा और एक बेटा होने के नाते मेरे लिए उन बातों का ज़्यादा मतलब नही होना चाहिए था. उसकी हसरतें किसी और के लिए थीं, मेरे लिए नही, मेरे लिए बिल्कुल भी नही.

अगर उस समय मैं कुछ सोच सकता था तो सिर्फ़ अपनी हसरतों के बारे में, और माँ के लिए मेरे दिल में पैदा हो रही हसरतें. मगर फिर मैं उसकी ख्वाहिश क्यों कर रहा था? क्या वाकाई वो मेरी खावहिश बन गयी थी? मेरे पास किसी सवाल का जवाब नही था. यह बात कि वो कभी कभी बहुत उत्तेजित हो जाती थी और यह बात कि उसकी जिस्मानी हसरतें पूरी नही होती थीं,

इसी बात ना माँ के प्रति मेरे अंदर कुछ एहसास जगा दिए थे. यह बात कि वो चुदवाने के लिए तरसती है, मगर मेरा पिता उसे चोदता नही है, इस बात से मेरे दिमाग़ में यह विचार आने लगा कि शायद इसमे मैं उसकी कुछ मदद कर सकता था. मगर हमारा रिश्ता रास्ते में एक बहुत बड़ी बढ़ा थी, इसलिए वास्तव में उसके साथ कुछ कर पाने की संभावना मेरे लिए नाबराबार ही थी. मगर मेरे दिमाग़ के किसी कोने में यह विचार ज़रूर जनम ले चुका था कि कोशिस करने में कोई हर्ज नही है. उस संभावना ने एक मर्द होने के नाते माँ के लिए मेरे जज़्बातों को और भी मज़बूत कर दिया था चाहे वो संभावना ना के बराबर थी.

ज़्यादातर मैं रात को काफ़ी लेट सोता था, यह आदत मेरी स्कूल दिनो से बन गयी थी जब मैं आधी रात तक पढ़ाई करता था, कॉलेज जाय्न करने के बाद से यह आदत और भी पक्की हो गयी थी. मेरा ज़्यादातर वक़्त कंप्यूटर पर काम करते गुज़रता था मगर माँ के बारे में वो जानकारी हासिल होने के बाद, और जब से मुझे इस बात का एहसास हुया था कि माँ का बदन कितना कामुक है वो कितनी सेक्सी है, और उसकी उपस्थिति में जो कामनीय आनंद मुझे प्राप्त होने लगा था उससे मैं अब टीवी देखने को महत्व देने लगा था. मैं अक्सर ड्रॉयिंग रूम में बैठ कर टीवी देखता और आशा करता कि वो आएगी और मुझे फिर से वोही आनंद प्राप्त होगा.

माँ का ध्यान मेरी नयी दिनचर्या की ओर जाने में थोड़ा वक़्त लगा. शुरू शुरू में वो कभी कभी संयोग से वहाँ आ जाती और थोड़ा वेकार बैठती, और टीवी पर मेर साथ कुछ देखती. मगर जल्द ही वो नियमित तौर पर मेरे साथ बैठने लगी. मगर वो कभी भी लंबे समय तक नही बैठती थी मगर इतना समय काफ़ी होता था एक सुखद एहसास के लिए. मुझे लगा वो घर में अपनी मोजूदगी का किसी को एहसास करवाना चाहती थी

रात को जाने के टाइम उसकी विशेज़ कयि बार ज़ुबानी होती थी, वो हल्के से गुडनाइट बोल देती थी और कयि बार वो हल्का सा होंठो से होंठो का स्पर्श, वो एक सूखा सा स्पर्श मात्र होता था और मेरे ख्याल से वो किसी भी प्रकार चुंबन कह कर नही पुकारा जा सकता था. जो गर्माहट मुझे पहले पहले माँ के चुंबन से होती थी वो समय के साथ उनकी आदत होने से जाती रही. उन चुंबनो में ना कोई असर होता था और ना ही उनका कोई खास मतलब होता था. वो तो सिर्फ़ हमारे विदा लेने की औपचारिकता मात्र थी, एक ऐसी औपचारिकता जिसकी मुझे कोई खास परवाह नही थी.

