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Incest पुरानी किताब by S Kumar

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Jangali
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एक बार मस्तराम की किताब मेरे एक दोस्त ने चुपके से क्या पढ़ा दी पढ़ाई में तो अब मन लगता ही नही था, जब देखो तब मन अश्लील साहित्य, गंदी कहानियां, अश्लील चुटकुले एवं कविताएं खोजता रहता था, इंटरनेट का चलन उस वक्त था नही, किसी तरह डर डर के जुगाड़ करके ये सब चीज़ें खरीदकर, मांगकर इकट्ठी करते, पढ़ते और वासना की दुनिया में डूब जाते।

 

मैं घर से दूर बनारस में रहकर पढ़ाई कर रहा था, अरविंद नाम है मेरा, जब घर से यहां आया था तो ऐसा नही था, बस दोस्तो की संगत का असर था, पर अब तो जैसे इनसब चीजों की आदत पड़ गयी थी, कुछ दिन तक कुछ नया न मिले तो मन बेचैन होने लगता था, आजतक हकीकत में स्त्री की योनि सिर्फ एक दो बार दोस्तों द्वारा छुप छुप कर लाये गए ब्लू फिल्म में ही देखी थी, मन बहुत करता था हकीकत में योनि छूने और भोगने के, पर रिस्क लेने की हिम्मत अभी तक नही आई थी, इतना जरूर था कि मस्तराम की किताबें पढ़कर नीयत घर की औरतों के प्रति बदल गयी थी, कभी कभी सोचता तो बहुत उत्तेजित हो जाता पर अगले ही पल ग्लानि से भर भी जाता था। पर मन नही मानता था वो तो कभी कभी ग्लानि से ऊपर उठकर सोचने लगता था कि घर में ही मिल जाए तो कितना मजा आ जाए, पर ये असंभव चीज़ थी, इसलिए बस ये सिर्फ कल्पना में ही थी और हाथ का ही सहारा था।

 

साल में दो बार मैं घर जाता था, एक गर्मियों की छुट्टी में दूसरा शर्दियों मे छुट्टी लेकर, घर में सिर्फ माँ और दादा दादी थे, पिताजी दुबई में रहते थे साल में एक बार बस एक महीने के लिए आते थे, माँ खेती बारी, घर को और दादा दादी को संभालती थी, अपने नाम "अर्चना" की तरह वो प्यारी तो थी ही साथ ही साथ सबका ख्याल रखने वाली भी थी, खेतों में काम करके भी उनके गोरे रंग पे ज्यादा कोई फर्क नही पड़ा था, वो बहुत ज्यादा सुंदर तो नही थी पर किसी से कम भी नही थी, शरीर भरा हुआ था, लगभग सारा दिन काम करने से अनावश्यक चर्बी शरीर पर नही थी, उनके शरीर को कभी वासना की नज़र से न देखने पर उनका सही फिगर तो नही बता सकता पर अंदाज़े से कहा जाए तो 34-32-36 तो था ही।

 

इस बार सर्दियों में जब घर आया तो आदत के अनुसार अब अश्लील साहित्य पढ़ने का मन हुआ, जल्दबाजी में खरीदकर लाना भूल गया, जो पड़ी थी वो सब पढ़ी हुई थी, अब यहां गांव में मिले कहाँ, किसके पास जाऊं, कहाँ मिलेगी? डरते डरते एक दो पुरानी बुक स्टाल पर पूछा तो उन्होंने मुझे अजीब नज़रों से देखा फिर मेरी हिम्मत ही नही हुई, गांव की दुकानें थी यही कहीं आते जाते किसी दुकानदार ने अगर गाँव के किसी आदमी से जिक्र कर दिया तो शर्मिंदा होना पड़ेगा, इसलिए कुछ दिन मन मारकर बिता दिए पर मन बहुत बेचैन हो उठा था।

 

एक दिन मां ने मुझसे कहा कि कच्चे मकान में पीछे वाले कमरे के ऊपर बने कोठे पर पुरानी मटकी में गुड़ का राब भरके रखा है जरा उसको उतार दे (राब - गन्ने के रस का शहद के समान गाढ़ा रूप, जो गन्ने से गुड़ बनाते वक्त गाढ़े उबलते हुए गन्ने के रस को अलग से निकाल कर खाने के लिए रख लिया जाता है, इसको गुड़ का पिघला हुआ रूप कह सकते हो)

 

मैंने सीढ़ी लगाई और कोठे पर चढ़ गया, वहां अंधेरा था बस एक छोटे से झरोखे से हल्की रोशनी आ रही थी, टार्च मैं लेकर आया था, टॉर्च जला कर देखा तो मटकी में रखा राब दिख गया, पर मुझे वहां बहुत सी पुरानी किताबों का गट्ठर भी दिखा, मैंने वो राब की मटकी नीचे खड़ी अपनी माँ को सीढ़ी पर थोड़ा नीचे उतरकर पकड़ाया और बोला- अम्मा यहां कोठे पर किताबें कैसी पड़ी हैं?

