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भटकइया का फल | Bhatkaiya Ka Fal

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Jangali
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कुछ देर एक दूसरे की आंखों में देखने के बाद अल्का मुस्कुराकर बोली- अच्छा मेरे भैया जी अब छोड़ो भी बहना को, वो जरा खाना बना ले, नही तो कोई देख लेगा तो गज़ब हो जाएगा।

सत्तू ने अल्का को बाहों से आजाद कर दिया, पर जल्दी से गालों पे आज पहली बार एक चुम्बन लिया तो अलका सनसना गयी, उसे ये बिल्कुल अंदाजा नही था कि सत्तू ऐसा करेगा।

अल्का चौंकते हुए- ये क्या.....बहन को कोई ऐसे चूमता है।

सत्तू- ये चुम्बन बहन के लिए नही भौजी के लिए था, वही भौजी जो कुछ देर पहले मुझे आंखों से प्यार बरसा रही थी दीवार सजाते वक्त।

अल्का का चेहरा शर्म से लाल हो गया, धीरे से बोली- अच्छा जाओ अब.....भैया,..... मेरे देवर जी कोई देख लेगा।

सत्तू अल्का को देखता हुआ जाने लगता है अल्का शर्माते हुए उसे जाता हुआ देखती रह जाती है।

भटकइया का फल | Bhatkaiya Ka Fal | Update 9

अल्का सत्तू को जाता हुआ देखती रहती है पर जैसे ही सत्येंद्र द्वार के बाहर होने को होता है उसके मन में एक इच्छा होती है और वो तुरंत आवाज देकर सत्येंद्र को रोकती है- देवर जी सुनो।

सत्येंद्र- हां भौजी

अल्का- मेरा एक काम करोगे?

सत्येन्द्र- बोलो न भौजी आपके लिए तो जान भी हाज़िर है।

सत्येंद्र वहीं रुक जाता है और कहते हुए फिर अलका के नज़दीक आने लगता है।

दोनों एकदम करीब आ जाते है अल्का सत्येन्द्र की आंखों में देखते हुए बोलती है- देवर जी मुझे आज मेरे भैया मिल गए हैं, आज मैं बहुत खुश हूं.....बहुत

सत्येंद्र- अच्छा जी......मेरी भौजी को उनके भैया मिल गए.......ये तो बहुत खुशी की बात है........तब तो आपको इस खुशी में सबका मुँह मीठा कराना चाहिए, कम से कम अपने देवर का तो जरूर।

अल्का- हाँ तो कराऊँगी न, पर पहले एक काम करना होगा आपको अपनी इस भौजी के लिए।

सत्येंद्र- क्या भौजी......बोलो

अल्का- अपनी इस भौजी के लिए एक राखी बाजार से लानी होगी, मुझे अपने भैया को बांधनी है।

अल्का सत्येंद्र की आंखों में देखते हुए मुस्कुराकर कहने लगी, सत्येंद्र भी थोड़ा हैरान हो गया कि इतनी जल्दी राखी भी।

सत्येंद्र- भौजी मैं जानता हूँ कि आपके भैया भी आपसे राखी बंधवाने के लिए तरस रहे हैं।

अल्का- हां.... सच

सत्येंद्र- बिल्कुल.......पर

अल्का- अब पर क्या?

सत्येंद्र- पर इस समय राखी बाजार में कहां मिलेगी, वो तो त्योहार पर मिलती है न।

अल्का- मिठाई तो मिलेगी न देवर जी।

सत्येंद्र- हां भौजी वो तो मिलेगी ही।

अल्का- तो तुम जाके चुपके से मिठाई ला देना मुझे आज ही राखी का त्यौहार मनाना है अपने भैया के साथ, राखी का पवित्र धागा मैं स्वयं ही घर पर बना लूँगी, आज मेरे लिए बहुत खुशी का दिन है, मैं इसे यादगार बनाउंगी अपने भैया को राखी बांधकर। भले ही आज राखी का त्योहार हो न हो, ये तो भाई बहन का प्रेम है, ये प्रेम और रक्षा का धागा जब बांधो तभी त्योहार है समझो।

अल्का सत्येंद्र की आंखों में देखते हुए मुस्कुरा मुस्कुरा कर कह रही थी और सत्येंद्र भी अपनी भाभी के इस नए तरीके से अचंभित भी था और खुश भी।

सत्येन्द्र- भौजी चाहते तो आपके भैया भी यही है पर घर में सब है, ये सब कैसे हो पायेगा, कोई देख लेगा तो।

अल्का- रात को जब सब सो जाएंगे तब छत पर अपने भैया को राखी बाँधूंगी, तुम भैया को बोल देना की उनकी ये बहन रात को 2 बजे उसका छत पर बड़ी बेसब्री से इंतज़ार करेगी....बोल दोगे न

कहकर फिर अल्का मुस्कुरा पड़ी।

सत्तू मुस्कुराहट पर फिदा हो गया, और जैसे ही गालों को चूमने के लिए झुका, अल्का ने उसके होंठों पर अपनी गोरी गोरी उंगली रखकर रोकते हुए कहा- इस तरह अपनी बहन को नही चूमते....गंदी बात......

सत्येंद्र अल्का की आंखों में मुस्कुराकर गहराई से झांकने लगा।

अल्का- बोलो.....बोल दोगे न मेरे भैया को....

सत्येंद्र- बोलना क्या भौजी मैं तो उन्हे पकड़ कर आपके पास ले आऊँगा, जाएंगे कहाँ, (अल्का हंसने लगी) और वैसे भी वो तो खुद तड़प रहे हैं आपसे राखी बंधवाने के लिए, वो जरूर आएंगे रात के 2 बजे आपके पास छत पर अपनी बहन से राखी बंधवाने।

अल्का- फिर मौका लगते ही बाजार से मिठाई ला देना मेरे देवर जी।

सत्येन्द्र- ठीक है मेरी छोटकी भौजी.....जरूर।

कुछ देर दोनों खड़े खड़े दूसरे की आंखों में देखते रहे फिर सत्येंद्र बोला- अब कभी इन प्यारी और नशीली आँखों में आंसू मत आने देना।

अल्का- नशीली

सत्येंद्र- हां नशीली......बहुत नशीली

अल्का- बहन की आँखे भी कहीं नशीली होती हैं।

सत्येंद्र- अब जो है उसे नज़रंदाज़ भी तो नही कर सकते न, नही तो उस खूबसूरती की अवहेलना नही होगी, किसी की बहन की हो चाहे न हो पर मेरी बहन की तो है न, अब इन आँखों में देख रहा हूँ तो नशा तो चढ़ ही रहा है न।

अल्का ने सत्येंद्र के गाल हल्के से खिंचे और बोली- नशा चढ़ रहा है, बस अब बस भी करो.....अपनी बहन से ऐसी बात बार बार नही, दीवारों के भी कान होते हैं, कोई सुन लेगा तो।

सत्येंद्र- अच्छा....पर कर तो सकते हैं न ऐसी नशीली बात अपनी बहन से।

अल्का थोड़ा सोचने के बाद- हम्ममम्म....संभल संभाल के कभी कभी....कोई सुन न ले बस।

सत्येंद्र- इसका मतलब ग्रीन सिग्नल है।

अल्का- किस बात का?

सत्येंद्र- अपनी बहना को छेड़ने का।

अल्का ने कस के सत्येंद्र की कमर में चिकोटी काटी और बोली- धत्त....गन्दू भैया हो तुम...अब जाओ..... और जो बोला है उसका ध्यान रखना।

सत्येंद्र सब्र रखकर जाने लगता है अल्का धीरे से बोलती है- रात को ठीक 2 बजे छत पर।

सत्येंद्र- जो आज्ञा मेरी बहना।

सत्येन्द्र बाहर चला जाता है और अल्का मुड़कर खाना बनाने के लिए जाती है, सत्येंद्र बाहर आ कर देखता है कि किरन उसकी बहन दीवार पर पीला रंग जल्दी जल्दी लगाए जा रही थी, और सौम्या भाभी बाग में गाय को बांधकर उसे नहला रही थी।

सत्येंद्र को देखते ही किरन मुस्कुरा उठी और बोली- बहुत देर लगा दी भाई, भाभी खुश नही हो रही थी क्या जल्दी?

(कहकर हँसने लगी।)

सत्येंद्र- हां बस यही समझ ले, बहुत मेहनत करनी पड़ी तब जाकर चेहरे पर से उदासी छटी उनके।

किरन ने मुस्कुराते हुए सत्येंद्र की तरफ देखा और जैसे ही सत्येंद्र की नज़रे किरन से टकराई वो और ज्यादा मुस्कुराते हुए दीवार की तरफ देखने लगी।

सत्येंद्र- दीदी, लाओ मैं भी लगवा देता हूँ जल्दी हो जाएगा।

किरन- हाँ वो जो रद्दी कपड़ा पड़ा है न उसी में से किनारे से थोड़ा सा चीर ले, और कटोरे में पीला रंग लेके, गोल गोल बस इन दोनों छपे हांथों के बीच में बिंदु बनाना है।

सत्येंद्र- बीच में

किरन- हां बीच मे

सत्येंद्र ने फिर जोर देकर कहा- बीच में

किरन को जब बात का अर्थ समझ आया तो वो शर्मा गयी और कुछ देर चुपचाप मंद मंद मुस्कुराते हुए अपना काम करती रही, सत्येंद्र कनखियों से उसे देखता रहा, ये बात किरन भांप रही थी कि उसका भाई कनखियों से उसे देख रहा है जिससे वो और लजा जा रही थी, भले ही वो कुछ देर पहले अल्का के साथ सब के सामने थोड़ी अश्लील मजाक कर रही थी पर उसने ये कभी नही सोचा था कि उसका भाई किसी एक शब्द को पॉइंट करके जोर देकर उसे ऐसा अहसाह कराएगा, उसके लिए ये अचरज वाली बात थी, आज सत्येंद्र उससे ऐसी हिम्मत क्यों कर रहा है जबकि पहले कभी उसने ऐसा नही किया, उसे कुछ समझ में नही आया कि वो कैसी प्रतिक्रिया करे, इसलिए वो बस लजाते हुए दीवार की तरफ ही देखने लगी।

सत्येंद्र- दीदी

किरन- हम्ममम्म

सत्येंद्र- शर्मा गयी

किरन- अब ऐसी बातें करेगा तो शर्म नही लगेगी।

सत्येंद्र- अच्छा, आपने भाभी मां को कसम क्यों दी।

किरन फिर असहज हो गयी, कुछ देर बाद बोली- क्योंकि वो बात तुझे जानने लायक नही है।

सत्येन्द्र- पर क्यों दीदी? क्या वो बात इस लायक नही है या मैं उस बात के लायक नही हूँ, मुझे तो ऐसा लगता है कि मैं ही उस बात के लायक नही हूँ।

किरन- ये क्या बोले जा रहा है तू सत्येंद्र, तू मेरा भाई है, भला तू उस बात के लायक क्यों नही होगा, बस ये समझ ले कि वो बात ही तेरे लायक नही है, बहुत छोटी है।

सत्येंद्र- तो जब इतनी अहमियत है मेरी अपनी बहन की नज़र में, तो क्या मैं इस काबिल भी नही की अपनी बहन का दुख हर सकूं, क्या उस राखी के धागे की कोई अहमियत नही जो तुम हर साल मुझे बंधती हो, कहते हैं कि बहन भाई का रिश्ता मित्र की तरह होता है, पर मुझे इस बात का हमेशा दुख रहेगा कि मेरी बहन मुझे इस लायक नही समझती की मैं उसका दुख उससे दूर नही कर सकता।

किरन- भाई ये तू कैसी बातें कर रहा है, मैंने तो कभी सपने में भी ऐसा नही सोचा, और न कभी सोच सकती हूं, मैं तो बस इसलिए तुझे नही बताना चाहती कि कभी कभी कुछ बातें ऐसी होती है जिसे हम जानते हैं कि उसका हल नही है, बस इसलिए नही सांझा करना चाहती, पर अगर तू ऐसी बाते करेगा की मैं ऐसा सोचती हूँ कि मेरा भाई इस काबिल नही है, या मैं तुझे बाकी दोनों भाइयों से कम आंकती हूँ, तो ये मेरे लिए बहुत दुख की बात है, बल्कि मैं तो तेरे ज्यादा करीब हूँ दोनों भैया की अपेक्छा, तू मेरा भाई बाद में दोस्त पहले है, मैं तो ऐसा कभी सोचती भी नही।