To be Continued

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रात को जाने के टाइम उसकी विशेज़ कयि बार ज़ुबानी होती थी, वो हल्के से गुडनाइट बोल देती थी और कयि बार वो हल्का सा होंठो से होंठो का स्पर्श, वो एक सूखा सा स्पर्श मात्र होता था और मेरे ख्याल से वो किसी भी प्रकार चुंबन कह कर नही पुकारा जा सकता था. जो गर्माहट मुझे पहले पहले माँ के चुंबन से होती थी वो समय के साथ उनकी आदत होने से जाती रही. उन चुंबनो में ना कोई असर होता था और ना ही उनका कोई खास मतलब होता था. वो तो सिर्फ़ हमारे विदा लेने की औपचारिकता मात्र थी, एक ऐसी औपचारिकता जिसकी मुझे कोई खास परवाह नही थी.

अद्भुत संजोग प्यार का | Adbhut Sanjog Pyaar Ka | Update 3

 संजोग प्यार का Adbhut Sanjog Pyaar Ka Update 3

अद्भुत संजोग प्यार का | Adbhut Sanjog Pyaar Ka | Update 3: मैं अपनी पुरानी दिनचर्या की ओर लौट गया और अपना सारा समय फिर से अपने कंप्यूटर पे बिताने लगा. अब आधी रात तक टीवी देखने में वो मज़ा ही नही था जैसा पहले आया करता था. माँ को मेरे फ़ैसले की मालूमात नही थी. पहले ही दिन जब उसने मुझे ड्रॉयिंग रूम से नदारद पाया तो वो मेरे रूम में मुझे देखने को आई.

"आज टीवी नही देखोगे क्या"

"नही, मुझे अपना प्रॉजेक्ट पूरा करना है" मैने बहाना बनाया.

"ओह!" वो थोड़ी निराश लगी, कम से कम मुझे तो ऐसा ही जान पड़ा.

कहने के लिए और कुछ नही था, मगर वो अभी जाना नही चाहती थी. वो बेड के किनारे पर बैठ गयी और टेबल पर से एक मॅगज़ीन उठाकर उसके पन्ने पलटने लगी. मैं बिज़ी होने का नाटक करता रहा, और वो चुपचाप मॅगज़ीन में खोई रही. कुछ देर बाद मैने उसे मॅगज़ीन वापस रखते सुना. "ठीक है, मैं चलती हूँ" वो खड़ी होकर बोली.

मैने अपनी कुर्सी उसकी ओर घुमा ली और कहा, "मेरा काम लगभग ख़तम हो चुका है माँ, अगर तुम चाहो तो थोड़ी देर में हम टीवी देखने चलते हैं"

"नही, नही. तुम पढ़ाई करो" उसने जबाब दिया और मेरी तरफ आई. अब यह हिस्सा कुछ अर्थ लिए हुए था.

शायद मेरा ये अंदाज़ा ग़लत हो के मुझे ड्रॉयिंग रूम में टीवी देखते ना पाकर वो थोड़ा निराश हो गयी थी, मगर जब वो मुझसे विदा लेने के समय चुंबन लेने आई तो मैने उसके हाव भाव में एक निस्चय देखा और इस बार मेरे मान में कोई संदेह नही था जैसे ज़ुबानी विदा की जेगह वो चुंबन लेकर कोई बात जताना चाहती थी.