 

मां- वो तो बहुत पुरानी है हमारे जमाने की, इधर उधर फेंकी रहती थी तो मैंने बहुत पहले सारी इकट्ठी करके यहीं रख दी थी, तेरे कुछ काम की हैं तो देख ले।

 

ये कहकर मां चली गयी तो मैं फिर कोठे पर चढ़कर अंधेरे में रखा वो किताबों का गट्ठर लेकर छोटे से झरोखे के पास बैठ गया, उसमे कई तरह की पुरानी कॉपियां और किताबें थी, पुराने जमाने की कजरी, लोकगीत और घर का वैध, घरेलू नुस्खे, मैं सारी किताबों को उलट पुलट कर देखता जा रहा था कि अचानक मेरे हाँथ में जो किताब आयी उसके कवर पेज पर लिखा था - "कोकशास्त्र", ये देखकर मेरी आँखें चमक गयी, कोकशास्त्र के बारे में मैं जानता था, इसमें काम क्रीड़ा के विषय में बताया गया होता है और उत्तेजना ये सोचकर हो रही थी कि ये पुरानी किताब है तो मतलब जरूर ये मेरे अम्मा बाबू के शादी के वक्त की होगी, बाबू ने खरीदी होगी, शायद अम्मा को ये याद नही रहा होगा कि ऐसी किताब भी इस गट्ठर में है और उन्होंने मुझे ये किताबों का पुराना गठ्ठर देख लेने को बोल दिया।

 

जैसे ही मैंने उस किताब के बीच के कुछ पन्नों को खोला तो आश्चर्य से मेरी आँखें और खुल गयी और मैंने किताब को झरोखे के और नजदीक ले जाकर ध्यान से देखा तो वो गंदी कहानियों की किताब थी जिसपर बाद में कोकशास्त्र का कवर अलग से चिपकाया गया था, मेरी बांछे खिल गयी, मारे उत्तेजना के मै

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Jangali
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न वो अपने आप को मुझसे छुड़ा रही थी न ही आगे बढ़ने दे रही थी, मेरे को बहुत अजीब सी उत्तेजना हो रही थी और साथ ही साथ वासना से मैं भर उठा था, मेरा लंड तनकर उनकी गुदाज गाँड़ की दरार में साड़ी के ऊपर से ही ठोकर मारने लगा जिसे वो अच्छे से महसूस कर चुकी थी, न चाहते हुए भी उनके मुंह से हल्की सी आह निकली, और वो बोली- ये पाप है….मत कर…..कोई आ जायेगा।

 

मैं- आह….अम्मा…….बस एक बार

 

बस मैंने इतना ही बोला और उनको और मजबूती से पकड़कर अपनी बाहों में भरते हुए अपने लंड को जानबूझकर उन्हें महसूस कराते हुए उनकी मखमली गाँड़ में तेजी से दबा दिया जिससे उनकी हल्की सी सिसकी निकल गयी। मैंने जैसे ही उनकी ब्लॉउज में कैद नंगी पीठ को चूमा, मैं वासना की दूसरी ही दुनियां में पहुंच गया, इतनी उत्तेजना मुझे कभी नही हुई थी, जितनी आज अपनी सगी माँ के साथ करने में हो रही थी, मैं धीरे धीरे उनकी पीठ और गले पर कई जगह चूमा, हर बार वो अपना चेहरा अपने हांथों में छुपाए सिसक जा रही थी, इतना तो था कि वो भी ये सब करना चाहती थी नही तो अभी तक वो मेरे गाल पे थप्पड़ मारकर मुझे अच्छे से पीट चुकी होती, पर न तो वो मुझे अपने से हटा रही थी और न ही अच्छे से आगे बढ़ने दे रही थी, बस इतने से ने ही मुझे इतना उत्तेजित कर दिया कि अब मुझसे रहा नही गया और मैंने पूरा जोर लगा कर उनको सीधा करके अपनी बाहों में भर लिया, उन्होंने अब भी अपना चेहरा अपने हांथों से ढका हुआ था जिसकी वजह से उनकी मोटी गुदाज चूचीयाँ मेरे सीने से सट नही पा रही थी, मैंने उनको बक्से से सटा दिया और साड़ी के ऊपर से ही थोड़ा बेशर्म होकर उनकी बूर पर अपने टंटनाये हुए लंड से चार पाँच सूखे धक्के मारे तो वो तेजी से सिसक उठी, मैंने फिर जैसे ही अपना हाँथ नीचे उनकी बूर को मुट्ठी में भरने के लिए ले गया उन्होंने झट से मेरा हाँथ पकड़ लिया और मुझे मौका मिल गया मैंने जैसे ही अपने होंठ उनके होंठ पर रखने चाहे उन्होंने एक हाँथ से अपने होंठ ढक लिए और मेरी आँखों में देखने लगी, मैं चाहता तो जबरदस्ती कर सकता था पर ये गलत हो जाता, मैं अपनी माँ का दिल नही तोड़ना चाहता था इसलिए उनकी आंखों में बड़ी हसरत से देखने लगा।

 

मेरा लंड सीधा तन्नाया हुआ उनकी बूर पर साड़ी के ऊपर से ही भिड़ा हुआ था, मैं उन्हें और वो मुझे कुछ देर ऐसे ही देखते रहे, फिर वो उत्तेजना में भारी आवाज में धीरे से बोली- ये पाप है अरविंद।

 

मैं- मैं नही जानता…..मुझे चाहिए

 

माँ- तेरे बाबू को बता दूंगी

 

मैं- बता देना…...पर एक बार…..बस एक बार करने दो अम्मा

 

ऐसा कहते हुए मैंने अपने लंड को उनकी बूर पर फिर ऊपर से दबाया तो वो फिर सिसक उठी।

 

माँ- कोई आ जायेगा अभी जा यहां से नही तो सच में मैं तेरे बाबा को बुला के तेरी करतूत बता दूंगी।

 

मैं- सच में…..बता दोगी?