सत्येंद्र- तो मेरी बहना, फिर क्यों तुमने मुझे उस बात से पराया कर रखा है, अगर नही बताओगी तो जीवनभर अब मेरे दिल में ये हलचल बनी रहेगी, की कोई एक वजह तो है जिसकी वजह से मेरी बहन अंदर से कभी कभी उदास हो जाती है।

किरन- ठीक है मैं तुझसे लिखकर मेरे दिल की बात बता दूंगी, कहकर नही बता पाऊंगी मुझे शर्म आती है, कल सुबह अपने तकिए के नीचे देख लेना मेरे मन का दुख एक कागज पर लिखा हुआ मिलेगा।

ऐसा कहकर किरन सत्येंद्र की ओर देखने लगती है, सत्येंद्र भी उसे देखने लगता है, दोनों काम भी करे जा रहे थे और बातें भी।

सतेंद्र- ये हुई न एक अच्छी बहना की बात, मेरे होते हुए भला मेरी बहन क्यों उदास रहेगी।

किरन ने हल्का मुस्कुराकर सत्येंद्र की तरफ देखा और सत्येंद्र सूर्य की तरफ देखकर बोला- हे सूर्य देव जल्दी से अस्त हो जाओ, ताकि जल्दी जल्दी सवेरा हो।

किरन हंस पड़ी और बोली- सब्र नाम की चीज़ तो तेरे अंदर बचपन से नही.....पगलू, चल जल्दी जल्दी खत्म कर इसको, देख सौम्या भाभी ने गायों को नहला भी दिया और दूसरी जगह बांध भी दिया, लो बाबू भी आ गए शादी के कार्ड लेकर।

सत्येंद्र के बाबू आते हुए दिखाई दिए, उन्होंने द्वार पर आकर साईकल रोकी और बड़ा सा थैला साईकल से उतार कर खाट पर रखा और खाट पर बैठते हुए बोले- किरन...... बिटिया पानी ला.....आज गर्मी कितनी है बाप रे बाप, सर पर अंगौछा नही बांधा होता तो साला खोपड़ी ही जल जाती आज तो मेरी।

सत्येंद्र दीवार पर छापे मारता रहा और किरन ने हाँथ धोया फिर "हाँ बाबू लायी" बोलते हुए घर में पानी लेने चली गयी।

To be Continued

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Dr. Chutiya
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Jangali
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किरन हंस पड़ी और बोली- सब्र नाम की चीज़ तो तेरे अंदर बचपन से नही.....पगलू, चल जल्दी जल्दी खत्म कर इसको, देख सौम्या भाभी ने गायों को नहला भी दिया और दूसरी जगह बांध भी दिया, लो बाबू भी आ गए शादी के कार्ड लेकर।

सत्येंद्र के बाबू आते हुए दिखाई दिए, उन्होंने द्वार पर आकर साईकल रोकी और बड़ा सा थैला साईकल से उतार कर खाट पर रखा और खाट पर बैठते हुए बोले- किरन...... बिटिया पानी ला.....आज गर्मी कितनी है बाप रे बाप, सर पर अंगौछा नही बांधा होता तो साला खोपड़ी ही जल जाती आज तो मेरी।

सत्येंद्र दीवार पर छापे मारता रहा और किरन ने हाँथ धोया फिर "हाँ बाबू लायी" बोलते हुए घर में पानी लेने चली गयी।

भटकइया का फल | Bhatkaiya Ka Fal | Update 10

किरन घर में जाते ही आवाज लगाते हुए बोली-भौजी......कहाँ हो?......बाबू जी आ गए हैं......पानी दे जरा उनको पीने के लिए।

अल्का- हां दीदी......अभी आयी.....ये आंटा गूंध रही हूं, जरा ले लोगी, मेरे हांथ में आंटा लगा है।

किरन- अच्छा रहने दे मैं खुद ही ले लूँगी....... काला वाला देसी गुड़ कहाँ रखा है।

अल्का- वहीं कोठरी में बड़की संदूक के बगल में मटकी में रखा है।

किरन ने जल्दी से भउकी उठायी और उसमे गुड़ निकाल कर एक लोटे में पानी लिया और कोठरी से निकल कर रसोई के सामने से जब जाने लगी, तो अचानक ही सामने अल्का पर नज़र पड़ी जो उकडू बैठ कर हुमच हुमच कर आटे को अच्छे से गूँथने में लगी थी, पल्लू सरक कर नीचे गिरा हुआ था और ब्लॉउज में गोरी गोरी दोनों मखमली चूचीयाँ ऐसे थिरक रही थी की उनको देखकर किरन की भी सिसकी निकल गयी, दोनों गुदाज दूध के कलश ऐसे उभरकर बाहर आने को तैयार थे की मानो ब्लॉउज के अंदर उनका दम घुट रहा हो, गोरी गोरी दोनों चुचियों के बीच की घाटी ने तो किरन का मन मोह लिया।

वो तुरंत रुककर बोली- हाय भौजी काश मैं भैया होती।

अल्का का ध्यान अब किरन पर गया- क्यों?

जल्दी से किरन ने जीभ को बड़े ही कामुक ढंग से अपने होंठों पर फिराते हुए आंखों से छलकती चूची की ओर इशारा किया, तो अल्का ने सर झुका कर अपनी चूचीयों को देखा और लजाते हुए मुस्कुराकर बोली- तेरे खरबूजे क्या कम हैं क्या, हाय देखो कैसे दोनों खरबूजे की दोनों मूंगफली ब्लॉउज के ऊपर से ही झलक रही है, गुड़ तो तू ले ही जा रही है, बस उसमे ये मूंगफली मिला ले और फिर बन जायेगा ग़ज़्ज़क और बाबू को खिला देना, मस्त न हो जायें बाबू तो कहना। हाय तुम्हारे खरबूजे मेरी ननद रानी।

अल्का तो थी ही बदमाश, ईंट का जवाब पत्थर से दे दिया उसने, किरन शर्म से दोहरी हो गयी - तुम आंटा गूंथ लो फिर बताती हूँ तुम्हे, मूंगफली की ग़ज़्ज़क बहुत बनानी आती है न तुम्हें, तुम्हारी मूंगफली नही दबोची न तो मेरा नाम नही।

दोनों हंसने लगी, अल्का बोली- अच्छा जा पहले खरबूजा खिला के आओ फिर मूंगफली दबोचना।

किरन शर्म की लाली चेहरे पर लिए बाहर आई और तब तक सत्तू ने काम खत्म कर लिया था, तब तक सौम्या भी वहां आ गयी थी और सत्तू की अम्मा भी, सत्तू के बाबू ने पानी पिया और सब शादी का कार्ड देखने लगे, इधर उधर की बातें होने लगी। किरन बार बार कनखियों से सत्तू को देखती, हल्का मुस्कुराती, सत्तू कभी अपनी भाभी मां को देखता कभी बहन किरन और मां को, शादी के कार्ड को कल से ही बांटने का निर्णय लिया गया, सत्तू के बाबू ने कल दो चार रिश्तेदारियों में जाने की बात कही, सत्तू बोला- बाबू जी मैं चला जाऊंगा। तो उन्होंने उसको एक दो दिन बाद से बाटने के लिए बोला, उनका कहना था कि अभी एक दो दिन तुम घर के काम देख लो, फिर कार्ड बाटने में मदद करना, बातचीत खत्म हुई और सबने खाना खाया, शाम हो गयी।

सत्तू शाम को बहाना करके बाजार गया, उसने रसगुल्ले लिये और एक नाक की नथनी खरीदी, घर आके समान छुपा के रख दिया। रात का इंतज़ार होने लगा, इधर किरन ने अपने मन का दुख एक कागज पर लिखा और उसको अपने ब्लॉउज में खोंस लिया, अल्का ने रात को सबका खाना परोसने से पहले अपने कमरे में रेशम के सुंदर धागों से एक प्यारी सी राखी बनाई और थाली का सारा सामान तैयार कर लिया, सबने फिर खाना खाया और अपनी अपनी खाट पर सोने की तैयारी होने लगी, सौम्या और किरन अपने अपने कमरे में सोती थी, किरन वैसे तो कभी अल्का के साथ या कभी सौम्या के साथ या फिर कभी बाहर अम्मा के बगल में खाट डाल के सो जाया करती थी, पर आज वो अम्मा के साथ बाहर ही सो रही थी। अल्का ने सोने से पहले नहाया और अपने कमरे में आके लेट गयी, नींद न तो सत्तू की आंखों में थी और न ही अल्का के, किरन का भी मन हल्का हल्का मचल रहा था, कुछ देर न जाने क्या सोचते सोचते वो नींद की आगोश में चली गयी।

जैसे ही 2 बजने में कुछ वक्त बाकी रह गया सत्तू धीरे से खाट से उठा और दबे पांव घर में चला गया, अल्का ने दरवाजा पहले ही खुला रख छोड़ा था, रात के अंधेरे में बहुत हल्का हल्का दिख रहा था, किसी तरह अपने कमरे तक पंहुचा, सत्तू ने अपने कमरे में जाकर कुर्ता पहना, अब तक आंखें अंधेरे में अभ्यस्थ हो गयी थीं, उसने रसगुल्ले का डब्बा लिया और नथनी की डिब्बी जेब में डालकर धीरे से दबे पांव छत पर गया, रात के अंधेरे में वो छत पर इधर उधर देखने लगा, अंधेरा होने के बावजूद भी हल्का हल्का दिखाई दे रहा था, आंखें अब तक तो इतनी अभ्यस्त हो ही गयी थी, छत पर उत्तर की तरफ कोने में छत की बाउंड्री की दीवार से सटकर अल्का खड़ी थी, सत्तू नजदीक गया, दोनों एक दूसरे को देखकर मानो चहक उठे, सत्तू से रहा नही गया उसने अल्का को बाहों में भर ही लिया, अल्का धीरे से भैया कहते हुए सत्येन्द्र की बाहों में ऐसे समा गई मानो बरसों की प्यासी हो, रेशमी साड़ी में उसका बदन और भी उत्तेजना बढ़ा रहा था, अल्का बार बार सत्तू को "भैया....मेरे प्यारे भैया....कहाँ थे अब तक......क्यों तड़पाया अपनी बहन को इतना.....अब कभी मुझे अकेला मत छोड़ना......आज मैं कितनी खुश हूं अपने भैया को पाकर" बोले जा रही थी।

सत्येंद्र के मुंह से भी "ओह मेरी बहन.....आज मुझे एक और बहन मिल गयी, तू कितनी प्यारी है.....अपनी ही भौजी को बहन के रूप में पाकर बहुत प्यारा और गुदगुदी जैसा अहसास हो रहा है।"

ये सुनकर अल्का मुस्कुरा उठी।

ऐसा कहकर सत्येंद्र ने अल्का को और कस के बाहों में भींच से लिया, उसके हाँथ हल्का सा अल्का की पीठ सहलाने लगे, जिसका अहसाह अल्का को बखूबी हुआ और लजाते हुए उसने "आह भैया" कहकर अपनी आँखें बंद कर ली, और जब अल्का के मुंह से आह भैया निकला तो सत्येन्द्र मन ही मन झूम उठा, उसने एक दो बार और कस कस के अल्का की पीठ को सहलाया तो अल्का अब हल्का सा सिसक भी उठी पर जल्दी से अपने को संभालते हुए बोली- ये सब बाद में पहले राखी।

सत्येन्द्र- क्या सब बाद में मेरी बहना।

अल्का हल्का सा शर्माते हुए- यही......बहन को बाहों में लेना।

सत्येन्द्र- अभी मन नही भरा।

अल्का- मैं चाहती भी नही की मेरे भैया का मेरे से मन भरे (अल्का ने ये बात सत्तू के कान में धीरे से कही)...पर पहले पूरी तरह बहन तो बना लो।

सत्येन्द्र- बहन तो तुम मेरी हो ही.....बन गयी न बहन।

अल्का- पवित्र राखी का धागा बंधने के बाद......जितना जी करे उतना बाहों में भर लेना.....चलो बैठो...... मेरे भैया राजा।

अल्का ने बगल में रखी चटाई अंधेरे में बिछाई और दोनों आमने सामने बैठ गए, अल्का ने राखी की थाली बीच में रखी।

अल्का- किसी को आहट तो नही लगी तुम्हारे आने की।

सत्तू- नही......सब सो चुके हैं।

अल्का हल्का सा हंस दी फिर बोली- इसलिए ही तो रात के 2 बजे का वक्त रखा था।

ऐसा कहते हुए अल्का ने जैसे ही थाली में रखी माचिस उठा के जलाई, एक छोटी सी रोशनी ने दोनों के चहरे को जगमगा दिया, सत्तू अपनी अल्का को देखता ही रह गया, अल्का ने पल्लू सर पर रख लिया था, गोरा गोरा चांद सा मुखड़ा इतना खूबसूरत था कि कुछ पल वो अल्का को देखता ही रह गया, आज की अल्का उसने पहले कभी नही देखी थी, अल्का ने भी सत्तू को एक पल के लिए निहारा फिर मुस्कुराकर थाली में रखे दिए को जला दिया, दिए कि हल्की रोशनी फैल गयी, सत्तू तो एक टक अल्का को देखे ही जा रहा था और अल्का मुस्कुरा मुस्कुरा कर थाली सजा रही थी।

जैसे ही अल्का ने अपनी हाँथ की बनाई हुई रेशम के धागे की राखी थाली में रखी सत्तू ने उसे उठाकर देखा- कितनी प्यारी राखी बनाई है मेरी बहना ने, सच ये राखी बहुत अनमोल है, कितनी खूबसूरत है ये बिल्कुल मेरी बहन जितनी।

अल्का- तुम्हें पसंद आई भैया.....जल्दी जल्दी में बनाई मैंने, ज्यादा वक्त मिल नही पाया न।

सत्तू- इतनी खूबसूरत राखी मैंने आजतक नही देखी, कितना पवित्र है ये धागा.....पवित्र धागा।

अल्का- जैसे मेरा और आपका प्यार।

दोनों एक दूसरे को मुस्कुराते हुए देखने लगे।

अल्का- मिठाई लाये हो न भैया।

अब जाके सत्तू का सम्मोहन टूटा, अल्का हंस पड़ी- आज पहली बार देख रहे हो क्या?