मैं थोड़ा आगे को झुक गया और उसके गुडनाइट चुंबन का इंतेज़ार करने लगा. आम तौर पर वो थोड़ा सा झुक कर अपने होंठ मेरे होंठो से छुया देती थी. उसके हाथ उसकी कमर पर होते थे. मगर उस रात उसने अपना दायां हाथ मेरे बाएँ कंधे पर रखा और फिर मुझे वो चुंबन दिया या मेरा चुंबन लिया. मैने इसे महज इतेफ़ाक़ माना और इसे कोई गुप्त इशारा समझ कर इसका कोई दूसरा अर्थ नही निकाला. कारण यह था कि मैं कुर्सी पर बैठा हुआ था ना के सोफे पर, इसीलिए उसे बॅलेन्स के लिए मेरे कंधे पर हाथ रखना पड़ा था. मगर वो चुंबन आज कुछ अलग तरह का था, इसमे कोई शक नही था.

यह कोई बहहुत बड़ी बात नही थी, मगर मुझे लगा कि वो हमारे इकट्ठे बैठने, साथ साथ टीवी देखने की आस लगाए बैठे थी, उसे किसी के साथ की ज़रूरत थी. शायद वो हमारे आधी रात तक ड्रॉयिंग रूम के साथ की आदि हो गयी थी और मेरे वहाँ ना होने पर उससे रहा नही गया था. मुझे उसके चुंबन से उसकी निराशा झलकती दिखाई दी.

तभी वो ख़याल मेरे मन मे आया था.

अगर उसके लिए चुंबन का एहसास बदलना संभव था तो मेरे लिए भी संभव था चाहे किसी और तरीके से ही सही.

जितना ज़्यादा मैं इस बारे में सोचता उतना ही ज़्यादा इसके नतीजे को लेकर उत्तेजित होता गया. जब से मैने उसे कहते सुना था कि वो चुदवाने के लिए तड़प रही है तबसे मेरे अंदर एक ज्वाला सी धधक रही थी. उस ज्वाला की लपटें और भी तेज़ हो जाती जब वो मेरे साथ अकेली आधी रात तक टीवी देखती थी. उसकी फोन वाली बातचीत से मैं जानता था के वो कभी कभी इतनी उत्तेजित होती थी कि उसे रात को नींद नही आती थी. मुझे लगता था कि जब जब वो आधी रात को टीवी देखने आती थी उसकी वोही हालत होती होगी, चाहे मेरे कारण नही मगर अती कामोत्तेजना की हालत में तो वो होती ही थी.

अगर उस दिन भी उसकी वोही हालत थी जब वो मेरे साथ थी तो क्या वो मेरी ओर हसरत से देखेगी? जैसे मैं उसकी ओर देखता था? क्या उसके हृदय मैं भी वोही आग जल रही थी जो मेरे दिल में जल रही थी? क्या यह संभव था कि उसके अंदर की आग को प्रोक्ष रूप से और भड़का दिया जाए ताकि कम से कम वो मेरी ओर किसी दूसरी भावना से देख सके जैसे मैं उसकी ओर देखता था? क्या मैं उसके दिमाग़ में वो विचार डाल सकता था कि मैं उसकी समस्याओ के समाधान की एक संभावना हो सकता हूँ, चाहे वो सिरफ़ एक विचार होता इससे ज़्यादा कुछ नही.

मेरे लिए इन सवालों के जबाब जानने का कोई साधन नही था, मेरा मतलब कि अगर मैं शुरुआत भी करता तो कहाँ से. केयी बार मुझे लगता जैसे मैं उसकी बैचैनि को उसकी अकुलाहट को महसूस कर सकता हूँ मगर वो सिर्फ़ एक अंदाज़ा होता. मैं यकीन से कुछ नही कह सकता था. कोई ऐसा रास्ता नही था जिससे एक इशारा भर ही मिल जाता कि वो कैसे महसूस करती है.