 

माँ चुप हो गयी और फिर मुझे देखने लगी, मैंने नीचे अपने हाँथ को उनके हाँथ से छुड़ाया और अब उनके हाँथ को पकड़कर अपने तने हुए लंड पर जैसे ही रखा तो उन्होंने झट से अपना हाँथ हटा लिया।

 

मैं- एक बार अम्मा…...बस एक बार

 

मेरे इस तरह आग्रह करने पर वो मेरी आँखों में देखने लगी, उनकी आंखों में भी वासना साफ दिख रही थी, मैंने हिम्मत करके दुबारा उनके हाँथ को पकड़ा और अपने खड़े, तने हुए मोटे लंड पर जैसे ही रखा तो इस बार उन्होंने मेरे सीने में अपना सर छुपाते हुए मेरे लंड को पकड़ लिया, थोड़ा उसे सहलाया, थोड़ा मुठियाया मेरी मस्ती में आंखें बंद हो गयी, विश्वास नही हो रहा था कि आज मेरी सगी माँ मेरी अम्मा मेरा लंड छू रही हैं वो मुझे ही देख रही थी, दोनों की सांसें धौकनी की तरह चलने लगी, कुछ देर ही सहलाने के बाद वो बोली- अब जा, कोई आ जायेगा। मैंने उनकी आज्ञा मानते उन्हें छोड़ दिया और थोड़ा पीछे हटा तो मेरा लंड पैंट में बुरी तरह तना हुआ था जिसको देखकर अम्मा की हल्की सी हंसी छूट गयी और मैं जैसे ही दुबारा उनके करीब जाने लगा तो वो फिर बोली- जा न, अब क्या है?

 

मैं- एक बार

 

अम्मा- एक बार क्या?

 

मैंने अम्मा की बूर की तरफ इशारा करके कहा- एक बार छूने दो न अम्मा

 

अम्मा- अभी नही….अभी जा यहां से

 

मैं फिर पीछे हटा और उनकी आज्ञा मानते हुए बाहर निकल गया। मन मे हजारों लड्डू फूटने लगे, बस अब मुझे इंतज़ार था उनका, पर मुझे कब तक इंतजार करना पड़ेगा ये मुझे नही पता था, ऐसे ही दो दिन बीत गए, अम्मा मुझसे दूर ही रहती, बचती रहती, देख कर मुस्कुराती तो थी पर बचती भी थी, पर क्यों ये मैं नही समझ पा रहा था, अम्मा ये जानती थी कि मैंने वो किताब फाड़ी नही है और मैंने उसे पूरा पढ़ लिया है, उसके अंदर तीसरी कहानी माँ बेटे पर आधारित थी ये बात अम्मा अच्छे से जानती थी।

 

सर्दियों के दिन थे, मैं उसी दालान में जिसमे भूसा रखा था सोता था, अंधेरी रात थी, सात दिन बीत चुके थे, मेरी उम्मीद कम हो रही थी, मुझे ऐसा लग रहा था कि माँ वो नही चाहती जैसा

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Jangali
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मैं सोच रहा था। कभी कभी मन मायूस भी हो जा रहा था, पर मैं भी उस दिन के बाद माँ को सिर्फ देखने के अलावा आगे नही बढ़ा, वो सबके सामने मेरे से बिल्कुल पहले जैसा ही बर्ताव करती, मैं उम्मीद खोता जा रहा था कि एक रात मैं दालान में बेधड़क सो रहा था, सर्दी जोरों पर थी, रात में कोहरा भी हो जा रहा था, चांदनी रात थी मैं दालान में भूसे के बगल में खटिया पर रजाई ओढ़े बनियान और चढ्ढी पहने ऊपर से तौलिया लपेटे सो रहा था।

 

अचानक दालान का दरवाजा हल्के से खटखटाने की आवाज से मेरी नींद खुली, शायद दरवाजा दो तीन बार पहले से खटखटाया जा रहा था, मैं रजाई से निकला और दरवाजे पर जाकर अंदर से बोला- कौन?