सत्तू- सच आज जो देख रहा हूँ......पहली बार ही देख रहा हूँ.......कितनी खूबसूरत हो तुम.....बहुत.....बहुत खूबसूरत हो।

अल्का हंस पड़ी- बस बस, दुबारा बेसुध मत हो जाना मेरे भैया।

सत्तू ने रसगुल्ले का डिब्बा अल्का को थामते हुए कहा- बिल्कुल ऐसी ही मीठी हो तुम।

अल्का हंस पड़ी और डिब्बा खोला- सफेद बडे बडे रसगुल्ले देखकर वो सत्तू को देखने लगी और मुस्कुरा उठी, मेरे भैया को पता है मेरी पसंद।

सत्तू- क्यों नही पता होगी, बहन की पसंद भाई को तो पता होती ही है।

अल्का ने डब्बा बगल में रखा और सत्तू ने एक रुमाल निकाल कर अपने सर पर रख लिया, अलका ने थाली उठाकर सत्येंद्र की आरती की, सत्तू मंत्रमुग्ध सा अल्का को देख रहा था, आरती करने के बाद अल्का ने थाली में रखी रोली से सत्तू के माथे पर टीका किया, और अब उसने राखी उठायी और सत्तू ने सीधा हाँथ आगे कर दिया, अल्का "भैया मेरे राखी के बंधन को निभाना" वाला गाना हल्का हल्का गुनगुनाते हुए राखी का पवित्र धागा उसकी कलाई पर बांधने लगी, दोनों के बदन में अलग ही रोमांच भरता जा रहा था सत्तू बस एक टक अल्का को देखे जा रहा था।

राखी बांधने के बाद अल्का ने कलाई में बंधी राखी को बड़े प्यार से चूमा और जैसे ही सर उठा के सत्तू को देखा वो उसे एक टक निहार रहा था, अलका ने धीरे से कहा- लो बन गयी मैं अब आपकी बहन.....ये कितना सुखद है.....इस राखी की लाज रखना मेरे भैया।

सत्तू ने बीच से थाली बगल में सरकाई और अल्का को खींच बाहों में भर लिया, अल्का भी झट से सत्तू की बाहों में जा समाई, सत्तू- "मेरी बहन"

अल्का थोड़ा भावुक होकर- "मेरे भैया आज से मैं और आप एक हैं।"

काफी देर तक दोनों चुपचाप एक दूसरे की बाहों में समाय एक दूसरे की रूह तक उतरते रहे, फिर अल्का धीरे से बोली- दिया जल रहा है, रोशनी में कोई देख न ले, पहले अंधेरा कर लो भैया, दिए को थोड़ा ओट में सरका दो।

सत्तू ने दिए को एक हाँथ से दीवार के किनारे रखकर उसके चारों तरफ बगल में पड़ी ईंट रखकर कुछ ऐसा ढंक दिया कि रोशनी बहुत कम हो गयी।

जैसे ही अल्का को दुबारा बाहों में कसना चाहा अल्का ने बगल में पड़े रसगुल्ले के डब्बे को उठाकर एक रसगुल्ला उसमें से निकालकर बोला- रसगुल्ला तो मैंने खिलाया ही नही अपने भैया को।

सत्तू- इस पवित्र बंधन की रसीली मिठाई तो हम एक साथ खाएंगे।

अल्का- एक साथ......मतलब

सत्तू ने अल्का के हाँथ से वो रसगुल्ला लिया और बोला तुम मुँह खोलो।

अल्का ने आ कर दिया।

सत्तू ने वो बड़ा सा रस टपकाता रसगुल्ला अलका के मुंह मे आधा भरा और बोला पकड़े रहना, अल्का को समझते देर न लगी और वो गनगना सी गयी, उसने आँखे बंद कर ली, सत्तू ने आधे रसगुल्ले को धीरे से मुंह मे भरा, दोनों के होंठ टकरा गए, अल्का पूरी तरह सिरह उठी और झट से सत्तू से कस के लिपट गयी, चूचीयाँ तो दोनों मानो रगड़ सी गयी सत्तू से सीने पर इतनी कस के अल्का उससे लिपटी हुई थी।

सत्तू- कितना मीठा बना दिया बहना तुमने इस रसगुल्ले को अपने होंठों से छूकर।

सत्तू ने रसगुल्ला मुँह में भरे भरे अल्का के कान में धीरे से कहा तो वो और भी सिरह गयी, चुप करके बस लिपटी हुई थी सत्तू से, और दोनों एक दूसरे से लिपटे हुए रसगुल्ले का आनंद लेने लगे, सत्तू- बहना एक और

अल्का ने एक रसगुल्ला और उठाया तो सत्तू बोला- पहले मेरी गोद में ठीक से बैठो।

अल्का- कैसे बैठूं बताओ।

सत्तू- दोनों पैर मेरी कमर के अगल बगल लपेटकर मेरी गोद में बैठो न।

अल्का- वैसे? (अल्का बेहद शर्मा गयी)

सत्तू- हां वैसे.....बैठो न

अल्का ने एक बार आस पास घूम कर देखा, हालांकि अंधेरा था, पर फिर भी वह पहले आश्वस्त हुई और धीरे से एक हाँथ में रसगुल्ला लिए दूसरे हाँथ से अपनी रेशमी साड़ी को थोड़ा ऊपर करके अपने दोनों पैर सत्तू के अगल बगल रखकर उसकी गोद मे बैठती चली गयी,
अब क्योंकि वो दोनों पैर खोलकर और अपने भैया की कमर पर लपेट कर उसकी गोद में बैठी थी जिससे उसकी साड़ी घुटनों तक उठ गई थी और उसकी अंदरूनी मांसल नग्न जांघे सत्तू की जाँघों पर सेट हो गयी थी, आज जीवन में पहली बार कोई जवान स्त्री जो कि उसकी भौजी और बहन थी जिसने अभी अभी उसे राखी बांधी थी, उसकी गोद में इस तरह साड़ी उठाकर सिर्फ एक बार कहने पर ही बैठ गयी थी, इस अहसाह से ही सत्तू का लंड संभालते संभालते भी तनकर लोहे ही तरह खड़ा हो ही गया, और क्योंकि पायजामे का कपड़ा हल्का था तो बखूबी उसका सख्त लन्ड अल्का की कच्छी के ऊपर से उसकी प्यासी बूर पर छूने लगा, जिससे अल्का बार बार सिरहकर, सिसक कर "ओह भैया" बोलते हुए सत्तू से लिपट ही जा रही थी, दोनों ही जान रहे थे कि वो क्या कर रहे हैं, लेकिन करना भी चाह रहे थे।

जोश के मारे सत्तू के तने हुए लन्ड की हलचल को जब अल्का ने अपनी बूर पर महसूस किया तो एक अजीब सी सनसनाहट से उसका बदन गनगना गया, लज़्ज़ा से भरकर वो झट से फिर से सत्तू की गोद में बैठे बैठे उससे लिपट गयी, उसके दिल की तेज धड़कन को सतेंद्र बहुत अच्छे से महसूस कर रहा था।

सत्येन्द्र के हाँथ अल्का की पीठ को हौले हौले सहला रहे थे जिससे अल्का सिसक उठी।

अल्का ने थोड़ा भारी आवाज में धीरे से कहा- भैया रसगुल्ला खा लो न, सारा रस टपक रहा है।

सत्तू- खिलाओ न मेरी बहना।

अल्का ने बड़ी अदा से रसगुल्ला आधा मुँह में लिया और सत्तू के होंठ जैसे ही रसगुल्ला काटते वक्त अल्का के होंठ से छुए, अल्का "बस" बोलते हुए झट से सत्तू से लिपट गयी।

सत्तू तरसता हुआ बोला- बहन.......छूने दो न

अल्का धीरे से कान में- क्या भैया?

सत्तू- अपने नाजुक होंठ।

अल्का शर्म के मारे दोहरी हो गयी, चुप से लिपटी रही साँसे उसकी काफी तेज ऊपर नीचे होने लगी।

सत्तू ने उसकी ब्लॉउज में से झांकती नंगी पीठ को हल्का सा दबाया और फिर बोला- बोलो न बहना, क्या इस पल को यादगार नही बनाओगी?

अल्का फिर भी कुछ न बोली बस उसकी साँसे ऊपर नीचे होती रहीं, कुछ पल के बाद उसने धीरे से "भैया" बोलते हुए सत्तू की गर्दन पर हल्का सा अपने नाजुक होंठ रगड़कर सिग्नल दिया, दोनों के रोएँ तक रोमांच में खड़े हो गए।

सत्तू अल्का को गोद में लिए लिए धीरे धीरे चटाई पर लेटता चला गया, जैसे जैसे अल्का चटाई पर लेटती गयी सत्तू अपनी बहन पर चढ़ता चला गया, दोनों के बदन एक हो गए, लज़्ज़ा और शर्म के साथ दोनों बुरी तरह एक दूसरे ले लिपटे हुए थे, अल्का के मुँह से हल्की हल्की सिसकियां निकलने लगी, सत्तू ने अल्का के दोनों पैरों को अलग किया तो अल्का ने पैर उठाकर सत्तू की कमर पर लपेट दिए, ऐसा करने से सत्तू के दहाड़ते लन्ड को रास्ता मिल गया और जैसे ही उसने कच्छी के ऊपर से अलका की फूली हुई प्यासी बूर पर दस्तक दी, अल्का बुरी तरह शर्माकर सत्तू से चिपकते हुए मचल उठी "बस भैया", इतना ही उसके मुंह से निकला और मस्ती में उसकी आंखें बंद हो गयी।

सत्तू ने धीरे से उसका चेहरा थामा और उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिये।

सब भूल गए दोनों, कुछ पता ही नही चला कि कब अल्का के होंठ खुल गए और दोनों एक दूसरे के मुँह में जीभ डाल डाल के एक दूसरे को चूमने लगे, हल्का हल्का अल्का सिसकते हुए "आह भैया....मेरे भैया....कहाँ थे अबतक" और सत्तू "मेरी बहना... मेरी जान....कितनी रसीली है तू.....तेरे गाल तेरे होंठ" बोले जा रहे थे।

दोनों बेसुध होकर तब तक एक दूसरे के चुम्बन में डूबे रहे जब तक होंठों में हल्का हल्का दर्द नही होने लगा, सत्तू का लन्ड पूरा सख्त होकर कच्छी के ऊपर से अल्का की बूर पर कब से दस्तक दे रहा था, जिसे महसूस करके अल्का लजाकर बार बार सिसक जा रही थी, सत्तू से रहा नही जा रहा था क्योंकि अल्का की बूर की फांके कच्छी के ऊपर ही उसे बखूबी महसूस हो रही थी जिसके बीच में वो अपना बेकाबू लन्ड काफी देर से हल्का हल्का रगड़ ही रहा था, अल्का के लिए भी बर्दाश्त कर पाना बहुत मुश्किल हो रहा था पर जैसे ही सत्तू ने एक दो सूखे धक्के बूर पर मारे अल्का ने सिसकते हुए उसके नितम्बों पर हाँथ रखते हुए उसे रोक लिया और स्थिति को काबू करते हुए बड़ी मुश्किल से सत्तू को समझाते हुए बोली-
"आह भैया सुनो न.....ये सब अभी नही"