उसके चुंबन ने उसकी कुछ भावनाओ से बग़ावत ज़रूर की थी मगर उनका उस सब से कोई वास्ता नही था जो मैं जानना चाहता था. ज़रूर उसे निराशा हुई थी जब मैं उसका साथ देने के लिए वहाँ नही था मगर वो प्रभाव एक मनोवैग्यानिक था. उसे मेरा साथ अच्छा लगता था इसलिए उसका निराश होना संभव था जब उसका बेटा उसे कंपनी देने के लिए वहाँ मोजूद नही था. मैं उसे किसी और वेजह से निराश देखना चाहता था. चाहे एक अलग तरीके से ही सही मगर मैं एक ज़रूरत पूरी कर रहा था, एक बेटे की तेरह नही बल्कि एक मर्द की तरह. मैं वो जानना चाहता था. मैं महसूस करना चाहता था कि जिस्मानी ज़रूरत पूरी करने की संभावना हमारे बीच मोजूद थी, चाहे वो सिर्फ़ एक संभावना होती और हम उस पर कभी अमल ना करते.

अब अचानक से मैने महसूस किया कि मेरे पास एक मौका है कम से कम ये पता करने का मैं कितने पानी में हूँ. अगर मैं चुंबन को अपनी तरफ से किसी तरह कोई अलग रूप दे सकूँ, उसे एक इशारा भर कर सकूँ, उसे एक अलग एहसास करा सकूँ, उस चिंगारी को जो उसके अंदर दहक रही थी हवा देकर एक मर्द की तरह भड़का सकूँ ना कि एक बेटे की तरह तब शायद मैं किसी संभावना का पता लगा सकूँगा.

उस रात मैं बहुत बहुत देर तक सोचता रहा, और एक योजना बनाने लगा कि किस तरह मैं हमारी रात्रि के चुंबनो में कुछ बदलाव कर उनमे कुछ एहसास डाल सकूँ.

जब मैं नतीजे के बारे में अलग अलग दिशाओं से सोचा तो उत्तेजना से मेरा बदन काँपने लगा. एक तरफ यहाँ मैं यह सोच कर बहुत उत्तेजित हो रहा था कि अगर मैने अपनी योजना अनुसार काम किया तो उसका नतीजा क्या होगा. वहीं दूसरी ओर मुझे अपनी योजना के विपरीत नतीजे से भय भी महसूस हो रहा था. उसकी प्रतिक्रिया या तो सकारात्मक हो सकती थी, जिसमे वो कुछ एसी प्रतिक्रिया देती जो इस आग को और भड़का देती, या फिर उसकी प्रतिक्रिया नकारात्मक होती जिससे उस संभावना के सभी द्वार हमेशा हमेशा के लिए बंद हो जाते जो संभावना असलियत में कभी मोजूद ही नही थी.

अब योजना बहुत ही साधारण सी थी. मैं उसकी सूक्ष्म प्रतिक्रिया को एक इशारा मान कर चल रहा था और इसके साथ अपने तरीके से एक प्रयोग करके देखना चाहता था. चाहे यह कुछ बेवकूफ़काना ज़रूर लग सकता था मगर मेरी योजना से मुझे वो सुई मिल सकती थी जो मैं उस घास फूस के भारी ढेर से ढूँढ रहा था

जैसा कि मैं पहले ही कह चुका हूँ हमारे रात्रि विदा के चुंबन हमेशा सूखे, हल्के से और नमालूम होने वाले होंठो का होंठो से स्पर्श मात्र होते थे. अगर--मैं खुद से दोहराता जा रहा था----अगर वो इतने सूखे ना रहें तो? मैं अपने होंठ उसके होंठो पर दबा तो नही सकता था क्योंकि वो मर्यादा के खिलाफ होता लेकिन अगर मेरे होंठ सूखे ना रहें तो? अगर उसको होंठो पर मुखरस का एहसास होगा तो? तब उसकी प्रतिकिरया क्या होगी? क्या वो इसका ज्वाब देगी?!

जितना ज़्यादा मैं अपनी योजना को व्यावहारिक रूप देने के बारे में सोचता रहा उतना ही ज़्यादा मैं आंदोलित होता गया. मेरी हालत एसी थी कि उस रात मैं सो भी ना सका, बस उससे पॉज़िटिव रियेक्शन मिलने के बारे में सोचता रहा.