 

अम्मा ने धीरे से कहा- मैं…..दरवाजा खोल

 

मैंने झट से दरवाजा खोला तो सामने अम्मा शॉल ओढ़े खड़ी थी वो झट से अंदर आ गयी और दालान का दरवाजा अंदर से बंद करके मेरी ओर मुड़ी और अंधेरे में मेरी आँखों में देखने लगी, मुझे विश्वास ही नही हो रहा था कि मेरा जैकपोट लग चुका है, मैन जल्दी से दिया जलाने की कोशिश की तो अम्मा ने धीरे से कहा- दिया मत जला बाहर रोशनी जाएगी खिड़की से।

 

मैं दिया जलाना छोड़कर उनकी तरफ पलटा तो वो मुझे अपना शॉल उढ़ाते हुए मुझसे लिपट गयी, मुझे काटो तो खून नही, मैंने उन्हें और उन्होंने मुझे बाहों में भर लिया, ऐसा मजा मिलेगा मैन कभी सपने में भी नही सोचा था, दोनों की साँसे धौकनी की तरह तेज तेज चलने लगी, अम्मा के गुदाज बदन को अपनी बाहों में महसूस कर मेरी उत्तेजना चरम पर पहुंच गई, उनकी भी धड़कने तेजी से बढ़ गयी थी, जैसे भी मैंने उन्हें चूमने के लिए उनके चेहरे को अपनी हथेली में थामा, वो धीरे से बोली- कभी किसी को पता न चले अरविंद?

 

मैंने भी धीरे से कहा- कभी नही अम्मा, तू चिंता मत कर…...तुझे आते हुए किसी ने देखा तो नही।

 

अम्मा ने फिर धीरे से कहा- नही…..तेरे दादा दादी ओसारे में सो रहे हैं

 

ठंड न जाने कहाँ एक पल के लिए गायब हो गयी थी, मैंने अम्मा को कस के अपने से चिपका लिया, आज फिर मैंने उनके मुंह से सिसकी सुनी तो मेरा लंड तौलिए में फुंकार मारकर खड़ा हो गया, वो सिसकारी लेकर मुझसे लिपट गयी, मैं उन्हें चूमने लगा, उनकी सांसे तेजी से ऊपर नीचे होने लगी। कितना अजीब सा सेंसेशन पूरे बदन में दोनों माँ बेटे के हो रहा था, दोनों की गरम गरम सांसें एक दूसरे के चेहरे पर टकरा रही थी, गालों को चूमने के बाद मैंने जैसे ही उनके होंठों पर अपने होंठ रखे मेरा पूरा जिस्म उत्तेजना से कांप गया, आज पहली बार महसूस हुआ कि अपनी सगी माँ के होंठ चूमने पर कैसा लगता है। इस उत्तेजना की कोई तुलना नही है, मैं उनके होंठों को चूमने लगा और वो मेरा साथ देने लगी, होंठों को चूमते चूमते जब मैंने अपना हाँथ उनके नितंबों पर रखा तो उनके बदन में अजीब सी थिरकन हुई, अपनी ही माँ के नितंब छूकर भी मुझे विश्वास नही हो रहा था, मैंने जैसे ही उनके नितंबों को दबाया वो सिसक कर मुझसे कस के लिपट गयी, मैंने उन्हें बाहों में उठाया और अंधेरे में ही बिस्तर पर लिटाया, और "ओह अम्मा" कहते हुए उनके ऊपर चढ़ गया और ऊपर से रजाई ओढ़ ली, "धीरे से बोल" ऐसा कहते हुए उन्होंने मुझे अपने आगोश में भर लिया, रजाई के अंदर दोनों एक दूसरे से लिपट गए, मेरा लंड लोहे की तरह तनकर जैसे ही उनकी बूर के ऊपर चुभा वो मुझसे लजाकर और लिपटती चली गयी, मैं उनके गालों, गर्दन, कान, माथा, नाक, आंख, ठोढ़ी पर ताबड़तोड़ चुम्बनों की बरसात करने लगा, वो धीरे धीरे कसमसाते हुए सिसकने लगी।

 

जैसे ही मैंने दुबारा उनके होंठों पर अपने होंठ रखे उन्होंने मेरे बालों को सहलाते हुए मेरे होंठों को चूमना शुरू कर दिया, चूमते चूमते मैंने अपनी जीभ जैसे ही उनके होंठों से छुवाई उनके होंठ खुलते चले गए और मैंने जैसे ही अपनी जीभ उनके मुंह में डाली दोनों सिरह उठे, वो मेरी जीभ को चूसने लगी मैंने महसूस किया कि उनकी बूर उत्तेजना में सुंकुचन कर रही थी, कभी वो मेरी जीभ को चूसती तो कभी मैं उनकी जीभ से खेलने लगता, एकएक मेरा हाँथ उनकी चूची पर गया तो वो फिर सिसक उठी, मुझसे रहा नही गया तो मैं ब्लॉउज के बटन खोलने लगा, अंधेरे में कुछ दिख नही रहा था, किसी तरह ब्लॉउज के बटन खोला तो अम्मा ने खुद ही उसे निकाल कर बगल रख दिया, अब वो खाली ब्रा में थी, मेरा तो दिल उनकी 36 साइज की उत्तेजना में तनी हुई दोनों चूचीयों को महसूस कर बदहवास सा हो गया, जल्दी से मैंने ब्रा को ऊपर उठाया तो मोटी मोटी चूचीयाँ उछलकर बाहर आ गयी, जिनपर अंधेरे में मुँह लगाकर मैंने उन्हें काफी देर महसूस किया और अम्मा मुझे उत्तेजना में सिसकते हुए अपनी चूची पर दबाने लगी।