सत्तू - मुझसे बर्दास्त नही हो रहा बहना, मुझे चखना है.....आज तक कभी नही चखा इसको।

ये सुनकर अल्का बहुत गर्म हो गयी फिर भी संभलते हुए बोली- आपको क्या लगता है आपकी बहन आपको चखायगी नही, इस चीज़ से आपको वंचित रखेगी, वो तो खुद तड़प रही है।

सत्तू- फिर मेरी बहना..... फिर.....चखने दो न।

अल्का- पर मेरे भैया अभी थोड़ा सब्र रखो, ऐसी चीज़ अच्छे से खाई जाती है, जल्दबाजी में नही, मैं नही चाहती कि मेरी इस अनमोल चीज़ को मेरे भैया जल्दी जल्दी खाएं, अभी देखो वक्त बहुत कम है हम पकड़े जा सकते हैं.... इसलिए अभी सब्र रखो.... जैसे इतना दिन सब्र रखे वैसे ही थोड़ा सा और.....जल्द ही मौका निकाल के चखाउंगी इसको तुम्हें।

सत्तू- "ओह मेरी बहन...तू कितनी अच्छी है"

दोनों फिर बुरी तरह लिपट गए, सत्तू ने धीरे से अल्का के कान में कहा- "बहुत रसीली हो तुम"

अल्का ने भी धीरे से मचलते हुए कहा- "मेरे भैया"

सत्तू ने जल्दी जल्दी अल्का के गालों और होंठों को कई बार फिर चूमा और अल्का हौले हौले मचलती सिसकती रही।

सत्तू ने कहा- पता है मैं अपनी बहना के लिए क्या गिफ्ट लाया हूँ।

अल्का - गिफ्ट

सत्तू- ह्म्म्म गिफ्ट

अल्का- तो लाओ दो मेरा गिफ्ट, राखी की बंधाई।

अल्का थोड़ा हंस के बोली।

सत्तू ने जेब से नथनी का डिब्बा निकाला और उसके हाँथ पर रख दिया।

दिए को थोड़ा पास लेके आया।

अल्का- ये क्या है?

सत्तू- डिबिया तो खोलो।

अलका ने डिबिया खोली और नथनी देखते ही खुशी से झूम उठी- इतनी प्यारी?

सत्तू- प्यारी बहना के लिए तो प्यारी सी ही नथनी होगी न।

अल्का फिर खुशी से लिपट गयी सत्तू से, सत्तू ने उसे फिर हल्के हल्के चूमा, अल्का बोली- तो पहनाओ अपने हाँथ से भैया अपनी बहना को।

सत्तू ने नथनी अल्का को पहनाई और उस नथनी को चूम लिया "कितनी प्यारी लग रही है मेरी बहना इसे पहनकर....बहुत खूबसूरत"

अल्का- मेरे भैया का प्यार है न इसमें, तो मेरी सुंदरता तो निखारेगी ही ये।

फिर अल्का और सत्तू उठ गए, समान समेटकर दोनों नीचे आये, सत्तू ने नीचे उतरते वक्त एक बार फिर अल्का को सीढ़ियों पर बाहों में भरकर चूम लिया, किसी तरह दोनों ने अपने को संभाला और सत्तू फिर चुपके से बाहर आ गया, अल्का दबे पांव अपने कमरे में चली गयी समान रखा, नथनी उतारकर संभाल कर रखी और साड़ी बदली और पलंग पर लेट गयी, नींद अब भी आंखों से कोसों दूर थी, वो छुवन वो अहसाह अलग ही सनसनी बदन में पैदा कर रही थी, मंद मंद मुस्कुराते हुए जैसे ही उसने अपनी योनि को छुआ, मखमली योनि पूरी तरह गीली हो चुकी थी, मुस्कुराते हुए वो बस न जाने कब तक "मेरे भैया...ओ मेरे सैयां" बुदबुदाते हुए धीरे धीरे सो गई।

To be Continued

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सत्तू ने नथनी अल्का को पहनाई और उस नथनी को चूम लिया "कितनी प्यारी लग रही है मेरी बहना इसे पहनकर....बहुत खूबसूरत"

अल्का- मेरे भैया का प्यार है न इसमें, तो मेरी सुंदरता तो निखारेगी ही ये।

फिर अल्का और सत्तू उठ गए, समान समेटकर दोनों नीचे आये, सत्तू ने नीचे उतरते वक्त एक बार फिर अल्का को सीढ़ियों पर बाहों में भरकर चूम लिया, किसी तरह दोनों ने अपने को संभाला और सत्तू फिर चुपके से बाहर आ गया, अल्का दबे पांव अपने कमरे में चली गयी समान रखा, नथनी उतारकर संभाल कर रखी और साड़ी बदली और पलंग पर लेट गयी, नींद अब भी आंखों से कोसों दूर थी, वो छुवन वो अहसाह अलग ही सनसनी बदन में पैदा कर रही थी, मंद मंद मुस्कुराते हुए जैसे ही उसने अपनी योनि को छुआ, मखमली योनि पूरी तरह गीली हो चुकी थी, मुस्कुराते हुए वो बस न जाने कब तक "मेरे भैया...ओ मेरे सैयां" बुदबुदाते हुए धीरे धीरे सो गई।

भटकइया का फल | Bhatkaiya Ka Fal | Update 11

सुबह सब उठे, सत्येन्द्र थोड़ी देर तक सोता रहा, जैसे ही वो उठा उसने देखा कि सब उठ गए हैं अल्का द्वारा बांधी राखी को बड़े प्यार से चूमकर वह पूरी बाजू चढ़ाकर उसे छुपाता हुआ उठने लगा कि तभी उसे किरन की बात याद आयी और उसने तकिया उठा कर देखा तो उसके नीचे एक कागज था, उसने झट से वह कागज उठा लिया और कुर्ते की जेब में रखने लगा तो फिर उसे ध्यान आया कि रात को तो सोते समय उसने टीशर्ट पहना हुआ था अब ये कुर्ता किसी ने देख लिया तो पूछेगा जरूर, मुझे यह रात को ही उतार देना चाहिए था, वह उठकर घर में गया अपने कमरे में जाकर कपड़े बदले, बाहर आ गया , किरन और सौम्या सुबह सुबह मिलकर बर्तन धोने में लगी थी, अल्का रसोई में सबके लिए नाश्ता बना रही थी, सत्येंद्र के बाबू पशुओं को चारा डाल रहे थे, जैसे ही वो बाहर आया।

सौम्या- रात को कहीं गए थे क्या कुर्ता पहन के देवर जी (इतना कहकर सौम्य हंसने लगी)

किरन भी अपने भाई को देखकर मुस्कुरा ही रही थी।

सत्तू ने बात को संभालते हुए बोला- अरे भाभी माँ वो रात को गर्मी लग रही थी न तो कुर्ता ही पहन कर सो गया।

सौम्या- अच्छा दातुन वगैरह करके आओ, नाश्ता अल्का ने तैयार कर दिया है, सब नाश्ता कर लेते हैं, फिर अपने अपने काम में लगेंगे आज बहुत काम है।

सत्येन्द्र फ्रेश हुआ और कुछ ही देर में सब लोग बरामदे में बैठे थे, अल्का और किरन चाय-नाश्ता लेकर आई, प्लेट्स टेबल पर रखकर खाट पर बैठ गयी, सब नाश्ता करने लगे, सत्तू ने सबकी नजर बचा के अल्का को दिखाते हुए हाँथ उठा के राखी को चूमा तो अल्का मुस्कुरा उठी। सत्येंद्र कभी अल्का को देखता कभी सौम्या को तो कभी किरन को।

सत्येंद्र के बाबू- चलो ठीक है नाश्ता तो हो गया अब मैं निकलता हूँ, आज कई जगह जाना है, आते आते शाम हो जाएगी।

अल्का- बाबू जी खाना बना देती हूं, खाना खा के जाइये।

इंद्रजीत- नही बहू देर हो जाएगी मैं निकलता हूँ।

किरन ने इशारे से सत्तू को बोला कि तकिए के नीचे कुछ रखा था मैंने।

सत्तू ने भी इशारे से उसे आश्वस्त कर दिया कि मैंने ले लिया है।

सब अपने अपने कामों में लग गए, सत्तू खेत में गया और उसने वहां एक पेड़ के नीचे बैठकर वो कागज खोला जो किरन ने उसके लिए लिखा था, अपनी बहन किरन की लिखी बातों को वो पढ़ने लगा।

" मेरा मन कभी कभी बस इसलिए उदास हो जाता है कि मैं इतनी खुशकिस्मत नही जितनी और भाभियाँ होती हैं, जितनी अल्का भाभी और सौम्या भाभी हैं, जिस तरह अल्का भाभी और सौम्या भाभी के जीवन में देवर का प्यार, हंसी मजाक शामिल है या किसी भी स्त्री के जीवन में उसके देवर का साथ शामिल होता है मेरी किस्मत में कहां, भाई तुम तो जानते हो कि मेरा कोई देवर नही है, तेरे जीजा जी एकलौते हैं, जब मायके आती हूँ तो तुम्हें और भाभियों को हंसी ठिठोली करते देख मेरा मन कहीं न कहीं मुझसे ये कहता है कि काश मेरा भी कम से कम एक देवर होता, ये रिश्ता ही बहुत उमंग भरा होता है, देवर अपनी भाभी का एक बहुत गहरा दोस्त होता है, जिससे वो अपने दिल की हर बात कह सकती है, पर मेरी किस्मत में ये कहाँ, बस यही बात थी, मैं ये कभी किसी से कहती नही क्योंकि लोग न जाने क्या क्या सोचेंगे कि देवर के लिए तरस रही है, पर हाँ मैं तरसती तो हूँ, ससुराल बिना देवर के सूना सूना लगता है और कभी कभी जीवन भी, और ये भी सत्य है कि जीवन में सब कुछ नसीब नही होता, और कोई बात नही है बस यही बात थी"

सत्तू अपनी बहन के मन का दुख जानकर परेशान हो गया काफी देर वो खेतों में टहलता रहा कि तभी उसको गांव का एक आदमी उसके घर की तरफ जाते हुए दिखा तो उसने उससे कहा- काका मेरे घर की तरफ जा रहे हो क्या?

काका- हां बेटा, बताओ क्या काम है?

सत्तू- मेरी बहन किरन को बोल देना की तेरा भाई ट्यूबेल पर तुम्हें बुला रहा है कुछ काम है खेत का।

काका- ठीक है बेटा जाके बोल देता हूँ।

सत्येंद्र खेत में बने ट्यूबेल में चला गया, थोड़ी देर में किरन आयी, ट्यूबेल के अंदर गयी, अपने भाई को अपना इंतज़ार करता देखा हल्का सा मुस्कुरा दी, वो समझ गयी कि सत्तू ने वो कागज पढ़ लिया है।

सत्तू- इतने दिनों तक ये मन की बात तुमने मुझसे छुपा कर रखी न।

किरन- बताती भी तो कैसे? क्या ये सब कहने लायक बातें हैं पर तुमने विवश कर दिया तो कहना पड़ा भैय्या, जीवन में कभी कभी कुछ खालीपन ऐसे होते हैं जिसको भरा नही जा सकता।

सत्तू- क्यों नही भरा जा सकता, अपने भाई को क्या तुमने इतना असहाय समझ रखा है कि वो अपनी बहन के जीवन की एक छुपी हुई इच्छा को पूरी कर उसके दुख को हटा नही सकता।

किरन सत्तू की तरफ देखने लगती है, कुछ देर बाद- कुछ इच्छाएं ऐसी होती है जिसको पूरा नही किया जा सकता, अब तुम क्या देवर बन जाओगे क्या? जो कमी है वो तो रहेगी न।

सत्तू- तो इसमें बुराई क्या है?

किरन आश्चर्य से सत्तू की तरफ देखने लगी।

सत्तू- हां हां....इसमें क्या बुराई है, अगर कुछ बदलने से मेरी बहन की उदासी के बादल छट सकते हैं तो मैं क्यों नही बन सकता?

किरन बड़े आश्चर्य से- पागल तो नही हो गया है, भाई है तू मेरा....तू मेरा देवर बनेगा? किसी को पता चल गया तो?

सत्तू थोड़ा नजदीक आकर- और अगर किसी को न पता चले तो? तो क्या बनाओगी मुझे अपना देवर?

किरन थोड़ा लजा कर- तू भाई है मेरा?