अगली रात मैं प्लान के मुताबिक टीवी के आगे था. वो आई, जैसी मैं उम्मीद लगाए बैठा था कि वो आएगी और मुझे वहाँ मोजूद देखकर शायद थोड़ी एग्ज़ाइटेड होगी. मगर वो चेहरे से कुछ भी एग्ज़ाइट्मेंट या खुशी दिखा नही रही थी, इससे मुझे निराशा हुई और अपनी योजना को लेकर मैं फिर से सोचने लगा कि मुझे वो करना चाहिए या नही मगर निराश होने के बावजूद मैने प्लान को अमल में लाने का फ़ैसला किया. हमेशा की तरह हम कुछ समय तक टीवी देखते रहे, अंत मैं वो बोली, "मुझे सोना चाहिए बेटा! रात बहुत हो गयी है"

" ओके" मैने जबाब दिया और अपने सूखे होंठो पर जल्दी से जीभ फेरी.

वो मेरी ओर नही देख रही थी जब मैने अपने होंठो पर जीभ फेरी. मैने फिर से चार पाँच वार ऐसे ही किया ताकि होंठ अच्छे से गीले हो जाएँ. मैं होंठो से लार नही टपकाना चाहता था मगर उन्हे इतना गीला कर लेना चाहता था कि वो उस गीलेपन को, मेरे रस को महसूस कर सके. उसके बाद मैने खुद को उसकी प्रतिक्रिया के लिए तैयार कर लिया.

मेरा दिल बड़े ज़ोरों से धड़कने लगा जब वो मेरे सोफे की ओर आई. मैं थोड़ा सा आगे जो झुक गया ताकि उसको मेरे होंठों तक पहुँचने में आसानी हो सके. मैं खुद को संयत करने के लिए मुख से साँस लेने लगा जिसके फलसरूप मेरे होंठ कुछ सूख गये. मैने जल्दी जल्दी जीभ निकाल होंठो पर फेरी ताक़ि उन्हे फिर से गीला कर सकूँ बिल्कुल उसके चुंबन से पहले, मुझे नही मालूम उसने मुझे ऐसा करते देख लिया था या नही.

जब माँ के होंठ मेरे होंठो से छुए तो मेरी आँख बंद हो गयी. मेरा चेहरा आवेश में जलते हुए लाल हो गया था. मुझे अपनी साँस रोकनी पड़ी, क्योंकि मैं नही चाहता था कि मेरी भारी हो चुकी साँस उसके चेहरे पर इतने ज़ोर से टकराए.

होंठो के गीले होने से चुंबन की सनसनाहट बढ़ गयी थी. यह वो पहले वाला आम सा, लगभग ना मालूम चलने वाला होंठो का स्पर्श नही था. आज मैं हमारे होंठो के स्पर्श को भली भाँति महसूस कर सकता था, और मुझे यकीन था उसने भी इसे महसूस किया था.

वो धीरे से 'गुडनाइट' फुसफुसाई और अपने रूम में जाने के लिए मूड गयी. उसकी ओर से कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया नज़र नही आई थी हालाँकि मुझे यकीन था वो अपने होंठो पर मेरा मुखरस लेकर गयी थी. कुछ भी ऐसा असाधारण नही था जिस पर मैं उंगली रख सकता. ऐसा लगता था जैसे हमारा वो चुंबन उसके लिए बाकी दिनो जैसा ही आम चुंबन था. कुछ भी फरक नही था. मैं उसे अलग बनाना चाहता था, और उम्मीद लगाए बैठा था कि उसका ध्यान उस अंतर की ओर जाएगा मगर नही ऐसा कुछ भी नही हुआ. अब निराश होने की बारी मेरी थी. जितना मैं पहले आवेशित था अब उतना ही हताश हो गया था.