 

मैं तो आज रात सातवें आसमान में था, सोचा न था कि नियति मुझपे इतनी महेरबान होगी, जब देगी तो छप्पड़ फाड़ के देगी। रजाई के अंदर मैं अपनी अम्मा की चूची को मुंह मे भरकर पीने और दबाने लगा, वो न चाहते हुए भी 

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Jangali
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अब सिसकने लगी, अपने दांतों को होंठों से काटने लगी, उनके निप्पल उत्तेजना में तनकर किसी काले अंगूर की तरह हो चुके थे, उनकी दोनों चूचीयाँ फूलकर किसी गुब्बारे की तरह हो चुकी थी, एकएक मैंने अपना हाँथ उनकी नाभि पर रखा तो वो समझ गयी कि अब मैं किस तरफ बढ़ रहा हूँ, मैंने जैसे ही अपना हाँथ उनकी साड़ी की गांठ पर रखा और हल्का सा अंदर सरकाया तो उन्होंने मेरा हाँथ शर्माते हुए पकड़ लिया, मैंने धीरे से बोला- एक बार दिखा दो अम्मा।

 

वो थोड़ी देर चुप रहीं, मैं फिर बोला- दिखा दो न अम्मा, मैंने कभी देखा नही है।

 

अम्मा धीरे से बोली- मुझे शर्म आती है।

 

मैं- बस एक बार जल्दी से।

 

कुछ देर वो चुप रही, मैं समझ गया कि ये मौन स्वीकृति है, मैं चुपचाप उठा और दिया लेकर आया, अब तक अम्मा ने पूरी रजाई अपने मुंह पर डाल ली थी मैंने दिया जलाया और पैर के पास आके रजाई को हटाकर साड़ी को ऊपर सरकाया तो अम्मा ने धीरे धीरे अपने पैर एक दूसरे पर चढ़ाकर अपनी प्यासी बूर को शर्म से ढकने की कोशिश की, साड़ी मैंने कमर तक उठा दी और काली पैंटी में उनकी गोरी गोरी सुडौल जांघें देखकर तो मेरी साँसे धौकनी की तरह चलने लगी, आज मैं पहली बार अपनी ही सगी माँ को इस तरह देख रहा था, कुछ देर उन्हें ऐसे ही बेसुध निहारने के बाद मैंने जैसे ही पैंटी को नीचे सरकाने के लिए उनके कमर पर हाँथ लगाकर दोनों तरफ से पैंटी के स्ट्रिप्स को पकड़ा तो मारे उत्तेजना के उनका बदन सिरह उठा, आज एक सगा बेटा अपनी सगी माँ की बूर देखने जा रहा था, उनका बुरा हाल था, रजाई मुँह पर डाले वो तेज तेज साँसे लिए जा रही थी।

 

दिये की रोशनी में मैन देखा कि उनकी प्यासी बूर का आकार बखूबी काली पैंटी के ऊपर से ही दिख रहा था और उस जगह पर पैंटी काफी गीली हो गयी थी, पैंटी के ऊपर से ही सही पर उस वक्त वो नज़ारा देखकर मुझसे रहा नही गया और मैंने पैंटी के ऊपर से ही बूर पर अपना मुंह रख दिया और बूर को मुंह में भर लिया, जैसे ही मेरा मुँह उनकी बूर पर लगा अम्मा थोड़ा जोर से सिसक पड़ी और उनकी जांघें स्वतः ही हल्का सा खुल गयी, कुछ देर मैं वैसे ही बूर से आती पेशाब और कामरस की मदहोश कर देने वाली कामुक खुश्बू को सूंघता रहा और कभी मैं पैंटी के ऊपर से बूर को चाटता तो कभी जाँघों को सहलाता और चूमता अम्मा हल्का हल्का बस सिसके जा रही थी, कुछ ही देर बाद उन्होंने स्वयं ही मेरे दोनों हांथों को पकड़कर जब अपनी कमर पर पैंटी के स्ट्रिप पर रखा तो अपनी अम्मा की मंशा समझते ही "कि वो अब नही रह पा रही है और खुद ही अपनी पैंटी को उतारने का इशारा उन्होंने मुझे किया है", मैं खुशी से झूम उठा, मैंने जल्दी से पैंटी को नीचे सरका दिया, और जब मेरी नज़र अपनी सगी माँ की बूर पर पड़ी तो मैं उसे देखता ही रह गया, जिंदगी में आज पहली बार मैं साक्षात बूर देख रहा था और वो भी अपनी ही सगी माँ की, इतनी उत्तेजना का अहसास कभी नही हुआ था, और यही हाल माँ का भी था, क्या बूर थी उनकी, हल्के हल्के बाल थे बूर पर, गोरी गोरी जाँघों के बीच उभरी हुई फूली फूली फांकों वाली बूर जिसकी दोनों फांकों के बीच हल्का हल्का चिपचिपा रस बह रहा था, दोनों फांकों के बीच वो तना हुआ भग्नाशा जिसे देखकर मैं तो पागल सा ही हो गया और बिना देरी किये बूर पर टूट पड़ा, अम्मा की जोर से सिसकारी निकल गयी, मैं बूर को बेताहाशा चाटने लगा, कभी नीचे से ऊपर तो कभी ऊपर से नीचे, कभी भग्नासे को जीभ से छेड़ता तो कभी बूर की छेद पर जीभ रगड़ता, अम्मा अतिउत्तेजना में सिसकने लगी और कुछ ही देर बाद उनके हाँथ स्वतः ही मेरे बालों पर घूमने लगे, वो बड़े प्यार से मेरे सर को सहलाने लगी, मेरे सर को उत्तेजना में अपनी बूर पर दबाने लगी, छटपटाहट में उन्होंने अपने सर से रजाई हटा दी थी।