सत्तू और नजदीक आ गया और हल्का सा फुसफुसाकर बोला- अगर मैं वचन दूँ की जीवन भर किसी को कानो कान पता नही चलेगा..... तो बनाओगी मुझे अपना देवर?

सत्तू के इस तरीके से किरन के रोएँ खड़े हो गए वो एक टक उसकी आँखों में देखने लगी, चहरे पर उसके शर्म की लालिमा साफ दिख रही थी, फिर उसके मुँह से हल्के से निकला- लेकिन तू मेरा भाई है?

सत्तू अब तक अपना मुँह किरन के कान तक ला चुका था, उसके कान में उसने धीरे से कहा- क्या भाई बहन की खुशी के लिए उसका देवर नही बन सकता?

जैसे ही सत्तू की गर्म सांसे किरन के कानों से टकराई वो गनगना गयी, और होने वाले रोमांच में आंखें बंद करके वो धीरे से बोली- बन सकता है, पर किसी को पता न चले.

सत्तू- किसी को कुछ पता नही चलेगा, हम खूब मस्ती करेंगे।

"मस्ती" शब्द सुनकर किरन और भी सनसना सी गयी, उसकी सनसनाहट को सत्तू ने जैसे ही बखूबी महसूस किया, उसने किरन को खींचकर अपनी बाहों में भर लिया- "ओह मेरी भाभी"

किरन तो मानो बेसुध सी हो चुकी थी, आज पहली बार उसके सगे भाई ने इस कदर उसे गले लगाया था, वो उसकी बाहों में "मेरे प्यारे देवर जी" बोलते हुए समाती चली गई।

काफी देर तक दोनों एक दूसरे को "मेरी प्यारी भाभी" और "मेरे देवर जी" बोल बोल कर मदहोश होते रहे, दोनों के लिए ही ये एक नया रोमांच था, किरन ने कभी सोचा नही था कि वो इस कदर अपने ही सगे भाई की बाहों में समाएगी, इतना रोमांच तो उसे अपने पति के साथ भी नही आया था, ये दुगना आनंद ईश्वर उसकी झोली में एकाएक डाल देंगे इसकी उसे उम्मीद नही थी। वही हाल सत्तू का था, अपनी सगी बहन को आज पहली बार बाहों में इस कदर भरकर वो भी संतुलन खो बैठा था, दोनों एक दूसरे की बदन की खुश्बू को महसूस कर बहक से रहे थे, पर जल्द ही किरन ने खुद को संभाला और लजाते हुए बड़े प्यार से अपने भाई की आंखों में देखने लगी, सत्तू भी उसकी आँखों में देखने लगा।

किरन- तू मुझे इतना प्यार करता है कि मेरी खुशी के लिए मेरा देवर बन गया, कितनी भाग्यशाली हूँ मैं जो मुझे ऐसा भाई मिला जो मेरा भाई भी है और मेरा देवर भी।

सत्तू- कोई भी भाई अपनी बहन को उदास नही देख सकता, तो मैं तो अपनी इस बहन से बहुत प्यार करता हूँ, तो क्या मैं तुमको उदास देख सकता था...कभी नही मेरी भाभी।

किरन- ओह! मेरे देवर जी

किरन अपने भाई से खुद ही कस के लिपट जाती है और सत्येन्द्र के हाँथ उसके बदन पर कसते चले जाते है, किरन का लज़्ज़ा के मारे बुरा हाल भी होता जा रहा था, पर अतुल्य रोमांच में वो डूबती जा रही थी।

सत्तू ने धीरे से जैसे ही किरन की गर्दन पर एक चुम्बन लिया, किरन झट से सत्तू की आंखों में देखने लगी, उसके होंठ हल्का कंपन कर रहे थे, वो सत्तू की आंखों को पढ़ने की अभी कोशिश कर ही रही थी कि सत्तू ने धीरे से बड़े ही कामुक तरीके से अपनी तर्जनी उंगली किरन के हल्का थरथराते होंठों पर फेरी, किरन लजा कर अपने भाई से लिपट गयी और धीरे से बोली- भाभी के साथ ये सब करते हैं, ऐसी मस्ती करोगे अपनी भाभी के साथ?

सत्तू कुछ देर चुप रहा फिर धीरे से बोला- ठीक है अगर मेरी भाभी नही चाहेगी ऐसी मस्ती तो नही करूँगा, जैसी मस्ती वो चाहेगी वैसा ही करूँगा?

दोनों एक दूसरे की बाहों में कुछ देर समाये रहे, एक चुप्पी सी छाई रही, फिर किरन धीरे से बोली- मैंने ऐसा तो नही कहा देवर जी की मैं नही चाहूंगी।

ये सुनते ही सत्तू ने कस के किरन को थोड़ा और दबोच कर बाहों में भर लिया जिससे उसकी हल्की सी आह निकल गयी, सत्तू ने किरन की गर्दन पर जैसे ही हल्का सा चूमा, एक बिजली सी उसके बदन में दौड़ गयी, उसने जल्दी से सत्तू के होंठों पर उँगली रखते हुए बोला, ऐसी मस्ती यहां नही मिलेगी मेरे देवर जी, कोई आ जायेगा देख लेगा तो।

सत्तू- तो कहां मिलेगी ऐसी मस्ती मेरी भाभी, कब मिलेगी, अपने देवर को ऐसे न तड़पाओ।

आज अपने सगे भाई के मुँह से ये सुनकर किरन मारे शर्म के लजा गयी, आंखों में देखने लगी, अपने भाई की मंशा वो जान चुकी थी की उसका भाई उसके साथ क्या करना चाहता है, चाहती तो वो भी यही थी पर सेफ जगह और बहुत तसल्ली से, जल्दबाजी में नही, इसलिए उसने धीरे से कहा- ऐसी मस्ती मेरे देवर को मेरे ससुराल में मिलेगी, वहां बहुत कम लोग हैं, केवल सास और ससुर बस, जानते तो हो ही न।

सत्तू- तो वहां ले चलूं मैं अपनी भाभी को, मौका निकाल के।

किरन धीरे से शर्माते हुए बोली- ह्म्म्म

किरन का ग्रीन सिग्नल पाकर सत्तू तो मानो सातवें आसमान में था, उसने अपने होंठ किरन के होंठों पर रख दिये, किरन की आंखें मस्ती में बंद हो गयी, दोनों बहन भाई, देवर भाभी बनकर एक दूसरे तो चूमने लगे, आज पहली बार सत्येन्द्र अपनी सगी बहन के होंठों को इस कदर चूम रहा था, किरन को भी विश्वास नही था कि सत्येन्द्र एकाएक अपने होंठ उसके होंठों पर रख देगा, पर इतना आनंद उसे आज तक नही मिला था, कुछ देर दोनों एक दूसरे को चूमते रहे, फिर किरन ने जैसे तैसे खुद को संभालते हुए धीरे से बोला- कोई आ जायेगा, अब जाने दे।

सत्तू- तुझे तेरी ससुराल ले चलूं, बहुत प्यास लगी है।

किरन ने फिर सत्तू की आंखों में देखा और शर्मा कर बोली- ले चल न।

सत्तू- तू ही कोई बहाना लगा न भाभी, मेरी शादी से पहले एक बार तेरी ससुराल चलते हैं।

किरन- सोचती हूँ कुछ....पर अब छोड़ न मुझे मेरे देवर जी....जाने दे कोई देख लेगा।

सत्तू ने किरन को छोड़ दिया किरन ने अपना सूट ठीक किया और सत्तू को देखते हुए मुस्कुरा कर बाहर चली गयी।

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सत्तू- तुझे तेरी ससुराल ले चलूं, बहुत प्यास लगी है।

किरन ने फिर सत्तू की आंखों में देखा और शर्मा कर बोली- ले चल न।

सत्तू- तू ही कोई बहाना लगा न भाभी, मेरी शादी से पहले एक बार तेरी ससुराल चलते हैं।

किरन- सोचती हूँ कुछ....पर अब छोड़ न मुझे मेरे देवर जी....जाने दे कोई देख लेगा।

सत्तू ने किरन को छोड़ दिया किरन ने अपना सूट ठीक किया और सत्तू को देखते हुए मुस्कुरा कर बाहर चली गयी।

भटकइया का फल | Bhatkaiya Ka Fal | Update 12

किरन के घर आने के बाद सत्येंद्र भी कुछ देर बाद घर आ गया, किरन तो मानो जैसे आज मिली खुशी को समेट ही नही पा रही थी, उसके चेहरे पर हल्की शर्म, लालिमा और नए अहसाह से उठ रही मुस्कुराहट साफ देखी जा सकती थी, जिसको वह छुपाने का भरकस प्रयास तो कर ही रही थी, पर जब जब सत्तू सामने आता तो उसे देखकर मुस्कुरा ही पड़ती।

सत्तू को तो दोगुनी उत्तेजना हो रही थी, अल्का ने तो उसे राखी बांधकर जो भाई बनाया था उसकी उत्तेजना परम आनंददायक तो थी ही और ऊपर से उसकी सगी बहन अब उसकी भाभी बन गयी थी।

यही सब सोचते हुए जैसे ही वो अपने घर में कमरे में गया, अल्का उसके पास आई और इधर उधर देखकर धीरे से बोली- भैया....ओ मेरे भैया जी।

सत्तू ने पलटकर जैसे ही देखा अल्का को खींचकर अपनी बाहों में भर लिया।

अल्का इधर उधर देखते हुए थोड़ा कसमसा कर बोली- कोई देख न ले भैया, थोड़ा सब्र रखो, दीदी बार बार घर के अंदर आ जा रही हैं, और अम्मा भी।

सत्तू ने सब अनसुना कर दिया और जल्दी से अल्का के रसभरे होंठों पर अपने होंठ रख दिये, अल्का की आँखें बंद हो गयी, उसने कुछ देर सत्येन्द्र को अपने होंठों का रस पिलाया, तभी किसी के आने की आहट हुई तो दोनों झट से अलग हो गए।

अल्का- देवर जी, अपने कपड़े दे दो क्या धोना है, मैं धोने जा रही थी कपड़े।

(अल्का ने एक आंख मारते हुए सत्तू से कहा)

सत्तू- हां भौजी ये लो, ये सब धो डालो।

(सत्तू ने कुछ कपड़े अल्का को देते हुए कहा)

तभी सत्तू की अम्मा घर में सामने जाते हुए दिखी, अल्का ने झट से सत्तू के कान हल्का सा पकड़े और बोली- अभी अम्मा देख लेती तो....थोड़ा सा भी सब्र नही है...मेरे भैया को।

सत्तू- कैसे सब्र होगा, जब इतनी रसीली बहन हो पास में।

अल्का शर्मा गयी, सत्तू के T Shirt का कॉलर पकड़ के बोली- इसको भी उतार के दो इसको भी धोना है।

सत्तू ने झट से अल्का के सामने ही पहनी हुई T Shirt उतार दी, अल्का ने सत्तू के ऊपरी नग्न बदन को मुस्कुराकर निहारते हुए वो T Shirt जैसे ही ली, उसकी जेब में रखा वो कर्म का कागज फर्श पर गिर पड़ा, ये कागज इस T Shirt में तब से पड़ा हुआ था जब सुखराम के यहां से आते वक्त सत्तू ने रास्ते में इसे पढ़ा और फिर इसको जेब में रख लिया था, तभी से ये जेब में पड़ा ही था, और इत्तेफ़ाक़ देखो न इसपर किसी की नज़र पड़ी और एक दो दिन में जो हुआ सत्तू उसमें इतना खो गया कि उसको अपने कर्म का ध्यान ही नही रहा, अब जब कागज T Shirt से निकलकर जमीन पर गिरा, तो सत्तू उसको देखकर चौंक गया, सत्तू के उठाने के पहले ही अल्का ने वो कागज उठा लिया, पर वो स्वयं ही सत्तू को देते हुए बोली- ये कैसा कागज है? देखो अभी कपड़ो के साथ धुल जाता न, क्या है ये?