मैने किसी सकरात्मक या नकारात्मक प्रतिक्रिया की आशा की थी. अपने बेड पे लेटा हुआ मैं उस रात बहुत थका हुआ, जज़्बाती तौर पर निराश और हताश था. मैं किसी नकारात्मक प्रतिक्रिया को आसानी से स्वीकार कर लेता मगर कोई भी प्रतिक्रिया ना मिलने की स्थिति के लिए मैं बिल्कुल भी तैयार नही था. उस रात जब मैं नींद के लिए बेड पर करवटें बदल रहा था, तो मेरा ध्यान अपने लंड पर गया जो मेरे जोश से थोड़ा आकड़ा हुया था इसके बावजूद कि बाद में मुझे निराशा हाथ लगी थी.

To be Continued

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Raj Sharma
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वो धीरे से 'गुडनाइट' फुसफुसाई और अपने रूम में जाने के लिए मूड गयी. उसकी ओर से कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया नज़र नही आई थी हालाँकि मुझे यकीन था वो अपने होंठो पर मेरा मुखरस लेकर गयी थी. कुछ भी ऐसा असाधारण नही था जिस पर मैं उंगली रख सकता. ऐसा लगता था जैसे हमारा वो चुंबन उसके लिए बाकी दिनो जैसा ही आम चुंबन था. कुछ भी फरक नही था. मैं उसे अलग बनाना चाहता था, और उम्मीद लगाए बैठा था कि उसका ध्यान उस अंतर की ओर जाएगा मगर नही ऐसा कुछ भी नही हुआ. अब निराश होने की बारी मेरी थी. जितना मैं पहले आवेशित था अब उतना ही हताश हो गया था.

मैने किसी सकरात्मक या नकारात्मक प्रतिक्रिया की आशा की थी. अपने बेड पे लेटा हुआ मैं उस रात बहुत थका हुआ, जज़्बाती तौर पर निराश और हताश था. मैं किसी नकारात्मक प्रतिक्रिया को आसानी से स्वीकार कर लेता मगर कोई भी प्रतिक्रिया ना मिलने की स्थिति के लिए मैं बिल्कुल भी तैयार नही था. उस रात जब मैं नींद के लिए बेड पर करवटें बदल रहा था, तो मेरा ध्यान अपने लंड पर गया जो मेरे जोश से थोड़ा आकड़ा हुया था इसके बावजूद कि बाद में मुझे निराशा हाथ लगी थी.

अद्भुत संजोग प्यार का | Adbhut Sanjog Pyaar Ka | Update 4

Lover Kiss

अद्भुत संजोग प्यार का | Adbhut Sanjog Pyaar Ka | Update 4: मेरी निराशा अगले दिन भी मेरे साथ रही. निराशा के साथ साथ आत्मग्लानी और शरम का एहसास हो रहा था. जो मैने किया था वो समाज, कुदरत, मान मरियादा के खिलाफ था इसलिए मेरे मन में ऐसा करने के लिए पछतावे का एहसास भी हो रहा था. अगली रात जब हमारे ड्रॉयिंग रूम में टीवी देखने का टाइम हो गया तो मैं लगभग नही जाने वाला था. मैं शायद अपने कमरे मे ही रुकता मगर ये बात कि मेरे नजानें से वो मेरे रूम में आ सकती है मैने टीवी रूम जाने मे ही भलाई समझी. अब मैने जो धुन बनाई थी, उसका सामना करने का वक़्त था.

उसके व्यवहार में कोई भी बदलाव दिखाई नही दे रहा था जो शायद एक अच्छी बात थी. उसकी कोई भी प्रतिक्रिया ना देख मुझे बड़ी राहत हुई थी नाकी पिछली रात की तरह जब उसकी कोई भी प्रतिक्रिया ना देख मैं निराश हो गया था. मुझे एहसास हुआ कि हमारी दिनचर्या मे किसी तब्दीली के लिए मैं अभी तैयार नही था. मैने अचानक महसूस किया कि रात को माँ के साथ इकट्ठे समय बिताने से मुझे भी खुशी मिलती है. इस साथ से माँ के द्वारा मेरी भी एक ज़रूरत पूरी होती थी चाहे मनोवैग्यानिक तौर पर ही सही.