 

तभी उन्होंने कुछ ऐसा किया कि मुझे विश्वास नही हुआ कि वो मुझे ऐसे बूर परोसेंगी, उन्होंने कुछ देर बाद खुद ही लजाते हुए वासना के वशीभूत होकर अपने एक हाथ से अपनी बूर की दोनों फांकों को फैलाकर बूर का गुलाबी गुलाबी छेद दिखाया, मानो वो जीभ से उसे अच्छे से चाटने का इशारा कर रही हों, उनकी इस अदा पर उत्तेजना के मारे मेरा लंड फटा ही जा रहा था, मैंने झट से बूर के छेद में अपनी जीभ नुकीली करके डाल दी तो उनका बदन गनगना गया, उनके नितंब हल्का सा थिरक गए, एक तेज सनसनाहट के साथ उन्होंने दूसरे हाँथ से मेरे सर को अपनी बूर पर दबा दिया औऱ मैं अपनी जीभ को हल्का हल्का उनकी बूर में अंदर बाहर करने लगा, वो लगातार सिसके जा रही थी, मुझसे अब रहा नही जा रहा था, एकाएक उन्होंने मेरे सर को पकड़कर मुझे अपने ऊपर खींचा तो मैं रजाई अच्छे से ओढ़ता हुआ अपनी माँ के ऊपर चढ़ गया, वो मेरी आँखों में देखकर मुस्कुराई, मैं भी मुस्कुराया फिर वो लजा गयी। इस उठापटक में मेरी तौलिया कब की खुल चुकी थी और मैं बस बनियान और चढ्ढी में था, मेरा लंड लोहे की तरह तना हुआ था, अब वो नीचे से बिल्कुल नंगी थी, वो ऊपर से भी नंगी थी बस उनकी साड़ी कमर पर थी, मैं सिर्फ चड्डी और बनियान में था।

 

दिया अभी जल ही रहा था, वो मुझसे नज़रें मिला कर लजा गईं, उन्होंने जल्दी से एक हाँथ से दिया बुझा दिया, और मेरी बनियान को पकड़कर उतारने लगी तो मैंने झट से ही उसे उतार फेंका और रजाई ओढ़कर हम दोनों अमरबेल की तरह एक दूसरे से लिपट गए, उनकी मोटी मोटी चूचीयाँ और तने हुए निप्पल अपने नंगे बदन पर महसूस कर मैं मदहोश होता जा रहा था, कितनी नरम और गुदाज थी उनकी चूचीयाँ, मैंने कुछ देर उन्हे चूमा और जब चढ्ढी के अंदर से ही अपने खड़े लंड से उनकी नंगी बूर पर हल्का हल्का धक्के मारे तो वो और लजा गयी, अब दालान में बिल्कुल अंधेरा था, मैंने धीरे से उनका हाँथ पकड़ा और अपनी चढ्ढी के अंदर ले गया वो समझ गयी, उन्होंने शर्माते हुए खुद ही मेरे लोहे के समान कठोर हो चुके 8 इंच के लंड को जैसे ही पकड़ा उनके मुँह से हल्का सा सिसकी के साथ निकला "इतना बड़ा", मैंने बोला- सिर्फ मेरी अम्मा के लिए।

 

वो मुझसे कस के लिपट गयी और फिर मेरे कान में बोली- कभी किसी को पता न लगे, तेरे बाबू को पता लगा तो अनर्थ हो जाएगा।

 

मैं- आपको मेरे ऊपर विश्वास है न अम्मा।

 

माँ- बहुत, अपने से भी ज्यादा

 

मैंने उनके होंठों को चूम लिया और उन्होंने मेरा साथ दिया, मेरे कठोर लंड को सहलाते हुए वो सिसकने लगी और मेरी चढ्ढी को पकड़कर हल्का सा नीचे करते हुए उसे उतारने का इशारा किया, मैंने झट से चढ्ढी उतार फेंकी और अब मैं रजाई के अंदर बिल्कुल नंगा था। उन्होंने सिसकते हुए अपनी दोनों टांगें हल्का सा मोड़कर फैला दिया, जैसे ही मेरा दहाड़ता हुआ लंड उनकी दहकती हुई बूर से टकराया वो बड़ी मादकता से सिसक उठी, मेरा लंड उनकी बूर पर जहां तहां टकराने लगा और दोनों की ही सिसकी निकल जा रही थी, मैंने अपने लंड को उनकी रसीली बूर की फांकों के बीच रगड़ना शुरू कर दिया, मुझसे रहा नही जा रहा था और उनसे भी नही, बार बार लंड भग्नासे से टकराने से वो बहुत उत्तेजित हो चुकी थी, मैंने एक हाँथ से अपने लंड को पकड़ा, उनकी चमड़ी खोली और जैसे ही उनकी रिसती हुई बूर के छेद पर रखा उन्होंने मेरे कान में धीरे से बोला-धीरे धीरे अरविंद…...बहुत बड़ा है ये।