सत्तू- है मेरी बहना कुछ बताऊंगा बाद में।

अल्का- ऐसा क्या है इसमें, बहुत पुराना सा कागज है ये।

सत्तू- अब तुम भी थोड़ा सब्र रखो मेरी बहना, बताऊंगा।

अल्का मुस्कुराती हुई कपड़े लेकर चली गयी, सत्तू का तो माथा ठनक गया, इतना लापरवाह वो कैसे हो सकता है, अगर ये कागज किसी और के हाँथ लग जाता तो। कागज में लिखी सारी बातें उसके दिमाग में घूम गयी, कर्म भी समय से पूरा करना था, घर की कोई भी स्त्री अब नही बची थी जो उस कर्म के दायरे में न आती हो, ये क्या इत्तेफ़ाक़ था, क्या ये होनी थी जो उसने उसकी सगी बहन को उसकी भाभी बनवा दिया, स्वयं उसके मुंह से, उस वक्त उसे न तो उस कागज का ध्यान था और न ही उसमें लिखे कर्म का, ये सब क्या हो रहा था, ये सब उसने भावनाओं में बहकर या न जाने क्या था उसमे बंधकर ये सब कर डाला, उसे खुद भी यकीन नही हो रहा था, पर इतना तो जरूर था कि कोई तो है जो उसका रास्ता बना रही है और ये कोई और नही "होनी" ही है।

सत्तू उस कर्म के बारे में सोचने लगा, उसको ये कर्म वक्त रहते पूरा भी करना था।

उस कागज को उसने फिर भी फाड़ा नही, अपने ही कमरे में छुपाकर रख दिया, ये सोचकर कि जब कर्म पूरा हो जाएगा तो इसको जला देगा।

दोपहर के वक्त सौम्या ने आवाज लगाई- अल्का...... किरन।

दोनों एक साथ- हाँ.... भौजी., हाँ.....दीदी

सौम्या- दोनों जा के खेत से शाम के लिए थोड़ा चार इकठ्ठा कर लो गायों और भैंसों को देने के लिए..... अब बाबू तो हैं नही और अम्मा भी व्यस्त हैं दूसरे काम में.....तुम दोनों ही चली जाओ।

सत्तू उस वक्त किसी काम से अपने मित्र के यहां गया हुआ था।

सत्तू जब आया तो देखा घर में केवल सौम्या भाभी ही थी।

सत्तू- भाभी मां, कहाँ गए हैं सब?

सौम्या- आ गए देवर जी....अल्का और किरन तो खेत में गए हैं और अम्मा पड़ोस में गयी हुई है किसी काम से।

सत्येंद्र सौम्या के कमरे में आ गया, उस वक्त वो नहा कर आई थी और आईने के सामने कंघी कर रही थी, महरूम रंग की साड़ी में सौम्या गज़ब ढा रही थी, जैसा नाम था उसका वैसी वो थी भी, गोरा गोरा भरा हुआ बदन, चौड़े नितंब, मोटे मोटे दोनों स्तन, अभी अभी बस नहा कर आई ही थी और श्रृंगारदान के सामने बैठकर गीले बालों को सुखा रही थी, गीले बालों से टपककर पानी सौम्या के ब्लॉउज को पीठ पर और साइड से हल्का हल्का भिगो चुका था, ब्लॉउज भीगने पर साइड से गोरी गोरी चूची हल्का हल्का ब्लॉउज के ऊपर से ही चमक रही थी, जिसपर सत्तू का ध्यान जाते ही वो कुछ देर वहां देखता रहा, सौम्या इस बात से बेखबर हाँथ उठा उठा कर कभी बालों को कंघी करती कभी थोड़ा झटक झटक कर बाल सुखाती, झटकने से मोटे मोटे दूध कलश और हिल जाते, जिसे देखकर सत्तू बेसुध सा हो रहा था, अपनी भाभी माँ को उसने पहले कभी ऐसे नही देखा था, पर इस कर्म ने तो उसका उसके घर ही सभी स्त्रियों के प्रति सोच ही बदलकर रख दिया था, जबकि उसकी खुद की शादी होने वाली थी, सब कुछ उसको मिलता, पर उसकी जो सोच अब बदल गयी थी वो उसके अधीन हो चुका था।

सत्तू ने सौम्या से पूछा- कब तक आएंगे सब भाभी माँ?

सौम्या ने कंघी करते हुए पलटकर सत्तू की ओर देखते हुए कहा- अभी अभी तो गए हैं, वक्त तो लग ही जायेगा आने में सब को......बैठ न खड़ा क्यों है....जब से आया है बस खड़ा खड़ा मुझे ही देखे जा रहा है, अपनी भाभी माँ को आज पहली बार देख रहा है क्या?

सत्तू पास में ही बेड पर बैठ जाता है- नही भाभी माँ, देख तो मैं आपको बचपन से रहा हूँ पर न जाने क्यों आज आपको बस देखने का मन किये जा रहा है।

सौम्या जोर से हंसते हुए बोली- अच्छा तो ये बात है....तो देख ले तू अपनी भाभी माँ को.....कहाँ भागी जा रही हूं मैं?....रुक पानी लाती हूँ तेरे लिए......कहाँ गया था तू?......मुझे बता कर जाया कर.....अम्मा भी पूछ रही थी?

सत्तू- अच्छा मेरी भाभी माँ..... अब से बिना आपको बताए मैं कहीं नही जाया करूँगा.....मैं जानता हूँ आप मेरी बहुत फिक्र करती हैं।

सौम्या कंघी करके उठी और सत्तू के बगल से जाते हुए उसके सर पर बालों को हल्का सा सहलाते हुए, ये बोलते हुए उसके लिए पानी लाने निकली की "ये हुई न मेरे देवर वाली बात"।

सत्तू पहले तो बेड के किनारे बैठा था पर फिर वो सिरहाने पर टेक लगा कर ठीक से दोनों पैर ऊपर करके बैठ गया।

सौम्या उसके लिए पानी लायी और उसके बगल में ही बेड पर बैठ गयी।

सत्तू- बच्चे कहाँ गए हैं?

सौम्या- किरन और अल्का के साथ खेत में गए हैं जिद करके......पर आज मेरे देवर जी ऐसे क्यों पूछ रहे हैं बार बार.....ह्म्म्म.....हम दोनों ही घर में हैं बाबा कोई नही है.....लो पानी पियो पहले।

सत्तू ने पानी पिया और सौम्या को देखने लगा।

सौम्या भी उसको देखते हुए बगल में बैठे बैठे हल्का हल्का उसके बालों पर हाँथ फेरती रही फिर बोली- कितना बड़ा हो गया न तू......शादी होने वाली है तेरी.....ये मेरा देवर देखते देखते कितनी जल्दी इतना बड़ा हो गया।

सत्तू थोड़ा उदास हो गया, सौम्या ने भांप लिया और बोली- क्या हुआ, चेहरे पर ये उदासी क्यों, तुम्हें तो खुश होना चाहिए, नई दुल्हनिया आने वाली है जीवन में.... ह्म्म्म

सत्तू- उदास न होऊं तो और क्या करूँ? इस जवानी ने मेरा बचपन तो छीन लिया न, मेरा वो हक़ तो छीन ही लिया न जब मैं बेधड़क अपनी भाभी माँ की गोद में समा जाता था, न किसी का डर होता था न किसी बात का संकोच, आखिर समय ने कुछ दिया है तो कुछ छीना भी तो है न, अगर पाने वाली चीज की खुशी से खोने वाली चीज का दुख कहीं ज्यादा गहरा हो तो पाने वाली चीज में वो सुख नही रह जाता..भाभी माँ, सोचो न एक वक्त वो होता था जब मैं निसंकोच आपकी गोदी में समा जाता था और आप मुझे प्यार कर लेती थी, पर आज....क्या मैं ऐसा कर सकता हूँ.....नही न.....क्या फायदा ऐसा बड़ा होने से जिसने मुझे मेरी भाभी माँ छीन ली।

ये सुनते ही सौम्या के आंसू छलक आते हैं, वो एक टक सत्तू की आंखों में देखने लगती है, सत्तू की आंखों में भी आंसू आ जाते हैं।

सौम्या झट से बेड पर चढ़कर सत्तू के बगल में बैठते हुए उसे गोदी में लेकर अपने गले से लगा लेती है, वो रुआँसी सी हो गयी थी, सत्तू की भी आँखे छलक आयी थी।

सौम्या- मुझे माफ़ करदे सत्तू......तू मुझे इतना miss करता है......मैं कितनी गंदी हूँ न....मैं अपने देवर को कैसे भूल सकती हूं.....तू चाहे कितना भी बड़ा हो जाये तू मेरा वही प्यारा सा सत्तू है, ऐसा नही है कि मैं तुझे याद नही करती या तुझे गोद में लेकर प्यार नही करना चाहती पर यही सोचकर रह जाती थी कि कोई देख न ले, कोई क्या सोचेगा, आज तुझे उदास देखकर मुझे खुद पर शर्म आ गयी कि मैं कैसे बदल सकती हूं, नही मेरे सत्तू मैं बदली नही हूँ मैं वही हूँ, वही तेरी सौम्या भाभी।

सत्तू ने सौम्या के गालों पर बहते आंसू को पोछा और बोला- मैं भी तो कितना गंदा हूँ न, देखो न कैसे मैंने अपनी प्यारी सी भाभी को रुला दिया।

सौम्या- नही सत्तू....तूने मुझे रुलाया नही है......बल्कि तूने तो भटकी हुई अपनी भाभी को दुबारा पा लिया है।

सत्तू- मैं तुम्हें कहीं खोने ही नही दूंगा.....तुम ही खो जाओगी तो मैं जीऊंगा कैसे?

सौम्या- मेरे बिना तू नही रह पाएगा....अगर मुझे कुछ हो गया तो....

सत्तू ने तुरंत सौम्या के लबों पर उंगली रखते हुए बोला- ये क्या बोले जा रही हो.....मर जाऊंगा मैं आपके बिना.....मेरी जीवनदायनी हो तुम, तुमने मुझे पाल पोषकर बड़ा किया है....आपके बिना मैं रह पाऊंगा क्या?.......आपको पता है पालने वाला जन्म देने वाले से भी कहीं बड़ा होता है।

ये सुनते ही सौम्या आत्मविभोर होकर सत्तू से लिपट जाती है, दोनों एक दूसरे को कस के बाहों में भर लेते हैं। सौम्या के एक बार फिर से आंसू छलक आते हैं वो बस सत्तू के कान में धीरे से बोलती है- मुझे माफ़ करदे सत्तू।

सत्तू- भाभी....मेरी भाभी माँ.... ये क्या बोल रही हो तुम.....अब ऐसा मत बोलना की "मुझे माफ़ कर दे" तुम्हारी कोई गलती थोड़ी है, तुम्हारी जगह कोई भी दुसरी औरत होती तो वो भी यही करती, अब इन प्यारी प्यारी आंखों से आंसू नही आने चाहिए, जिसने मुझे जीवन दिया उसकी आँखों में आंसू मैं बर्दाश्त नही कर सकता।

(सत्तू ने सौम्या के आंसू पोछते हुए कहा, दरअसल सौम्या बहुत मार्मिक हृदय की थी, झट से उसकी आँखों में आंसू आ जाते थे, अल्का की तरह वो बहुत चंचल और बातूनी नही थी, उसका स्वभाव अलग था, सुन्दरता में वो किसी भी तरह से किसी से भी कम नही थी, हाँ इतना जरूर था कि उसका बदन भरा हुआ था जो कि उसकी सुंदरता को और चार चांद लगा देता था)

सौम्या सत्तू को अच्छे से बाहों में लेकर बेड पर बैठ जाती है, सत्तू अब इस गमहीन माहौल को खुशनुमा बनाने के लिए ऐसी ऐसी बातें करने लगता है कि सौम्या खिलखिला कर हंस पड़ती है, सारा माहौल बदल जाता है, दोनों कभी हंसते, कभी एक दूसरे की आंखों में देखते, सौम्या बीच बीच में सत्तू को दुलारती, कभी उसके माथे को चूमती, कभी बालों में उंगलियां फेरती, बचपन की बहुत सारी बातें करते हुए सौम्या ने बीच में कहा- रुक बाहर का दरवाजा बंद करके आती हूँ, कहीं कोई आ न जाये।

सत्तू- खुला ही रहने दो न भाभी, बंद करके रखोगी तो किसी को भी शक होगा।

सौम्या ने सत्तू की को देखा और बोली- शक.....अगर होता भी है तो होने दो....अब नही सोचना मुझे इस बारे में कुछ भी। वैसे मैं बस हल्का सा दरवाजा सटा कर आती हूँ।

सत्तू- तुम रुको भाभी मैं करके आता हूँ।

सौम्या फिर बेड पर लेट ही गयी और सत्तू बाहर का गेट हल्का सा सटा कर आ गया, आकर देखा तो सौम्या बाल खुले करके बेड पर लेटी सत्तू को ही निहार नही थी, उसकी आँखों में देखता हुआ वो भी बेड पर उसकी बगल में लेट गया, सौम्या खुद ही और नज़दीक आ गयी और देखते ही देखते न जाने कब दोनों ने एक दूसरे को बाहों में भर लिया, अभी तक सौम्या को sensation नही हुआ था पर अब जैसे ही लेटकर सत्तू ने उसे बाहों में भरा उसे एक अजीब सा अहसाह हुआ, भले ही सत्तू को वो एक बेटे की तरह देखती आयी थी पर अब वो बड़ा हो चुका था, और काफी अरसे बाद ही इस तरह वो उसके साथ लेटी थी, चाहे जो भी हो था तो वो एक पुरुष ही, इससे पहले अभी कुछ देर पहले ही जब बैठकर वो उसे बाहों में लिए थी तब तक भी उसे ऐसी फीलिंग नही आई थी, पर जिस कदर वो लेटकर एक दूसरे में समाये थे वो केवल एक देवर भाभी का वात्सल्य प्रेम नही था उसमे कुछ मिक्स था जिससे अब उसका बदन सनसना गया था, जिस कदर सत्तू ने उसे आगोश में भरा था, वो कुछ अलग सा था, और इस अलग से अहसाह को महसूस करते ही सौम्या की लगभग एक साल से दबी हुई पुरूष स्पर्श की इच्छा जागृत हो उठी, दिल के किसी कोने में वो अपने बेटे जैसे सत्तू को एक पुरूष के रूप में स्वीकार करके हल्का लजा सी गयी, पर उसने जरा भी सत्तू को ये अहसाह नही होने दिया की उसके इस तरह स्पर्श से उसे कैसा महसूस हुआ है, अपना सिर उसने सत्तू के सीने में छुपा लिया।

सत्तू- भाभी जब मैं छोटा था तो ऐसे ही सोता था न आपके पास।

सौम्या मुस्कुराते हुए- नही ऐसे तो नही सोते थे।

सौम्या कहकर हंसने लगी

सत्तू- क्या? ऐसे नही सोता था.....क्या भाभी ऐसे ही तो सोता था।

सौम्या- ऐसे नही एक बच्चे की तरह सोते थे......समझे।

सत्तू- तो क्या अब बच्चे की तरह नही सो रहा हूँ?