मैने हमारे चुंबन मे थोड़ा सा बदलाव कर उनको थोड़ा ठोस बनाने की कोशिश की थी और मैं ऐसा बिना कोई संकेत दिए या बिना कुछ जताए करने में सफल रहा था. मेरी शरम और आत्मग्लानि धीरे धीरे इस राहत से गायब होने लगी कि मैं बिना कोई कीमत चुकाए या बिना कोई सज़ा पाए सॉफ बच निकला था.

हालाँकि मेरे वार्ताव में तब्दीली आ गयी थी. मेरा उसको देखने का नज़रिया बदल गया था. उसे देखते हुए मुझे अब उतनी बैचैनि महसूस नही हो रही थी. मैने एक कदम और आगे बढ़ा दिया था और उसने मुझे ना कोसा था था ना ही कोई आपत्ति जताई थी. उस रात माँ को निहारने में मुझे एक अलग ही आनंद प्राप्त हो रहा था. यह बात जुदा थी कि मैं यकीन से नही कह सकता था कि जो कुछ हुआ था उसे उसकी कोई भनक भी लगी थी.

फिर से वही सब कुछ, हम बैठे टीवी देख रहे थे , उसने कहा "बेटा! मैं चलती हूँ, रात बहुत हो गयी है". इस वार मैने अपने होंठ गीले नही किए. चाहे मुझे कोई नकारात्मक प्रतिक्रिया नही मिली थी फिर भी मैने रात का तजुर्बा दोहराने की हिम्मत नही की. मैं आगे को होकर थोड़ा सा झुक गया और उसके चूमने का इंतजार करने लगा ताकि मैं भी अपने रूम मे जा सकूँ और उस सुखद मीठे एहसास में खुद को डुबो सकूँ जिसकी लहरें मेरे जिस्म में घूम रही थी.

उसके होंठ रोजाना की तरह मेरे होंठो से छुए जिसमे मेरे महसूस करने के लिए कुछ भी ख़ास नही था.

मगर मैने कुछ महसूस किया, कुछ हल्का सा, अलग सा.

यह बिल्कुल हल्का सा था, लगभग ना महसूस होने वाला. मेरे दिलो दिमाग़ में कोई संदेह नही था कि मैने उसके होंठो को हल्के से, बिल्कुल हल्के से सिकुड़ते महसूस किया था. जैसे हमारे होंठ किसी के गाल पर चुंबन लेते हुए सिकुड़ते हैं ठीक वैसे ही लेकिन बहुत महीन से. ये मेरी माँ का होंठो से होंठो का स्पर्श नही था बल्कि एक चुंबन था. यह पहली बार था जब माँ के होंठो ने मेरे होंठो पर कोई हलचल की थी.. आम हालातों में, मैं इसे उसके होंठो का असमय सिकुड़ना मान कर रद्द कर देता मगर ये कुदरती तौर पर होने की वजाय स्वैच्छिक ज़्यादा लग रहा था. एक हल्का चुंबन होने के अलावा एक हल्का सा, महीन सा दबाब भी था जो उसके होंठो ने मेरे होंठो पर लगाया था.

अगले दिन भर मैं बहुत परेशान रहा. मैं बस यही सोचे जा रहा था कि यह वास्तव में हुआ था या यह सब मेरी कल्पना की उपज थी क्योंकि मैं पहले से कुछ अच्छा होने की उम्मीद लगाए बैठा था. क्या वो भी मेरी तरह हमारे चुंबन को और ज़्यादा गहरा बनाना चाहती थी या फिर इसके उलट वो चुंबन को और गहरा होने से रोकने की महज कोशिश कर रही थी जैसे मेरे होंठो के गीलेपान ने जो एहसास हमारे चुंबन में भरा था वो उसको रोकना चाहती होगी जिससे होंठो को सिकोड़ने से वो शायद पक्का कर रही थी कि उसके होंठो का कम से कम हिस्सा मेरे होंठो को छुए.