 

मैं- बाबू से भी

 

उन्होंने लजाकर मेरी पीठ पर चिकोटी काटते हुए बोला- हाँ…..बेशर्म

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Jangali
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मैंने उन्हें चूम लिया और बूर की छेद पर रखकर हल्का सा दबाया तो लंड फिसलकर ऊपर को सरक गया, मारे उत्तेजना के मैं थरथरा सा रहा था वही हाल माँ का भी था, जल्दी से जल्दी वो मेरा लंड अपनी बूर की गहराई में लेना चाह रही थी और मैं भी उनकी बूर में जड़ तक लंड उतारना चाह रहा था पर आज ये जीवन में पहली बार था मेरे लिए, मारे उत्तेजना के मैं कांप सा रहा था, अपनी ही माँ को चोदना ये सोचकर ही चरम उत्तेजना होती थी तो आज की रात तो मैं ये साक्षात कर रहा था, एक दो बार लंड ऊपर की ओर सरक जाने के बाद अम्मा ने अपने दोनों पैर मेरी कमर पर लपेट लिय और एक हाँथ नीचे ले जाकर मेरे तड़पते कठोर लंड को पकड़कर एक बार अच्छे से सहलाया और फिर अपनी बूर की छेद पर रखकर उसको सही रास्ता दिखाते हुए दूसरे हाँथ से मेरी गाँड़ को हल्का सा दबाकर लंड घुसाने का इशारा किया तो मैंने एक तेज धक्का मारा, लन्ड इस बार गच्च से आधा बूर में चला गया, वो कराहते हुए बोली- "धीरे धीरे" अब लंड बूर में घुस चुका था, उन्होंने हाँथ वहां से हटाकर सिसकते हुए मुझे आगोश में भर लिया, मैं कुछ देर ऐसे ही आधा लंड बूर में घुसाए उनपर चढ़ा रहा, आज पहली बार पता लग रहा था कि वाकई में हर मर्द को बूर चोदने की हसरत क्यों तड़पाती रहती है, क्यों इस बूर के लिए वो मरता है, क्या जन्नत का अहसास कराती है ये बूर, कितनी नरम थी अम्मा की बूर अंदर से और बिल्कुल किसी भट्टी की तरह उत्तेजना में धधक रही थी, कुछ पल तो मैं कहीं खो सा गया, अम्मा मेरी पीठ को सहलाती रही, फिर मैंने एक तेज धक्का और मारा और इस बार मेरा लंड पूरा जड़ तक अम्मा की बूर में समा गया, वो एक तीखे दर्द से कराह उठी, मुझे खुद अहसाह हो रहा था कि मेरा लंड उनकी बूर की कुछ अनछुई मांसपेशियों को चीरता हुआ उनके गर्भाशय से जा टकराया था, वो मुझसे बुरी तरह लिपटी हुई थी, और तेज तेज आंखे बंद किये कराह रही थी, अब रुकना कौन चाह रहा था, मैंने रजाई अच्छे से ओढ़ी और उन्होंने कराहते हुए अपने को मेरे नीचे अच्छे से व्यवस्थित किया और फिर मैंने धीरे धीरे लंड को अंदर बाहर करते हुए अपनी सगी माँ को चोदना शुरू कर दिया, वो मस्ती में सिसकते कराहते हुए मुझसे लिपटती चली गयी, इतना मजा आएगा ये कभी कल्पना भी नही की थी, जितना कुछ कभी सोचा था उससे कहीं ज्यादा मजा आ रहा था।

 

दालान में पूरा अंधेरा था, धीरे धीरे मैं उन्हें तेज तेज चोदने लगा और मेरे धक्कों ने पूरा रफ्तार पकड़ लिया, खटिया चर्रर्रर्रर चर्रर्रर्रर करने लगी, न चाहते हुए भी दोनों के मुंह से कामुक सिसकारियां निकलने ही लगी, मैंने दोनों हाँथ नीचे ले जाकर अपनी अम्मा के विशाल नितम्बों को थामकर हल्का सा ऊपर उठाया और कस कस के पूरा लंड उनकी रसीली बूर में पेलने लगा, वो तेज तेज सिसकते हुए अब नीचे से शर्मो हया त्यागकर अपनी चौड़ी गाँड़ हल्का हल्का ऊपर को उछाल उछाल कर अपने सगे बेटे से चुदवाने लगी। परम आनंद में दोनों माँ बेटे डूब गए, तेज तेज धक्के मारने के साथ साथ मैं उनके गालों और होंठों को चूमने लगा, वो मदहोशी में मेरा साथ देने लगी, मैं उनकी तेज धक्कों के साथ हिलती हुई चूचीयों को कस कस के दबाने लगा और वो परम उत्तेजना में और भी सिसकने लगी।