सौम्या हल्का सा शर्मा कर- नही......जी बिल्कुल नही......ऐसे सो रहे हो जैसे कोई मर्द अपनी.......

कहते हुए सौम्या शर्मा कर उसके सीने में छुप सी गयी।

सत्तू को को मन ही मन बहुत खुशी हो रही थी।

सत्तू- जैसे कोई मर्द.....आगे....मैं समझ नही भाभी....बता तो दो।

सौम्या ने सिर उठा के सत्तू को देखा फिर बोली- जैसे कोई मर्द अपनी बीवी के साथ सोता है.....जब तू छोटा था तो ऐसे थोड़ी सोता था।

सत्तू- भाभी.....अब जहां तक मुझे याद है मैं तो आपसे ऐसे ही लिपट कर सोता था।

सौम्या- हाँ पर अब वो छोटा बच्चा अब बच्चा थोड़ी न रहा।

सत्तू- तो अजीब लग रहा है मेरी भाभी माँ को।

सौम्या का चेहरा अब शर्म से लाल हो गया वो सत्तू के सीने में फिर दुबक गयी।

सत्तू- पता है भाभी माँ कैसी लग रही हो।

सौम्या धीरे से- कैसी?

सत्तू- जैसे कि मेरी बच्ची हो तुम, एक छोटी सी बच्ची की तरह कैसे दुबकी हुई हो।

सौम्या मंद मंद मुस्कुरा उठी फिर बोली- हाँ तो अभी तक तुम मेरे बेटे जैसे, मेरे बच्चे जैसे थे और....लो अब मैं भी तुम्हारी बच्ची बन जाती हूँ।

सत्तू- हां क्यों नही.....जब आपने मुझे बचपन से अपना बच्चा बना के प्यार दिया है तो मैं भी अब अपनी भाभी माँ को अपनी बच्ची की तरह प्यार दूंगा।

सौम्या फिर हंस पड़ी- मैं बच्ची हूँ तुम्हारी।

ऐसा कहकर सौम्या हँसते हुए सत्तू को देखने लगी

सत्तू- क्यों नही........(कुछ देर एक दूसरे को देखने के बाद सत्तू फिर धीरे से बोला)......मेरी बच्ची।

सौम्या- धत्त.....कैसा लग रहा है......बहुत अजीब लग रहा है ऐसे न बोल।

सत्तू अब कहाँ चुप होने वाला था, उसने धीरे धीरे कई बार सौम्या के कानों में "मेरी बच्ची", "मेरा बच्चा" "मेरा शोना" बोलता रहा और हर बार सौम्या कभी खिलखिलाकर हंस देती, कभी आंख बंद कर एक अजीब से रोमांच को महसूस करती, कभी सत्तू के सीने में प्यार से मुक्का मारती, बार बार शर्माकर यही बोलती की "तेरी बच्ची हूँ मैं.....बहुत अजीब सा लग रहा है।"

जब काफी देर से सत्तू सौम्या को बार बार "मेरी बच्ची" बोलता रहा तो सौम्या ने साड़ी का पल्लू उठा के चेहरा ढंक लिया और बोली- जा मैं नही सुनती।

सत्तू- नही सुनने के लिए कान ढका जाता है, न कि चेहरा।

सौम्या फिर हंस पड़ी और झट से अब खुद ही बोल पड़ी- अच्छा मेरे बाबू जी....मुझे नही पता था।

सत्तू उसे देखने लगा फिर बोला- मैं बाबू जी हूँ तुम्हारा?

सौम्या अब थोड़ा शरारत से- क्यों नही, जब मैं तुम्हारी बच्ची हुई, तो हुए न तुम मेरे बाबू जी....अब मैं भी बाबू बोलूंगी...... बहुत देर से बच्ची बच्ची बोले जा रहे हो।

सत्तू ने फिर कह दिया- मेरी बच्ची

सौम्या शर्माकर- मेरे बाबू जी

सत्तू- मेरी प्यारी बच्ची

सौम्या हंसते हुए- मेरे प्यारे बाबू जी

(दोनों एक दूसरे की आंखों में देखते हुए कई बार ऐसे बोलते रहे, पर सौम्या का बदन अंदर से हर बार गनगना जा रहा था, वो शर्म से दोहरी भी होती जा रही थी और बराबर साथ भी दे रही थी)

तभी सत्तू बोला- कौन से बाबू?

सौम्या ने सवालिया निगाहों से सत्तू को देखा और बोली- मतलब

सत्तू- बाबू जी तो दो हुए न, एक पिता और एक ससुर जी.....तो मैं कौन सा?

सौम्या ने एक मुक्का सत्तू के सीने में मारा- जैसी मैं बच्ची वैसे मेरे बाबू जी.....और क्या?

सत्तू- पर सबसे ज्यादा मजा किसमे आ रहा है...... मेरी बच्ची

सौम्या अब काफी खुल सी गयी थी उसने झट से सत्तू के गाल पर चिकोटी काटी और बोली- जिसमे मेरे बाबू जी को मजा आ रहा होगा उसमे ही मुझे भी आएगा।

(सौम्या शर्माते हुए धीरे धीरे खुलती जा रही थी)

सत्तू- पर मन तो कह रहा है कि एक बार चेक करूँ।

सौम्या मुस्कुराते हुए सत्तू की आंखों में देखती रही, दोनों ने एक दूसरे को बाहों में कसा हुआ था, सौम्या धीमी आवाज में बोली- तो कर लो चेक।

(सौम्या की आवाज अब थोड़ी भारी सी होने लगी थी)

सत्तू जो सौम्या के दाईं तरह लेटा हुआ था वो उसके ऊपर धीरे से चढ़ने लगा, सौम्या उसकी मंशा समझ वासना से भर गई, उसकी सांसें धीरे धीरे तेज होने लगी, झट से उसने साड़ी का पल्लू अपने चेहरे पर डाल लिया, शर्म से वो अब पानी पानी हुई जा रही थी, पर न जाने क्यों वो सत्तू को रोक न सकी, आंखें बंद किये बस वो उसे अपने ऊपर चढ़ाती गयी और सत्तू धीरे धीरे अपनी भाभी माँ के ऊपर चढ़ता गया, कुछ ही पलों में वो सौम्या के ऊपर चढ़ चुका था, मस्ती और वासना में वो सुध बुध खो बैठी थी, जैसे ही सत्तू सौम्या के ऊपर पूरी तरह चढ़ा उसने पीठ के नीचे हाँथ ले जाकर सौम्या को कस के बाहों में भर लिया, और अब जो सौम्या के मुँह से आवाज निकली वो एक मादक सिसकारी थी, जिसको दोनों ही अच्छे से समझ
चुके थे कि ये मादक सिसकारी कब और क्यों निकलती है और इसका मतलब क्या होता है।

सौम्या मदहोशी में खोई हुई थी सत्तू ने पीठ के नीचे से दोनों हाँथ निकालकर सौम्या के पैरों को पकड़ा और जैसे ही हल्का सा फैलाने की कोशिश की सौम्या ने खुद ही अपने दोनों पैर फैलाकर उसकी कमर में लपेट दिए, दोनों ही अब एक दूसरे की मंशा जान चुके थे, दोनों की ही सांसें तेज चलने लगी।

सौम्या का गदराया भरपूर बदन सत्तू के नीचे दबा हुआ था, पैर कमर पर लिपटे होने की वजह से साड़ी घुटनों के ऊपर तक उठ गई थी जिससे सौम्या के नंगे गोरे गोरे पैर दिन की रोशनी में चमक उठे।

सत्तू को अब पूर्ण विश्वास हो चुका था कि सौम्या के मन में भी क्या है, और उसे ये सब अच्छा लग रहा है, उसने अपनी भाभी के मन को टटोलने के लिए, की उसे कौन से बाबू सोच कर ज्यादा उत्तेजना हो रही है, धीरे से उसके कान में कहा- मेरी बच्ची...मेरी बहू

सौम्या ये सुनते ही गनगना सी गयी, सत्तू ने कई बार उसे बहू कहकर बुलाया, हर बार सौम्या हल्का सा गनगना जाती और कस के सत्तू को भींच लेती, पर कुछ देर बाद जैसे ही सत्तू ने उसके कान में फिर धीरे से बोला- मेरी बच्ची मेरी बेटी

सौम्या के मुँह से सिसकी फुट पड़ी, सत्तू ने फिर एक दो बार सौम्या के कान में "मेरी बेटी", "मेरी बिटिया" बोला और हर बार सौम्या सिसकते हुए कराह उठी। सत्तू का लंड खड़ा होकर लोहे की तरह हो गया, जो कि सौम्या की जाँघों के बीच चुभता हुआ उसे बखूबी महसूस होने लगा, जिससे अब सौम्या का बुरा हाल होने लगा, आज जीवन में पहली बार वो सत्तू का लंड महसूस कर रही थी, उस सत्तू का जो उसके बेटे के समान था, जिसको उसने कभी अपनी गोद मे खिलाया था, कभी कभी वो जब छोटा था तो वो उसके सारे कपड़े उतार के मालिश कर दिया करती थी उस वक्त का उसका छोटा सा नुन्नू आज कितना बड़ा और मोटा सा तना हुआ उसे साड़ी के ऊपर से अपनी बूर पर चुभता हुआ महसूस हो रहा था, जिसको महसूस कर वो खुद को मदहोश होने से नही रोक पा रही थी।

ऊपर से सत्तू ने जो उसे बेटी कहकर बुलाया तो एक अजीब सी गुदगुदी उसके पूरे बदन में दौड़ गयी।

सत्तू बार बार उसे मेरी बेटी, मेरी बिटिया रानी कहकर बुला रहा था, जब उससे रहा नही गया तो उसने भी धीरे से सिसकते हुए बोल ही दिया- पिताजी......मेरे पापा

सत्तू की सिसकी निकल गयी, (उसे विश्वास नही हुआ कि उसकी सौम्या भाभी "बाप बेटी के बीच" सोचकर वासना में डूबती हैं) वो फिर बोला- बेटी...मेरी बेटी

सौम्या मदहोशी में- पापा..... मेरे पापा

सत्तू- तू मेरी बेटी है न

सौम्या- आआह!.....हां.... मैं आपकी बेटी हूँ... आपकी बिटिया रानी.....मुझे अपनी बेटी बना ले सत्तू

सत्तू से अब रहा नही गया, वो समझ गया कि उसकी भाभी को कहां बहुत मजा आ रहा है, उसने अब अपने लंड से सौम्या की बूर पर सूखे सूखे हल्के हल्के धक्के मारने लगा, सौम्या बेहद शर्माते हुए सत्तू के गाल पर हल्का सा काट बैठी, उसके मुंह से हल्की हल्की सिसकारी फूटने लगी, सत्तू ने साड़ी के ऊपर से ही अपनी भाभी माँ की बूर पर लंड रगड़ते हुए फिर धीरे से बोला- मेरी बेटी