अपनी जिग्यासा शांत करने के लिए ज़रूरी था कि मैं इसे एक बार फिर से महसूस करता. मुझे उसके साथ कल रात जैसी स्थिति में होना था और इस बार मैं हमारे शुभ रात्रि चुंबन की हर तफ़सील पर पूरा ध्यान देने वाला था. मैं इस बात पर भी तर्क वितर्क कर रहा था कि मुझे अपने होंठ गीले करने चाहिए या नही मगर इससे हालातों में बदलाव हो जाता. मुझे कल ही की तरह आज भी अपने होंठ सूखे रखने थे और फिर देखना था कि उसके होंठ क्या कमाल दिखाते हैं!

वो शाम और रात शुरू होने का समय और भी बैचैनि भरा था, मगर उतना बैचैनि भरा नही था जितना जब हम टीवी देख रहे थे, तब था जब मैं अपने शुभरात्रि चुंबन का इंतजार कर रहा था और समय लग रह था जैसे थम गया हो. वो इंतजार बहुत कष्टदाई था.

मगर अंत मैं उसके जाने का समय हो गया और हमारे रात्रि विदा के उस चुंबन का भी.

मैं हमेशा की तरह आगे को झुक गया. मैने अपनी आँखे बंद कर लीं ताकि मैं अपना पूरा ध्यान उस चुंबन पर केंद्रित कर सकूँ.

मैने उसके होंठ अपने होंठो पर महसूस किए.

मगर मैने उसके होंठो का कोई भी दबाब अपने होंठो पर महसूस नही किया जैसा मैने पिछली रात महसूस किया था. उसने अपने होंठ भी नही सिकोडे जैसे उसने पिछली दफ़ा किया था.

मगर फिर भी कुछ अलग था, कुछ अंतर था. मेरा उपर का होंठ उसके बंद होंठो की गहराई में आसानी से फिसल गया.

जाहिर था इस बार उसने अपने होंठ गीले किए थे.

अब यह मात्र एक संजोग था या फिर उसने जानबूझकर उन्हे गीला किया था, मैं कुछ नही कह सकता था क्योंकि मैने उसे अपने होंठ गीले करते नही देखा था. मैने उनका गीलापन तभी महसूस किया था जब उसने मेरे होंठ छुए थे. मैं यह मान कर नही चल सकता था कि उसने ऐसा जानबूझकर किया था, चाहे उसने ऐसा जानबूझकर किया हो तो भी. मगर एक बात तय थी; अगर उसने उन्हे जानबूझकर गीला किया था तो इसका मतलब वो भी हमारे रात्रि चुंबन को और ठोस बनाना चाहती थी, उसमे और ज़यादा गहराई चाहती थी, ठीक वैसे ही जैसे मैने कोशिश की थी हमारे चुंबन को और गहरा बनाने की, उसमे और एहसास जगाने की.

मैं उसके होंठो की नमी अपने होंठो पर महसूस कर सकता था बल्कि जब बाद में मैने अपने होंठ चाटे तो उसका स्वाद भी ले सकता था. मैं सोच रहा था कि क्या उसने भी मेरे होंठो का गीलापन ऐसे ही महसूस किया था और क्या उसने भी उसका स्वाद चखा था जैसे मैने उसका चखा था. क्या उसको भी मेरा मुखरस मीठा लगा था जैसे उसका मुखरस मुझे मीठा लगा था. मैं उसके जाने के काफ़ी समय बाद तक अपने होंठो को चाटता रहा ताकि चुंबन का वो स्वाद और सनसनाहट बनी रहे.

मेरी माँ ने मुझे शुभरात्रि के लिए नही चूमा था. मेरी माँ ने मुझे असलियत में चूमा था चाहे बहुत हल्के से ही सही. चाहे वो जानबूझकर किया था चाहे वो सिरफ़ एक संजोग था, मेरी जाँघो के बीच पत्थर की तरह कठोर लंड को उस अंतर का पता नही था. उस रात मुझे नींद बहुत देर बाद आई क्योंकि मुझे बुरी तरह आकड़े लंड के साथ सोना पड़ा था.

To be Continued

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Satish Kumar
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