 

रात के घनघोर अंधेरे में मेरा लंड अपनी ही सगी माँ की बूर में घपाघप अंदर बाहर हो रहा था, कुछ ही देर में जब बूर बहुत ज्यादा पनिया गयी तो रजाई के अंदर चुदायी की फच्च फच्च आवाज़ें गूंजने लगी, उनकी नंगी जाँघों से मेरी नंगी जांघे थप्प थप्प टकराकर जो आवाज पैदा कर रही थी उससे हम दोनों और उत्तेजित हो जा रहे थे, वासना का ये कामुक खेल आज अंधेरे में मैं और अम्मा खेलेंगे ये कभी सोचा न था, इतना मजा आएगा आज की रात ये कभी सोचा न था, करीब पंद्रह मिनिट की लगातार चुदायी के बाद अम्मा ने बस धीरे से मेरे कान में बड़ी मुश्किल से भरी आवाज में कहा "रुकना मत….और तेज तेज कर" मैं ये सुनकर और गचा गच उनकी बूर चोदने लगा वो तेजी से आहें भरते हुए कराहने लगी, लगातार कामुक सिसकारियां लेते हुए वो छटपटाने लगी कभी मुझसे कस के लिपट जाती कभी मेरी पीठ पर चिकोटी काट लेती तो कभी मेरी नंगी पीठ पर अपने नाखून गड़ा देती, एकएक उनका बदन थरथराया और मैंने साफ महसूस किया कि उनकी बूर के अंदर मानो कोई विस्फोट सा हुआ हो, और उस विस्फोट के साथ वो कस के मुझसे लिपटते हुए तेजी से कराहकर "आआआआआहहहह अरविंद" कहते हुए झड़ने लगी, उनकी बूर में इतनी तेज तेज संकुचन होने लगा कि मुझसे भी बर्दाश्त नही हुआ और मैं भी "ओह अम्मा" कहते हुए झड़ने लगा, एक तेज वीर्य की गाढ़ी धार मेरे लंड से निकलकर उनके गर्भाशय पर गिरने लगी, उतेजना इतनी थी कि करीब दो मिनट तक मेरा लंड सपंदन करके वीर्य मां की बूर में उगलता रहा, यही हाल अम्मा की बूर का भी था, करीब इतनी ही देर तक उनकी बूर भी संकुचित होकर झड़ती रही, वो मुझे कस के अपनी आगोश एक तेज वीर्य की गाढ़ी धार मेरे लंड से निकलकर उनके गर्भाशय पर गिरने लगी, उतेजना इतनी थी कि करीब दो मिनट तक मेरा लंड सपंदन करके वीर्य मां की बूर में उगलता रहा, यही हाल अम्मा की बूर का भी था, करीब इतनी ही देर तक उनकी बूर भी संकुचित होकर झड़ती रही, वो मुझे कस के अपनी आगोश में भरकर काफी देर तक झड़ते हुए चूमती रही, इतना सुख शायद उन्हें पहले कभी नही मिला था, उन्होंने धीरे से मेरे कान में कहा- "आज मैंने पा लिया अपने बेटे को, ये कितना सुखद है"

 

मैं- फिर भी आपने आने में एक हफ्ता लगा दिया अम्मा, मैं कब से आपका इंतजार कर रहा था रोज़, मैं यही सुख आपको देना चाहता था, मैंने भी आज अपनी अम्मा को पा लिया है और ये सब हुआ है उस पुरानी किताब की वजह से।

 

वो ये सुनकर हल्का सा मुस्कुरा पड़ी और बोली-नही अरविंद, देर इसलिए हुई क्योंकि मेरी माहवारी आ रखी थी, इसलिए मैंने तुझे इंतज़ार करवाया, इतंज़ार का फल मीठा होता है न।

 

मैं- हाँ अम्मा सच बहुत मीठा होता है

 

अम्मा- क्या वो किताब तूने फाड़ दी है।

 

मैं- नही अम्मा, फाड़ा नही है।

 

वो फिर मुस्कुराई और बोली- उसे फाड़ना मत, उसी ने हमे मिलाया है।

 

मैंने उन्हें "हाँ बिल्कुल" बोलते हुए कई बार चूमा, और बगल में लेटते हुए उन्हें अपने ऊपर चढ़ा लिया इस उलट पलट में मेरा लंड पक्क से उनकी बूर से निकल गया तो अम्मा ने साये से अपनी बूर और मेरे लंड को अच्छे से पोछा और एक बार फिर हम एक दूसरे के आगोश में समाते चले गए।उस रात मैंने अम्मा को तीन बार चोदा और फिर वो सुबह भोर में दालान से निकल गयी, रात में वो अब रोज़ मेरे पास नज़र बचा के आती और हम जी भरकर चुदायी करते, इतना ही नही दिन में भी हम छुप छुप कर चुदायी करते, उस किताब की वजह से मेरी माँ अब सच में मेरी हो चुकी थी, आखिर मेरा जिस्म उनके जिस्म का ही तो एक टुकड़ा था, अब कोई ग्लानि नही थी बस था तो सिर्फ प्यार ही प्यार।

 

समाप्त

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