सौम्या फिर सिसकते हुए बोल पड़ी- आआह पापा..... मेरे प्यारे पापा...... करो न

"करो न" शब्द सुनकर सत्तू मानो पागल सा हो गया, उसे विश्वास नही हुआ कि आज उसकी वो भाभी जो उसकी माँ समान थी, इतनी मदहोश हो जाएगी कि वो इस कदर बोल पड़ेगी की "करो न"।

सत्तू धीरे से बोला- क्या करूँ मेरी बिटिया

सौम्या- अपनी बिटिया को प्यार...प्यार करो न पापा।

सत्तू बहुत शातिर था, वो इससे आगे नही बढ़ना चाहता था, वो तो बस अपनी भाभी माँ की दबी हुई कामेच्छा को जगाना चाहता था, इसलिए आज वो सौम्या को यहां तक ले आया था, और सच तो ये है कि सौम्या के मन में भी ये कहीं न कहीं था, तभी दोनों यहां तक आ पाए थे।

सत्तू- अब तुम मेरी बेटी बन गयी हो तो मैं अपनी बेटी को तसल्ली से प्यार करना चाहूंगा, जब किसी के आने का कोई डर न हो, थोड़ा सब्र रखोगी मेरी बेटी।

सौम्या ने आंखें खोलकर सत्तू को वासना भरी आंखों से देखा, और फिर शर्मा कर बोली- मैं इंतज़ार करूँगी।

सौम्या की कामेच्छा जाग चुकी थी। सत्तू ने अब कुछ ऐसा किया कि सौम्या हल्का सा चिहुँक सी गयी पूरा कमरा सिसकारी से गूंज उठा, सत्तू ने अपने दाएं हाँथ से सौम्या की बूर को साड़ी के ऊपर से ही मुठ्ठी में भरकर हल्का सा भींच दिया, सौम्या सिसक पड़ी और धीरे से खुद ही बोली- पापा बस

तभी बाहर किसी की आहट की आवाज हुई और दोनों बेमन से झट से फटाफट अलग हुए, सौम्या ने जल्दी से अपनी साड़ी को ठीक किया और सत्तू अपना खड़ा लंड ठीक करता हुआ चुपके से कमरे से निकलकर अपने कमरे में जाकर आंख बंद करके लेट गया, जैसे मानो वो काफी देर से सो रहा हो।

To be Continued

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Satish Kumar
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@jangali badhiya update.. 

Nayee Tarah Ki Kahani Hai, Mast Theame..

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Jangali
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सौम्या ने आंखें खोलकर सत्तू को वासना भरी आंखों से देखा, और फिर शर्मा कर बोली- मैं इंतज़ार करूँगी।

सौम्या की कामेच्छा जाग चुकी थी। सत्तू ने अब कुछ ऐसा किया कि सौम्या हल्का सा चिहुँक सी गयी पूरा कमरा सिसकारी से गूंज उठा, सत्तू ने अपने दाएं हाँथ से सौम्या की बूर को साड़ी के ऊपर से ही मुठ्ठी में भरकर हल्का सा भींच दिया, सौम्या सिसक पड़ी और धीरे से खुद ही बोली- पापा बस

तभी बाहर किसी की आहट की आवाज हुई और दोनों बेमन से झट से फटाफट अलग हुए, सौम्या ने जल्दी से अपनी साड़ी को ठीक किया और सत्तू अपना खड़ा लंड ठीक करता हुआ चुपके से कमरे से निकलकर अपने कमरे में जाकर आंख बंद करके लेट गया, जैसे मानो वो काफी देर से सो रहा हो।

भटकइया का फल | Bhatkaiya Ka Fal | Update 13

सत्तू कुछ देर तक आंख बंद किये लेटा रहा, बाहर उसकी अम्मा आ चुकी थी, उसका मन नही लग रहा था, वो बस यही सोचे जा रहा था कि भाभी माँ की fantasy बाप बेटी में है, वो कितनी छुपी रुस्तम निकली, बचपन से लेकर वो उनके साथ है पर कभी जाहिर नही हुआ, कितनी शांत और भोली भाली सी दिखने वाली मेरी भाभी माँ को इस रिश्ते में पागलपन का मजा आता है, कितना मजा आने वाला है अब तो, मुझे अपनी भाभी माँ को उनकी इच्छा के अनुसार पूरा सुख देना चाहिए, हर इंसान की अपनी अलग अलग fantasy होती है, जब मेरी प्यारी भाभी माँ ने मुझे बचपन से इतना प्यार दिया है तो मैं भी अपनी भाभी माँ को उनकी इच्छा के अनुसार हर सुख दूंगा, अच्छा ही हुआ जो आज मुझे उनकी fantasy पता चल गई, आज एक ही दिन में वो मेरे से कितना खुल गयी, यही सब सोचता हुआ सत्तू बेचैन हो उठा, उसका दुबारा मन होने लगा कि वो अपनी भाभी माँ के पास जाए।

उससे रहा नही गया उसने झट से उठकर मेन गेट से बाहर देखा तो उनकी अम्मा आ तो गयी थी पर वो कुएं के पास सफाई करने चली गयी थी, वो समझ गया कि अम्मा अभी घर में नही आएंगी, वो तुरंत फिर से सौम्या के कमरे में गया, उस वक्त सौम्या बेड के पास खड़े होकर बेडशीट ठीक कर रही थी। सत्तू ने सौम्या को पीछे से बाहों में भर लिया, एक पल के लिए तो सौम्या चौंक सी गयी पर जैसे ही उसने सर घुमा कर सत्तू को देखा, आंखों में नशा और चेहरे पर मुस्कुराहट आ गयी।

जितनी बेचैनी से सत्तू ने सौम्या को कस के पीछे से बाहों में भरा सौम्या ने उतनी ही बेचैनी से अपना बदन सत्तू से सटा दिया, अपनी भाभी की इस अदा पर सत्तू कायल हो गया, उसका लंड लोहे की भांति सख्त होकर सौम्या की भारी भरकम चौड़ी गांड में धंस गया, अपने सत्तू के मोटे कड़क लड़ की छुवन से सौम्या की सिसकी फूट पड़ी और उसने खुद को सत्तू की बाहों में ढीला छोड़ दिया, अभी तक दोनों ने एक दूसरे को kiss नही किया था, वो कहते हैं न कि जब खूब सारी मिठाई एक साथ सामने आ जाये तो समझ नही आता कि कौन सी पहले खाऊं कौन सी बाद में वही हाल दोनों का हो चुका था।

सत्तू ने एक हाँथ सौम्या की नाभि के थोड़ा नीचे ले जाकर, सौम्या को अपने से और सटाते हुए खुलकर अपने लंड को उसकी गांड की दरार में साड़ी के ऊपर से ही ऐसे भिड़ाया जैसे कोई सांड लंड निकाले गाय के ऊपर चढ़कर हल्का सा थरथराते हुए उसकी बूर का छेद तुक्के में ढूंढता है, सत्तू ने खुलकर दो तीन बार अपनी कमर को नीचे ले जा कर कस कस के सौम्या की गांड में जब अपना खड़ा लंड रगड़ा, तो सौम्या से भी रहा नही गया, उसने भी शर्माते हुए ताल से ताल मिलाया पर कुछ देर में ही हल्का हल्का सिसकते हुए तेजी से पलटी और कस के सत्तू से शर्माते हुए सीधी होकर लिपट गयी, सत्तू ने सौम्या की पीठ, कमर को सहलाते हुए जैसे ही चौड़ी गांड के दोनों पाटों को अपने हाँथ में लेकर भींचा, भारी आवाज में सौम्या सिसकते हुए बोली- रहा नही जा रहा क्या मेरे सत्तू से अब?

सत्तू- नही भाभी माँ.... बहुत मन कर रहा है, हम कितने खुल गए न आज, मुझे ऐसा लग रहा है जैसे ये सब सपना है।

सौम्या की बूर पनिया गयी थी, बड़ी मादकता से उसने बोला- कभी मैंने सपने में भी नही सोचा था कि मेरा सत्तू मुझे ऐसे प्यार करेगा, मेरा अपना सत्तू जिसको मैंने पाल पोश के बड़ा किया है वो मुझे मर्द वाला प्यार देगा, मेरा वो सत्तू जिसकी मैं बचपन में मालिश करती थी और कभी कभी उसके छोटे से नुन्नू की भी तेल से मालिश कर दिया करती थी आज वही नुन्नू इतना बड़ा हो गया है, मेरा सत्तू कितना बड़ा हो गया है, मुझे अपने सत्तू से ही मर्द वाला प्यार मिलेगा, इस बात पर तो मैं भी यकीन नही कर पा रही हूं।

सत्तू- क्यों नही प्यार दूंगा मैं अपनी भाभी माँ को, मेरी जीवनदायनी हो तुम, कितना प्यार दिया है तुमने मुझे हमेशा, अपनी प्यारी भाभी माँ को मैं हर तरह से उसकी इच्छा के अनुसार प्यार दूंगा।

सौम्या सिसकते हुए सत्तू के गालों को चूम लिया और धीरे से बोली- पर कभी वक्त बहुत कम है अम्मा भी आ गयी हैं न।

सत्तू- आ तो गयी हैं पर अभी कुएं पर कुछ कर रही हैं, शायद उन्हें वक्त लगेगा।

कहते हुए सत्तू सौम्या के गालों को चूमता हुआ कान के नीचे और गर्दन पर ताबड़तोड़ चूमने लगा, सौम्या हल्का हल्का सिसकते हुए बोली- पर रुक सत्तू, अभी बहुत रिस्क है...मान जा न.....सब आने ही वाले है....आआआआहहह हहह.....बस कर......मैं बेकाबू हो रही हूं।

सत्तू रुक गया और सौम्या की आंखों में देखता हुआ बोला- हमारा रिश्ता बदल गया क्या भाभी?

सौम्या समझ गयी और मुस्कुरा कर बोली- पापा जी....अब रुक जाइये न, कोई देख लेगा।

सत्तू- ओह!....मेरी बेटी.....रहा नही जाता अब।

सौम्या- सह लीजिए न पापा जी थोड़ी सी दूरी...आपकी बेटी आपको सब कुछ देगी फिर.....

यह कहकर सौम्या जोर से सिसक उठी और सत्तू ने कस के उसे और भी अपने से सटा कर उसके गुदाज नितम्बों को भींच दिया।

सौम्या हल्का सा कराह उठी

सत्तू- सब कुछ देगी मेरी बेटी मुझको।

सौम्या- हाँ पापा जी.....सब कुछ.....आआआआह

सत्तू- वो भी

सौम्या- हाँ वो भी पापा जी......वो भी.....खूब चख लेना अपनी बेटी की....जैसा आपका मन करे....वैसे खा लेना उसको.......पर अभी थोड़ा सब्र मेरे पापा जी.....आराम से खाना उसको, बहुत आराम से खाने वाली चीज होती है वो।

सत्तू की आआह निकल गयी सौम्या के मुंह से ये सुनकर।

सत्तू- उसको क्या बोलते हैं... मेरी बिटिया....उसका नाम क्या है?

सौम्या धीरे से सिसकते हुए बोली- करते वक्त बताऊंगी पापा जी..... जब हम दोनों करेंगे तब बताऊंगी......जब आप अपनी बेटी की दोनों जाँघों के बीच की उस चीज़ को प्यार से खा रहे होगे न तब मैं उसका नाम बताऊंगी अपने पापा को।

सत्तू फिर से सनसना गया, खुद सौम्या भी ऐसा बोलते हुए बहुत उत्तेजित होती जा रही थी, सत्तू बार बार तेजी से अपने लंड से सौम्या की पनियायी बूर पर साड़ी के ऊपर से ही धक्का मार रहा था जिससे सौम्या मदहोश हो जा रही थी, उससे खड़ा नही रहा जा रहा था मन तो कर रहा था कि बिस्तर पर लेट जाऊं, पर वो अभी चाह कर भी बहुत आगे नही बढ़ना चाहती थी।

तभी न जाने कैसे सौम्या की नज़र खिड़की से बाहर गयी और उसने अम्मा को घर की तरह आते देखा - अम्मा इधर ही आ रही हैं अब।

सत्तू ने अपनी भाभी के गालों पर प्यार से चूमते हुए उन्हें छोड़ दिया और भारी सांसों से जल्दी से सौम्या के कमरे से निकल गया, सौम्या ने भी जल्दी से खुद को संभाला और वहीं बेड पर लेट गयी, सत्तू अपने कमरे में आकर दुबारा बेड पर लेट गया।

To be Continued

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